ग्रंथसार
क्या संसार के कोलाहल के बीच भी मौन का वास संभव है, या मुक्ति के लिए हमें हिमालय की गुफाओं में ही शरण लेनी होगी?
सांख्य दर्शन · पाठ 14
जीवनमुक्त का स्वरूप