ग्रंथसार
धर्म कोई बाहरी बंधन नहीं, बल्कि वह अंतर्निहित शक्ति है जो हमें और हमारे समाज को सत्य की धुरी पर टिकाए रखती है।
मनुस्मृति · पाठ 3
धर्म का स्वरूप और उसके स्रोत