ग्रंथसार
जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति की सीमाओं को पार कर, वह चैतन्य स्वरूप ही शेष रहता है जो न दृश्य है, न दृष्टा, अपितु स्वयं अनुभव का आधार है।
माण्डूक्य उपनिषद् · उपनिषद् 6
तुरीय: तीन से परे