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सम्पादकीय कथा-रूपान्तरण — मूल शास्त्र-पाठ नहीं

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  1. ॐसंवाद का उद्गमपाठ 1
  2. ॐसृष्टि और काल का प्रवाहपाठ 2
  3. ॐधर्म का स्वरूप और उसके स्रोतपाठ 3
  4. ॐजीवन के चार आश्रमपाठ 4
  5. ॐगृहस्थ के कर्तव्यपाठ 5
  6. ॐशिक्षा और गुरुपाठ 6
  7. ॐसदाचार और आत्म-संयमपाठ 7
  8. ॐआहार और शुचितापाठ 8
  9. ॐशासक के कर्तव्य और न्यायपाठ 9
  10. ॐस्त्री और परिवारपाठ 10
  11. ॐपरंपरा और विवादपाठ 11
  12. ॐसचेत स्वाध्यायपाठ 12
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सम्पादकीय सिद्धान्त

मूल स्रोत, अनुवाद, सरल व्याख्या और परम्परागत टीका सदा अलग-अलग अंकित रहते हैं। कुछ भी गढ़ा नहीं जाता; अनुपलब्ध सामग्री को अनुपलब्ध अंकित किया जाता है।

सम्पादकीय कथाएँ इसी रूप में अंकित हैं और शास्त्र नहीं हैं। किसी परम्परा को दूसरी से ऊँचा नहीं बताया जाता।

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