ऐतिहासिक धार्मिक परम्परा — ग्रंथ, मंदिर-आचार और अन्त्येष्टि-साहित्य · नील नदी की घाटी (प्राचीन मिस्र); आज जीवित परम्परा नहीं चलती

Ancient Egyptian Religion

नील की धरती की वह धार्मिक परम्परा, जिसमें जीवन, प्रकृति, न्याय और मृत्यु के बाद की आशा एक-दूसरे से जुड़े थे।

0 ग्रंथ0 प्रमुख शाखाएँ
उद्भव
प्राचीन मिस्र की नील घाटी में विकसित स्थानीय परम्पराएँ; लगभग 3100 ईसा पूर्व राज्य के एकीकरण के समय तक इनके अनेक रूप स्थापित थे।
संस्थापक/स्रोत
कोई एक ज्ञात संस्थापक नहीं; स्थानीय उपासना, मौखिक परम्पराएँ, मंदिरों के अनुष्ठान और राजकीय धार्मिक व्यवस्था इसके प्रमुख स्रोत थे।
मुख्य ग्रंथ
पिरामिड लेख, ताबूत लेख, मृतकों की पुस्तक, अमदुआत और द्वारों की पुस्तक; कोई एक सर्वमान्य केंद्रीय धर्मग्रंथ नहीं था।
अनुयायी
लगभग कितने आधुनिक अनुयायी हैं, इसका विश्वसनीय वैश्विक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है। प्राचीन काल में यह मिस्र की प्रमुख धार्मिक परम्परा थी; आज कुछ समुदाय इसके पुनरुद्धार का प्रयास करते हैं।
पवित्र स्थल
कर्नाक और लक्सर के मंदिर, अबीडोस, हेलियोपोलिस तथा फिले का देवी आइसिस का मंदिर प्रमुख पवित्र केंद्रों में शामिल थे।

उद्भव और इतिहास

यह परम्परा कैसे बनी

प्राचीन मिस्री धर्म नील नदी की घाटी में बसे समुदायों के जीवन से धीरे-धीरे विकसित हुआ। खेती, नदी की बाढ़, सूर्य की दैनिक गति और जन्म-मृत्यु के अनुभव धार्मिक कल्पनाओं से जुड़े थे। अलग-अलग बस्तियों के अपने पूज्य देवता और पवित्र स्थान थे। लगभग 3100 ईसा पूर्व मिस्र के राजनीतिक एकीकरण के साथ ये स्थानीय परम्पराएँ व्यापक राजकीय व्यवस्था का हिस्सा बनीं, लेकिन उनकी स्थानीय विशेषताएँ समाप्त नहीं हुईं।

पुराने राजवंशीय काल में राजसत्ता, पिरामिड और मृत्यु-संबंधी अनुष्ठान विशेष महत्त्व रखते थे। मध्य और नवीन राजवंशीय कालों में धार्मिक साहित्य तथा मंदिरों का विस्तार हुआ। देवता ओसिरिस, सूर्य देवता रा और देवता आमुन की उपासना अलग-अलग समय पर प्रभावशाली रही। लगभग चौदहवीं शताब्दी ईसा पूर्व राजा अखेनातेन ने सूर्य-चक्र आतन की उपासना को असाधारण प्रधानता दी। उनके बाद यह राजकीय प्रयोग स्थायी नहीं रहा और पुराने देवसमूह फिर प्रमुख बने।

यह धर्म तीन सहस्राब्दियों से अधिक समय तक बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में विकसित होता रहा। यूनानी और रोमन शासन के दौरान भी अनेक मिस्री मंदिर सक्रिय रहे, और देवी आइसिस की उपासना मिस्र से बाहर फैली। बाद की प्राचीनता में ईसाई धर्म के प्रसार और राजकीय परिवर्तनों के साथ पुराने मंदिरों का धार्मिक जीवन क्रमशः समाप्त हुआ। आधुनिक जानकारी मुख्यतः अभिलेखों, धार्मिक पांडुलिपियों, समाधियों, मंदिरों और पुरातात्त्विक खोजों पर आधारित है।

