यह पृष्ठ संपादकीय सरल परिचय है — मूल श्लोक, अनुवाद या उद्धरण नहीं। किसी पंक्ति को शास्त्र-वचन न मानें।
परिचय
कर्म शब्द का सीधा अर्थ है — काम, क्रिया। परम्परा में इसके साथ यह समझ जुड़ी रही है कि जो किया जाता है वह निष्फल नहीं रहता; मन, वाणी और शरीर से किया गया प्रत्येक कर्म अपना संस्कार छोड़ जाता है।
सरल अर्थ
सरल भाषा में — जीवन में जो बोया जाता है, वही किसी रूप में लौटकर आता है। इसलिए कर्म को केवल बाहरी काम नहीं, भीतर की नीयत के साथ देखा जाता है।
जिज्ञासु और सन्त
जिज्ञासु पूछता है — यदि फल हमारे हाथ में नहीं, तो कर्म क्यों करें?
सन्त कहते हैं — फल समय के हाथ में है, कर्म तुम्हारे हाथ में। जो अपने हिस्से का काम पूरे मन से करता है, उसका मन फल की चिन्ता से हलका रहता है। कर्म छोड़ने से नहीं, कर्म में आसक्ति छोड़ने से शान्ति आती है।
ध्यान देने योग्य बातें
- कर्म तीन तरह से होता है — मन से, वाणी से और शरीर से।
- नीयत बदलती है तो उसी काम का अर्थ भी बदल जाता है।
- कर्तव्य निभाना और फल पर अधिकार जताना — दोनों अलग बातें हैं।
सावधानी
कर्म की व्याख्या हर परम्परा अपने शब्दों में करती है; यहाँ केवल सामान्य परिचय है।

