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कथा परम्परा

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सम्पादकीय कथा-रूपान्तरण — मूल शास्त्र-पाठ नहीं

कथा परम्परा

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  1. ॐकथा-सभा और वातावरणपाठ 1
  2. ॐकथा-वाचक की कला और श्रोतापाठ 2
  3. ॐक्षेत्रीय स्वरूप और रामकथापाठ 3
  4. ॐभागवत-कथा का प्रवाहपाठ 4
  5. ॐपंचतंत्र और हितोपदेश: जीवन-विवेकपाठ 5
  6. ॐलोक-कथाएं और स्मृति की परम्परापाठ 6
  7. ॐकथा के भीतर कथा: अनंत विस्तारपाठ 7
  8. ॐस्मृति और ततक्षण रचना: जीवित परम्परापाठ 8
  9. ॐश्रवण: एक आध्यात्मिक साधनापाठ 9
  10. ॐकथा-यात्रा की सार्थकतापाठ 10
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सम्पादकीय सिद्धान्त

मूल स्रोत, अनुवाद, सरल व्याख्या और परम्परागत टीका सदा अलग-अलग अंकित रहते हैं। कुछ भी गढ़ा नहीं जाता; अनुपलब्ध सामग्री को अनुपलब्ध अंकित किया जाता है।

सम्पादकीय कथाएँ इसी रूप में अंकित हैं और शास्त्र नहीं हैं। किसी परम्परा को दूसरी से ऊँचा नहीं बताया जाता।

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