मूल सिद्धान्त

मुख्य मान्यताएँ

01

अनेक देवता और उनके परस्पर संबंध

प्राचीन मिस्री अनेक देवताओं की उपासना करते थे। सूर्य देवता रा, देवता ओसिरिस, देवी आइसिस और देवता होरस प्रमुख उदाहरण हैं। अलग क्षेत्रों में अलग देवता प्रधान हो सकते थे। कभी दो देवताओं के रूप और गुण संयुक्त भी किए जाते थे, जैसे देवता आमुन-रा। विविध धार्मिक व्याख्याएँ साथ-साथ मौजूद रह सकती थीं।

02

माअत: सत्य, न्याय और संतुलन

माअत का आशय सत्य, न्याय और संसार की उचित व्यवस्था से था; इसका व्यक्तित्व देवी माअत के रूप में भी प्रकट होता था। राजा से अपेक्षा थी कि वह व्यवस्था बनाए रखे। सामान्य जीवन में न्यायपूर्ण आचरण भी महत्त्वपूर्ण था। धार्मिक दृष्टि से अव्यवस्था पर नियंत्रण और संतुलन की रक्षा निरंतर आवश्यक मानी जाती थी।

03

मृत्यु के बाद जीवन की आशा

मृत्यु को अस्तित्व का पूर्ण अंत नहीं माना जाता था। अनेक परम्पराओं में मृत व्यक्ति के पुनर्जीवन, देवताओं के साथ संबंध और परलोक में सुरक्षित जीवन की कल्पना मिलती है। शरीर का संरक्षण, उचित अंतिम संस्कार, भेंट और धार्मिक पाठ इस यात्रा में सहायक माने जाते थे। परलोक की धारणाएँ समय और ग्रंथ के अनुसार बदलती थीं।

04

व्यक्ति के अस्तित्व के अनेक पहलू

मिस्री विचार में व्यक्ति केवल शरीर तक सीमित नहीं था। का और बा जैसे शब्द उसके अस्तित्व के अलग पहलुओं के लिए प्रयुक्त होते थे। इन्हें आधुनिक अर्थ में केवल आत्मा कहना अधूरा होगा। नाम, शरीर और स्मृति का संरक्षण भी महत्त्वपूर्ण था। अंत्येष्टि अनुष्ठान इन पहलुओं की निरंतरता और मृतक के रूपांतरण से जुड़े थे।

05

राजसत्ता की धार्मिक जिम्मेदारी

राजा को देवताओं और मनुष्यों के बीच विशेष मध्यस्थ माना जाता था। उसकी भूमिका मंदिरों को संरक्षण देने, देवताओं के लिए अनुष्ठान करवाने और माअत बनाए रखने से जुड़ी थी। मंदिरों के चित्रों में राजा प्रायः स्वयं भेंट चढ़ाता दिखाई देता है, यद्यपि दैनिक सेवा सामान्यतः उसके प्रतिनिधि पुरोहित करते थे।

06

सृष्टि का निरंतर नवीकरण

सूर्योदय, ऋतुओं और जीवन के लौटते चक्रों को संसार के नवीकरण से जोड़ा जाता था। सूर्य की रात्रिकालीन यात्रा और सुबह उसका फिर प्रकट होना धार्मिक साहित्य का प्रमुख विषय है। अनुष्ठानों को देवताओं के पोषण, संकटों से रक्षा और ब्रह्मांडीय व्यवस्था की निरंतरता में योगदान देने वाला माना जाता था।

पवित्र ग्रंथ

धार्मिक ग्रंथ — सार में

1पिरामिड लेखPyramid Texts · सबसे पुराने सुरक्षित उदाहरण लगभग चौबीसवीं–तेईसवीं शताब्दी ईसा पूर्व के; कुछ सामग्री इससे पुरानी हो सकती है।▾

पिरामिड लेख प्राचीन मिस्र के सबसे पुराने सुरक्षित धार्मिक पाठ-समूहों में हैं। इनके आरंभिक उदाहरण राजा उनास के पिरामिड के भीतरी कक्षों में मिलते हैं। बाद में दूसरे राजाओं और कुछ रानियों के पिरामिडों में भी ऐसे लेख अंकित किए गए। ये किसी एक लेखक की क्रमबद्ध पुस्तक नहीं, बल्कि उच्चारणों, प्रार्थनाओं और अनुष्ठान-संबंधी कथनों का संग्रह हैं। इनका उद्देश्य मृत शासक की रक्षा, पुनर्जीवन और दिव्य संसार तक पहुँच में सहायता करना था। प्रमुख विषयों में आकाश की यात्रा, तारों और सूर्य से संबंध, देवता ओसिरिस से जुड़ाव तथा भोजन और अन्य अर्पणों की उपलब्धता शामिल हैं।

