ग्रंथसार
नदी की अखंड धारा को देखकर महर्षि ने देवरात को ध्यान के उस रहस्यमयी पथ पर चलने का संकेत दिया, जहाँ मन स्वयं ही अपना ध्येय बन जाता है।
योग दर्शन · पाठ 8
ध्यान का निरंतर प्रवाह