ग्रंथसार
क्या आपने कभी सोचा है कि जब हमारी चेतना अपनी ही अनंतता को छूती है, तो उस क्षण पीछे क्या रह जाता है और क्या शेष बचता है?
योग दर्शन · पाठ 16
अस्तित्व का अनंत क्षितिज