ग्रंथसार
हम जैसा अन्न ग्रहण करते हैं, वैसा ही हमारा मन बनता है, इसलिए भोजन को केवल शारीरिक पोषण नहीं, एक पवित्र कर्म माना गया है।
गृहस्थ जीवन · पाठ 3
भोजन: प्रसाद और संयम