2ताबूत लेखCoffin Texts · मुख्यतः लगभग इक्कीसवीं–सत्रहवीं शताब्दी ईसा पूर्व।▾

ताबूत लेख अंत्येष्टि से जुड़े धार्मिक पाठों का विस्तृत समूह हैं, जो विशेष रूप से मध्य राजवंशीय काल के ताबूतों पर लिखे गए। इनमें पिरामिड लेखों की सामग्री का पुनः उपयोग भी हुआ और नए विषय भी जुड़े। इनके उपयोगकर्ताओं में राजपरिवार से बाहर के संपन्न और प्रभावशाली व्यक्ति शामिल थे; इसलिए इन्हें सभी लोगों के लिए समान रूप से उपलब्ध मानना ठीक नहीं होगा। ये पाठ मृतक की पहचान, सुरक्षा, भोजन, गति और परलोक के खतरों से पार पाने की सहायता से संबंधित हैं। कुछ ताबूतों पर मिलने वाली दो मार्गों की पुस्तक परलोक के रास्तों का पाठ और चित्रों के माध्यम से वर्णन करती है।

3मृतकों की पुस्तकBook of the Dead; Book of Coming Forth by Day · लगभग सोलहवीं शताब्दी ईसा पूर्व से प्रचलित; बाद की शताब्दियों में अनेक रूप विकसित हुए।▾

मृतकों की पुस्तक आधुनिक प्रचलित नाम है; प्राचीन शीर्षक का आशय दिन में बाहर आने से जुड़ा था। यह निश्चित क्रम वाली एकमात्र पुस्तक नहीं, बल्कि मृतक के लिए चुने गए धार्मिक पाठों का संग्रह थी। इसके अनेक उदाहरण सचित्र पपीरस पर मिलते हैं, और अलग प्रतियों में सामग्री तथा क्रम बदलते हैं। पाठ मृतक को सुरक्षा, आवश्यक ज्ञान, पहचान और परलोक में स्वतंत्र गति दिलाने के उद्देश्य से तैयार किए जाते थे। इसके प्रसिद्ध विषयों में हृदय का न्याय, देवी माअत से जुड़ा सत्य और उचित आचरण की घोषणा शामिल हैं। चित्र और शब्द मिलकर मृतक की सफल परलोक-यात्रा का धार्मिक साधन बनते थे।

4अमदुआत: परलोक में जो हैAmduat · सुरक्षित उदाहरण लगभग पंद्रहवीं शताब्दी ईसा पूर्व से; नवीन राजवंशीय काल में विशेष महत्त्व।▾

अमदुआत नवीन राजवंशीय काल की राजकीय समाधियों से प्रसिद्ध एक धार्मिक रचना है। इसका नाम परलोक में मौजूद वस्तुओं और प्राणियों के ज्ञान से संबंधित है। यह सूर्य देवता रा की रात के बारह घंटों की यात्रा का वर्णन करती है। प्रत्येक चरण में अलग क्षेत्र, दिव्य शक्तियाँ, सहायक प्राणी और संकट आते हैं। यात्रा का केंद्रीय विषय अंधकार के बीच से गुजरकर जीवन और प्रकाश का नवीकरण है। देवता ओसिरिस से संबंध और प्रातः सूर्य का पुनः प्रकट होना विशेष महत्त्व रखते हैं। पाठ और चित्र मृत राजा को इस ब्रह्मांडीय प्रक्रिया से जोड़ने तथा परलोक का आवश्यक ज्ञान उपलब्ध कराने के लिए प्रयुक्त होते थे।

5द्वारों की पुस्तकBook of Gates · सुरक्षित उदाहरण लगभग चौदहवीं शताब्दी ईसा पूर्व के अंत से।▾

