ग्रंथसार
पीढ़ियों से बहती यह कथा-धारा केवल शब्दों का प्रवाह नहीं, बल्कि धर्म का वह जीवंत प्राण है जो समय के थपेड़ों के बीच भी संस्कार बनकर हमारे हृदय में सुरक्षित रहता है।
कथा परम्परा · पाठ 10
कथा-यात्रा की सार्थकता