भक्ति

विषय

भक्ति

भक्ति — प्रेमपूर्वक समर्पण का मार्ग।

यह पृष्ठ संपादकीय सरल परिचय है — मूल श्लोक, अनुवाद या उद्धरण नहीं। किसी पंक्ति को शास्त्र-वचन न मानें।

परिचय

भक्ति में सम्बन्ध मुख्य है — भक्त और आराध्य के बीच का प्रेम। सन्त-परम्परा में इसे सरलतम मार्ग कहा गया, क्योंकि इसमें विद्या, धन या पद की शर्त नहीं।

सरल अर्थ

सरल भाषा में — जहाँ प्रेम है, वहाँ भक्ति है; बाकी सब उसके रूप हैं।

जिज्ञासु और सन्त

जिज्ञासु पूछता है — भक्ति के लिए क्या योग्यता चाहिए?

सन्त कहते हैं — केवल सच्चा मन। जो बालक की तरह पुकारता है, उसकी पुकार अनसुनी नहीं रहती।

ध्यान देने योग्य बातें

  • नाम-स्मरण, कीर्तन और सत्संग भक्ति के प्रचलित रूप हैं।
  • भक्ति में माँग से अधिक भाव का महत्त्व माना गया।
  • सन्त-वाणी में भक्ति को जाति और पद से ऊपर कहा गया है।

सावधानी

सम्प्रदायों की अपनी परिभाषाएँ हैं; यह सामान्य परिचय है।

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