द्वारों की पुस्तक परलोक और सूर्य की रात्रिकालीन यात्रा का सचित्र धार्मिक वर्णन है। इसमें रात की यात्रा विभिन्न भागों में विभाजित है, जिनके बीच संरक्षित द्वार आते हैं। द्वारपालों और अन्य दिव्य प्राणियों की पहचान तथा उनसे संबंधित ज्ञान यात्रा में महत्त्वपूर्ण है। यह रचना राजकीय समाधियों और कुछ अन्य अंत्येष्टि संदर्भों से ज्ञात है। इसके प्रमुख विषय सूर्य का नवीकरण, मृतकों की भिन्न अवस्थाएँ, न्याय और व्यवस्थित ब्रह्मांड की रक्षा हैं। यह अमदुआत से संबंधित धार्मिक संसार प्रस्तुत करती है, लेकिन उसकी संरचना और दृश्य अपने हैं। इसे सामान्य नैतिक नियमावली के बजाय अनुष्ठानिक तथा ब्रह्मांड-संबंधी परलोक-ग्रंथ समझना अधिक उचित है।

आचार

उपासना और साधना

मंदिरों में दैनिक सेवा

मंदिरों में पुरोहित देवप्रतिमा की शुद्धि, वस्त्र, सुगंध और भोजन-अर्पण जैसे अनुष्ठान करते थे। प्रतिमा को देवता की उपस्थिति का केंद्र माना जाता था। मंदिर का भीतरी भाग सामान्य जनता के लिए प्रायः खुला नहीं होता था; लोगों की भागीदारी बाहरी क्षेत्रों और सार्वजनिक अवसरों पर अधिक दिखती थी।

अंत्येष्टि और ममीकरण

मृत शरीर का संरक्षण परलोक संबंधी विश्वासों से जुड़ा था। ममीकरण की विधियाँ काल, संसाधन और सामाजिक स्थिति के अनुसार बदलती थीं। अंतिम संस्कार में प्रार्थनाएँ, अर्पण और मृतक की क्षमताएँ पुनः सक्रिय करने के उद्देश्य वाले अनुष्ठान शामिल हो सकते थे। सबको समान भव्य संस्कार उपलब्ध नहीं थे।

मृतकों को अर्पण और स्मरण

परिवार मृत संबंधियों की स्मृति बनाए रखते और भोजन-पेय जैसे अर्पण करते थे। समाधियों के चित्र और अर्पण-संबंधी पाठ भी मृतक के निर्वाह से जुड़े थे। कभी लोग मृत संबंधियों को पत्र लिखकर सहायता माँगते थे, जिससे जीवित और मृत के बीच निरंतर संबंध की धारणा दिखाई देती है।

व्यक्तिगत प्रार्थना और मन्नत

धार्मिक जीवन केवल राजकीय मंदिरों तक सीमित नहीं था। लोग स्वास्थ्य, संतान, सुरक्षा और संकटों से राहत के लिए देवताओं से प्रार्थना करते थे। छोटे उपासना-स्थल, घरेलू धार्मिक वस्तुएँ और धन्यवाद या निवेदन के अभिलेख व्यक्तिगत भक्ति के प्रमाण देते हैं। इनके रूप समय और स्थान के अनुसार भिन्न थे।

ताबीज और सुरक्षात्मक अनुष्ठान

ताबीज, धार्मिक उच्चारण और अनुष्ठान बीमारी, खतरे तथा हानिकारक शक्तियों से रक्षा के लिए प्रयुक्त होते थे। हेका धार्मिक रूप से प्रभावकारी शक्ति की एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा थी। मिस्री संदर्भ में आधुनिक अर्थों वाले धर्म, जादू और चिकित्सा के बीच हमेशा स्पष्ट सीमाएँ नहीं थीं।

पर्व और प्रतीक

त्योहार, प्रतीक और मूल सीख

ओपेट उत्सव

थीब्स में देवता आमुन और संबंधित देवसमूह की उत्सवी यात्रा कर्नाक तथा लक्सर के मंदिरों को जोड़ती थी। यह राजसत्ता के धार्मिक नवीकरण से भी संबंधित था।

घाटी का सुंदर उत्सव

थीब्स क्षेत्र में देवता आमुन की उत्सवी यात्रा नील के पश्चिमी तट तक जाती थी। यह मंदिरों, मृत संबंधियों के स्मरण और सामुदायिक सहभागिता से जुड़ा अवसर था।

खोयाक के ओसिरिस अनुष्ठान

मिस्री महीने खोयाक में देवता ओसिरिस की मृत्यु और पुनर्जीवन से जुड़े अनुष्ठान होते थे। कुछ विधियों में मिट्टी और अंकुरित होते अनाज से निर्मित प्रतिरूप प्रयुक्त होते थे।

