ग्रंथसार
ज्ञान का प्रवाह एक स्थिर जलाशय की तरह नहीं, बल्कि एक बहती हुई नदी की तरह होता है जो युगों-युगों तक अपनी धारा को जीवित रखती है।
याज्ञवल्क्य स्मृति · पाठ 10
टीका परंपरा का वैभव