ग्रंथसार
गुरुवर के श्रीमुख से जब कर्म का गूढ़ रहस्य झरता है, तब संसार की हलचल एक दिव्य संगीत सी प्रतीत होने लगती है।
वैशेषिक दर्शन · पाठ 5
कर्म का रहस्य