वर्षारंभ का उत्सव

मिस्री वर्ष का आरंभ धार्मिक उत्सवों से चिह्नित होता था। नवीकरण इसकी प्रमुख भावना थी; नागरिक कैलेंडर में अधिवर्ष न होने से इसकी स्थिति ऋतुओं के सापेक्ष बदलती रही।

  • ◆ अंख — जीवन का चिह्न; देवताओं और मनुष्यों को जीवन प्रदान करने वाले दृश्यों में मिलता है।
  • ◆ जेड स्तंभ — स्थिरता का प्रतीक; देवता ओसिरिस से विशेष रूप से जुड़ा था।
  • ◆ वेड्जात नेत्र — देवता होरस के स्वस्थ या पुनर्स्थापित नेत्र से संबंधित; सुरक्षा और पूर्णता का प्रतीक।
  • ◆ स्कारब भृंग — सूर्य के उदय और नवीकरण से संबंधित; देवता खेप्री से जुड़ा प्रतीक।
  • ◆ माअत का पंख — सत्य और उचित व्यवस्था का चिह्न; परलोक में हृदय के न्याय के चित्रों में प्रमुख।
  • ◆ वास राजदंड — शक्ति और अधिकार का प्रतीक; अनेक देवप्रतिमाओं तथा राजकीय चित्रों में दिखाई देता है।
इस विविध परम्परा को एक ही संदेश में सीमित नहीं किया जा सकता, फिर भी माअत इसका एक केंद्रीय आदर्श था: सत्य, न्याय और संतुलन की रक्षा। उचित आचरण, देवताओं के प्रति कर्तव्य और मृतकों का स्मरण जीवन की निरंतरता से जुड़े थे। संसार की व्यवस्था को बनाए रखना निरंतर जिम्मेदारी समझी जाती थी।

अध्यायवार अध्ययन

प्राचीन मिस्र का धर्म — विस्तृत पाठ

विषय और ग्रंथ अलग अध्यायों में पढ़ें। प्रत्येक ग्रंथ की अपनी स्थिति और परम्परागत मर्यादा साथ दी गई है।

अध्याय 1

विषयगत परिचय

परिचय और सांस्कृतिक संदर्भ

प्राचीन मिस्र का धर्म नील नदी की ऋतुओं से साँस लेने वाला धर्म था — नदी बाढ़ से खेतों को जीवन देती, और उसी चक्र से मिस्र की धार्मिक दृष्टि ने सृष्टि, मृत्यु और पुनर्जन्म का अर्थ निकाला। यहाँ अनेक देवता पूजे जाते थे — रा (सूर्य), ओसिरिस, इसिस, होरस, अमुन और अनेक और — और क्षेत्र, युग व शासक के अनुसार उनकी प्रधानता बदलती रहती थी। जीवित पूजा का केंद्र मंदिर था, और मृत्यु के बाद की यात्रा का केंद्र वह विस्तृत ग्रंथ-साहित्य था जो इस परम्परा को विश्व-इतिहास में अद्वितीय बनाता है। ध्यान रहे — यह परम्परा आज जीवित नहीं चलती; जो कुछ हमें मिला है, वह मंदिरों की दीवारों, स्मारकों और ग्रंथ-अवशेषों के माध्यम से है।

अध्याय 2

मूल मान्यताएँ

प्रमुख आधार और दृष्टियाँ

इस परम्परा का केंद्रीय स्तम्भ है — माअत, अर्थात् सत्य, व्यवस्था और न्याय। माअत केवल नैतिक सिद्धान्त नहीं, ब्रह्माण्ड की वह धुरी है जिस पर सूर्य चलता है, नील बाढ़ता है और समाज टिकता है; राजा और मनुष्य दोनों का कर्तव्य था इस व्यवस्था को बनाए रखना। माअत को देवी के रूप में, सिर पर सींगों वाले पंख के साथ, चित्रित किया जाता था।

देवता अनेक थे, पर उन्हें अलग-अलग शक्तियों और स्वरूपों के रूप में समझा जाता था — एक ही देवता के कई नाम और रूप हो सकते थे, और विभिन्न देवताओं को स्थान-स्थान पर जोड़कर भी देखा जाता था। मंदिर को देवता का घर माना जाता था, जहाँ पुरोहित प्रतिदिन प्रातः-उठान, स्नान, वस्त्र और भोग की सेवा करते थे — जैसे किसी आदर्श राजकीय भवन में अतिथि की होती है।

