ग्रंथसार
मुनि नारद मुनि समझाते हैं कि सेवा का अर्थ केवल कार्य करना नहीं, बल्कि अपने अहंकार को मिटाकर प्रभु के अंश के रूप में सबकी सहायता करना है।
नारद उपपुराण · अध्याय 5
सेवा का फल