ग्रंथसार
सेवा केवल हाथों का श्रम नहीं, अपितु हृदय से प्रभु के चरणों में अर्पित किया गया वह सुगन्धित पुष्प है, जो भक्त के अहंकार को समाप्त कर उसे परमात्मा से एकाकार कर देता है।
वैष्णव सम्प्रदाय · पाठ 10
सेवा का मार्ग: समर्पण की जीवंत साधना