ग्रंथसार
शब्दों की सीमाओं को लांघकर जब चेतना स्वयं में लीन होती है, तब ओम्कार का मौन ही परम सत्य का साक्षात्कार कराता है।
माण्डूक्य उपनिषद् · उपनिषद् 9
मौन ही तुरीय की चतुर्थ मात्रा