ग्रंथसार
गुरुदेव की कुटिया में दीप की लौ स्थिर थी, जैसे देवरात के मन के किसी गहरे कोने में कोई प्रश्न धड़क रहा हो।
अष्टांग योग · पाठ 8
ध्यान: निरंतरता का प्रवाह