ग्रंथसार
अतिथि को साक्षात ईश्वर मानने की परंपरा केवल एक सामाजिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर परमात्मा के दर्शन करने का एक आध्यात्मिक मार्ग है।
व्रत, पूजा और नित्य कर्म · पाठ 7
अतिथि देवो भव