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श्लोक और अर्थ

भगवद्गीता 2.47

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फलों पर कभी नहीं।

भगवद्गीता 2.20

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

यह आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है; यह अजन्मा, नित्य और पुरातन है।

भगवद्गीता 2.14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

हे कौन्तेय! ठंडी-गर्म अनुभूतियाँ सुख-दुःख देती हैं; वे आने-जाने वाली और अनित्य हैं — इन्हें सह लीजिए।

भगवद्गीता 2.48

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

हे धनञ्जय! आसक्ति छोड़कर योग में स्थिर होकर कर्म कीजिए; सफलता-असफलता में सम रहिए — यही समत्व योग कहलाता है।

भगवद्गीता 2.62

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष में उनसे आसक्ति होती है, आसक्ति से कामना और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।

भगवद्गीता 2.71

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥

जो पुरुष सब कामनाएँ छोड़कर निःस्पृह होकर चलता है — निर्मम और निरहंकार — वही शान्ति पाता है।

भगवद्गीता 3.35

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥

दूसरे के धर्म को भलीभाँति निभाने से अपना धर्म गुणहीन होकर भी श्रेष्ठ है; अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, परधर्म भय देने वाला है।

भगवद्गीता 4.7

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।

भगवद्गीता 4.8

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्कर्मियों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

भगवद्गीता 4.38

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

इस जग में ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है।

भगवद्गीता 6.5

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

स्वयं को स्वयं उद्धर लो; स्वयं को गिरने न दो। आत्मा ही स्वयं का मित्र है और आत्मा ही स्वयं का शत्रु।

भगवद्गीता 6.35

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

हे महाबाहो! निस्संदेह मन चंचल और काबू करने में कठिन है; पर अभ्यास और वैराग्य से वह वश में होता है।

हर ग्रन्थ का छोटा परिचय

ग्रन्थ महिमा

श्लोक-पाठ और अर्थ इसी पुस्तकालय की सत्यापित सामग्री से लिए गए हैं; प्रत्येक के साथ सन्दर्भ-पृष्ठ का लिंक है।