बहाई धर्म का उद्भव उन्नीसवीं शताब्दी के ईरान में हुआ। इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बाबी आंदोलन से जुड़ी है, जिसकी शुरुआत आदरणीय बाब ने 1844 में की थी। उन्होंने आध्यात्मिक नवीनीकरण और अपने बाद आने वाले एक महान ईश्वरीय संदेशवाहक की तैयारी पर बल दिया। उस समय ईरान का धार्मिक परिवेश मुख्यतः शिया इस्लामी था। इसी वातावरण में बहाई धर्म की अलग पहचान विकसित हुई, जिसका केंद्रीय संदेश मानवता की एकता है।
आदरणीय बहाउल्लाह पहले बाबी आंदोलन से जुड़े थे। उन्हें कारावास और निर्वासन सहना पड़ा। 1863 में बगदाद में उन्होंने अपने आध्यात्मिक दायित्व की घोषणा की; बहाई परम्परा इसे आदरणीय बाब द्वारा प्रत्याशित संदेशवाहक की पहचान से जोड़ती है। बाद में उन्हें उस्मानी साम्राज्य के विभिन्न स्थानों से होते हुए अक्का भेजा गया। 1892 में उनके निधन के बाद उनके पुत्र आदरणीय अब्दुल-बहा ने समुदाय का नेतृत्व और शिक्षाओं की अधिकृत व्याख्या की।
आदरणीय अब्दुल-बहा की यात्राओं और बहाई शिक्षकों के प्रयासों से यह धर्म एशिया से आगे यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका तक पहुँचा। उनके बाद आदरणीय शोगी एफेंदी ने समुदाय के संरक्षक के रूप में प्रशासनिक व्यवस्था को विकसित किया। 1963 में विश्व न्याय मंदिर का पहला चुनाव हुआ। आज बहाई समुदाय अनेक देशों में सक्रिय हैं। उनकी संस्थागत व्यवस्था में स्थानीय और राष्ट्रीय निर्वाचित सभाएँ हैं, लेकिन कोई पुरोहित वर्ग नहीं है।