यह पृष्ठ संपादकीय सरल परिचय है — मूल श्लोक, अनुवाद या उद्धरण नहीं। किसी पंक्ति को शास्त्र-वचन न मानें।
परिचय
अहिंसा केवल हाथ रोकना नहीं, वाणी और विचार तक फैली समझ है। भारतीय परम्पराओं में यह आचरण का पहला नियम गिना जाता रहा है।
सरल अर्थ
सरल भाषा में — जिससे दूसरे को चोट पहुँचे, वह कहने से पहले रुक जाना अहिंसा है।
जिज्ञासु और सन्त
जिज्ञासु पूछता है — रक्षा के लिए बल का प्रयोग भी हिंसा है?
सन्त कहते हैं — यह प्रश्न सदा कठिन रहा। परम्परा में भी इस पर एक मत नहीं; इसलिए उत्तर देने से पहले नीयत देखो — रक्षा है या बदला।
ध्यान देने योग्य बातें
- वाणी की हिंसा को भी परम्परा में गम्भीर माना गया।
- अहिंसा और भीरुता एक नहीं।
- इस प्रश्न पर परम्पराओं में मतभेद स्पष्ट है।
सावधानी
युद्ध और दण्ड-सम्बन्धी प्रश्न विवादित हैं; यहाँ कोई निर्णय नहीं।