मृत्यु के बाद के जीवन की दृष्टि इस परम्परा का सबसे विकसित अंग है। मिस्र की मान्यता में व्यक्ति के अनेक आयाम थे — उनमें ‘का’ (जीवन-शक्ति) और ‘बा’ (आत्मा-सा पक्षी-रूप में चलने वाला अंश) प्रमुख हैं; मृत देह को सुरक्षित रखना और उसे भोग-वस्तुएँ देना इसी विश्वास की सेवा था। मृतक की यात्रा कठिन मानी जाती थी, और उसी कठिन यात्रा के मार्ग-निर्देश हेतु वे ग्रंथ लिखे गए जिनका परिचय नीचे है।

अध्याय 3

आचार और सामुदायिक जीवन

मंदिर-पूजा, पर्व और अन्त्येष्टि

मंदिर की दैनिक सेवा — प्रातःकालीन देव-उठान, स्नान, वस्त्र-अलंकार, भोग और संगीत — पुरोहित-परम्परा का केंद्र था। साधारण लोग बाहरी प्रांगण में प्रार्थना करते, व्यक्तिगत देव-मूर्तियों और अभिवादन-स्तोत्रों का आश्रय लेते थे; बड़े पर्वों पर देवता की यात्रा-मूर्ति नदी-मार्ग से दूसरे मंदिर जाती थी, और ये उत्सव सामाजिक जीवन के विशाल आयोजन होते थे।

अन्त्येष्टि-परम्परा इस धर्म की सबसे ज्ञात विशेषता है: देह-संरक्षण, ताबूत और ग्रंथ-सहित दफ़न, मृतक के भोजन-अर्पण की व्यवस्था, और पीढ़ियों तक मृतक का नाम जीवित रखने की परम्परा। ‘हेका’ अर्थात् माया-विद्या को इस दृष्टि में उचित, रक्षात्मक शक्ति माना जाता था — मंत्र, अमुलेट और सुरक्षात्मक चित्र जीवन के सामान्य उपकरण थे।

अध्याय 4

विविधता-सूचना

शाखाएँ, पाठ-परम्परा और मर्यादा

मिस्र का धार्मिक जीवन युग, क्षेत्र और शासक के साथ बदलता रहा — देवताओं की प्रधानता, ग्रंथों के अध्याय-क्रम और आचार सब क्षेत्र-क्षेत्र में भिन्न मिलते हैं; ग्रंथ-प्रतियों में कोई एक निश्चित मूल पाठ नहीं है, और यह पृष्ठ किसी एक रूप को एकमात्र सही नहीं मानता।

अध्याय 5

ग्रंथ-अध्याय

पिरामिड टेक्स्ट्स — राजकीय समाधियों के पाठ

प्राचीन मिस्र का ग्रंथ-साहित्य पढ़ने की दिशा उल्टी चलती है — सबसे पहले वे ग्रंथ हैं जो मंदिर-परिसर में नहीं, बल्कि मृतक की अंतिम कोठरी में लिखे गए। इस परम्परा का सबसे प्राचीन धार्मिक वाङ्मय है — पिरामिड टेक्स्ट्स, अर्थात् ‘पिरामिड-पाठ’। ये पाठ राजा के पिरामिड की भीतरी दीवारों पर उकेरे गए थे — अनेक प्रार्थनाएँ, मंत्र और गीत, जिनका एक ही उद्देश्य था: राजा की आत्मा का आकाश में उत्थान, तारों के बीच उसका पहुँचना और देवताओं के समीप होना। कुछ पाठों में राजा पंखों वाले पक्षी की तरह उड़ता है, कुछ में सीढ़ियों या सूर्य-किरण की सीढ़ी पर चढ़ता है; ये चित्र आगे आने वाली सारी मिस्री अन्त्येष्टि-साहित्य की नींव बने।

अध्याय 6

ग्रंथ-अध्याय

कॉफिन टेक्स्ट्स — ताबूतों पर अंकित मार्ग-पाठ

समय के साथ यह विश्वास राजा के अधिकार से आगे बढ़ा — साधारण मनुष्य भी इसी यात्रा का अधिकारी माना जाने लगा। इसी दूसरे चरण का साहित्य है — कॉफिन टेक्स्ट्स, अर्थात् ‘ताबूत-पाठ’। अब वही प्रकार के मंत्र राजा के पिरामिड की दीवार से उतरकर साधारण लोगों के ताबूतों पर लिखे जाने लगे — भीतर की दीवारों पर, जहाँ मृतक को ‘देख’ सकता है। इन पाठों में अंधकार के खतरों, भूख-प्यास से मुक्ति, और अगले जगत की परीक्षाओं से बचने के उपायों का विस्तार है; यहीं पहली बार उस महान परीक्षा की कल्पना भी मिलती है जो आगे चलकर मिस्री धर्म का सबसे प्रसिद्ध दृश्य बनी।

