ग्रंथसार
जागृत अवस्था की सीमाएँ टूटते ही मन स्वयं ही दृष्टा और स्वयं ही दृश्य बनकर एक अद्भुत स्वप्न लोक का निर्माण करता है।
माण्डूक्य उपनिषद् · उपनिषद् 4
स्वप्न लोक की यात्रा