सेवा

विषय

सेवा

सेवा — बिना जताए किसी के काम आना।

यह पृष्ठ संपादकीय सरल परिचय है — मूल श्लोक, अनुवाद या उद्धरण नहीं। किसी पंक्ति को शास्त्र-वचन न मानें।

परिचय

सन्त-परम्परा में सेवा को साधना का ही रूप कहा गया है — भूखे को भोजन, थके को विश्राम, दुखी को साथ।

सरल अर्थ

सरल भाषा में — जहाँ 'मैंने किया' बचा रहे, वहाँ सेवा अधूरी है।

जिज्ञासु और सन्त

जिज्ञासु पूछता है — सेवा का सबसे सरल रूप क्या है?

सन्त कहते हैं — जो सामने है उसकी आवश्यकता देख लेना। दूर का बड़ा कार्य सोचते रहने से पास का छोटा कार्य छूट जाता है।

ध्यान देने योग्य बातें

  • सेवा में पात्र-अपात्र का हिसाब सन्तों ने कम रखा।
  • प्रचार से रहित सेवा अधिक मूल्यवान मानी गई।
  • सेवा करुणा का व्यावहारिक रूप है।

सावधानी

यह परिचय है; किसी संस्था या पद्धति का सुझाव नहीं।

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