अध्याय 7

ग्रंथ-अध्याय

बुक ऑफ़ द डेड — परलोक-यात्रा के विविध पाठ

फिर आता है इस परम्परा का सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ — बुक ऑफ द डेड, ‘मृतकों की पुस्तक’। यह दीवारों से निकलकर कागज़ (पेपिरस) पर लिखा गया संग्रह है, जिसे मृतक के साथ दफ़नाया जाता था; इसका मूल नाम बताता है कि यह क्या है — ‘दिन में निकलने के मंत्र’ — अर्थात् मृतक यात्री दिन के प्रकाश में घूमने का अधिकार पाने के लिए वे शब्द साथ रखता है जो हर मार्ग-रोध पर उसका परिचय देते हैं। इसी ग्रंथ में वह विख्यात दृश्य है जो मिस्री धर्म का प्रतीक बन गया: मृतक का हृदय तुला पर माअत के पंख के साथ तौला जाता है, और जो हृदय सत्य-व्यवस्था के भार के साथ मेल खाता है, वही आगे की यात्रा पाता है। साथ में मृतक स्वयं घोषणा करता है कि उसने चोरी नहीं की, हिंसा नहीं की, झूठ नहीं बोला — नकारात्मक घोषणाओं की वह लम्बी सूची जो मिस्री नैतिकता का दर्पण है। और एक महत्वपूर्ण बात — इस ग्रंथ का कोई एक निश्चित ‘मूल पाठ’ नहीं; प्रत्येक प्रति अलग है, और प्रतियों में अध्यायों की संख्या व क्रम भिन्न-भिन्न मिलते हैं।

अध्याय 8

ग्रंथ-अध्याय

बुक ऑफ़ अमदुआत — सूर्य की रात्रि-यात्रा

गहरी पढ़ाई के लिए मिस्री परम्परा के दो विशेष ग्रंथ हैं, जो मृतकों की पुस्तक से अलग स्वर में लिखे गए। पहला है — बुक ऑफ अमदुआत, ‘जो अधःलोक में है’। यह रात्रि का नक्शा है: रात के बारह प्रहर, और हर प्रहर में सूर्य-देवता रा अपने नौका-से यान में अधःलोक के उस अंधेरे क्षेत्र से गुजरता है जहाँ मृतक भी चल रहे हैं। हर प्रहर का स्वरूप, उसके रोध, उसके रक्षक और उसके देवता — सब बारी-बारी से चित्र और पाठ के रूप में वर्णित है; यह ग्रंथ मिस्र के राजकीय स्मारकों की दीवारों पर घण्टे-दर-घण्टे चित्रित किया जाता था। इसका सन्देश सुंदर है — रात्रि भय नहीं, यात्रा है; सूर्य प्रत्येक भोर पुनः जन्म लेता है, और उसी पुनर्जन्म की आशा में मृतक की यात्रा भी है।

अध्याय 9

ग्रंथ-अध्याय

बुक ऑफ़ गेट्स — द्वारों में विन्यस्त अधोलोक

दूसरा है — बुक ऑफ गेट्स, ‘द्वारों की पुस्तक’। यह ग्रंथ अमदुआत की तरह ही रात्रि-यात्रा का वर्णन करता है, पर उसकी संरचना द्वारों में है — अधःलोक बारह द्वारों में बँटा है, हर द्वार का अपना नाम और अपना रक्षक है, और मृतक को हर द्वार पर अपना परिचय देना होता है। यहीं उन दृश्यों की परम्परा भी मिलती है जिनमें सृष्टि के अनेक मानव-समूह दिखाए गए — द्वार के पास बैठे न्यायाधीश के समक्ष सबकी परीक्षा की कल्पना। ये ग्रंथ साहित्य ही नहीं, चित्र-शास्त्र भी हैं: पाठ की तरह चित्र भी पूज्य यात्रा का नक्शा हैं।

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