ग्रंथसार
क्या हमने कभी ठहरकर उस सत्य को सुनने का प्रयास किया है, जो शब्दों के कोलाहल के पीछे मौन बनकर बैठा है?
ज्ञान साधना · पाठ 2
सुनने की कला