यह पृष्ठ संपादकीय सरल परिचय है — मूल श्लोक, अनुवाद या उद्धरण नहीं। किसी पंक्ति को शास्त्र-वचन न मानें।
परिचय
सन्त-परम्परा में सेवा को साधना का ही रूप कहा गया है — भूखे को भोजन, थके को विश्राम, दुखी को साथ।
सरल अर्थ
सरल भाषा में — जहाँ 'मैंने किया' बचा रहे, वहाँ सेवा अधूरी है।
जिज्ञासु और सन्त
जिज्ञासु पूछता है — सेवा का सबसे सरल रूप क्या है?
सन्त कहते हैं — जो सामने है उसकी आवश्यकता देख लेना। दूर का बड़ा कार्य सोचते रहने से पास का छोटा कार्य छूट जाता है।
ध्यान देने योग्य बातें
- सेवा में पात्र-अपात्र का हिसाब सन्तों ने कम रखा।
- प्रचार से रहित सेवा अधिक मूल्यवान मानी गई।
- सेवा करुणा का व्यावहारिक रूप है।
सावधानी
यह परिचय है; किसी संस्था या पद्धति का सुझाव नहीं।

