ध्यान

विषय

ध्यान

ध्यान — मन को एक जगह ठहरने का अभ्यास।

यह पृष्ठ संपादकीय सरल परिचय है — मूल श्लोक, अनुवाद या उद्धरण नहीं। किसी पंक्ति को शास्त्र-वचन न मानें।

परिचय

ध्यान का अर्थ है मन को बिखरने से रोककर एक ही विषय पर ठहराना। परम्परा में इसे क्रम से बताया गया — पहले शरीर स्थिर, फिर श्वास शान्त, फिर मन एक बिन्दु पर।

सरल अर्थ

सरल भाषा में — आँख बन्द करना ध्यान नहीं; भीतर का शोर कम होना ध्यान है। थोड़े समय का स्थिर अभ्यास लम्बे अस्थिर बैठने से अच्छा माना गया है।

जिज्ञासु और सन्त

जिज्ञासु पूछता है — मन बार-बार भागता है, तो क्या करूँ?

सन्त कहते हैं — भागते मन से लड़ो मत, उसे लौटाते रहो। जितनी बार वह भागे, उतनी बार धीरे से वापस ले आओ; यही लौटाना ही अभ्यास है।

ध्यान देने योग्य बातें

  • स्थिर आसन और सहज श्वास — आरम्भ की दो बातें।
  • मन का भागना दोष नहीं, अभ्यास की शुरुआत है।
  • गुरु या अनुभवी मार्गदर्शन परम्परा में सदा महत्त्व रखता आया है।

सावधानी

यह पृष्ठ विवरण देता है, साधना का निर्देश नहीं; कठिन अभ्यास योग्य मार्गदर्शन में ही किए जाते हैं।

इसी विषय पर पुस्तकालय में पढ़ें