ग्रंथसार
क्या वह 'मैं' जो हर पल हमारे भीतर बोलता है, वही हमारा वास्तविक स्वरूप है या यह प्रकृति का रचा हुआ कोई मायावी खेल है?
सांख्य दर्शन · पाठ 5
अहंकार का उदय