इस परम्परा का केंद्रीय स्तम्भ है — माअत, अर्थात् सत्य, व्यवस्था और न्याय। माअत केवल नैतिक सिद्धान्त नहीं, ब्रह्माण्ड की वह धुरी है जिस पर सूर्य चलता है, नील बाढ़ता है और समाज टिकता है; राजा और मनुष्य दोनों का कर्तव्य था इस व्यवस्था को बनाए रखना। माअत को देवी के रूप में, सिर पर सींगों वाले पंख के साथ, चित्रित किया जाता था।
देवता अनेक थे, पर उन्हें अलग-अलग शक्तियों और स्वरूपों के रूप में समझा जाता था — एक ही देवता के कई नाम और रूप हो सकते थे, और विभिन्न देवताओं को स्थान-स्थान पर जोड़कर भी देखा जाता था। मंदिर को देवता का घर माना जाता था, जहाँ पुरोहित प्रतिदिन प्रातः-उठान, स्नान, वस्त्र और भोग की सेवा करते थे — जैसे किसी आदर्श राजकीय भवन में अतिथि की होती है।
मृत्यु के बाद के जीवन की दृष्टि इस परम्परा का सबसे विकसित अंग है। मिस्र की मान्यता में व्यक्ति के अनेक आयाम थे — उनमें ‘का’ (जीवन-शक्ति) और ‘बा’ (आत्मा-सा पक्षी-रूप में चलने वाला अंश) प्रमुख हैं; मृत देह को सुरक्षित रखना और उसे भोग-वस्तुएँ देना इसी विश्वास की सेवा था। मृतक की यात्रा कठिन मानी जाती थी, और उसी कठिन यात्रा के मार्ग-निर्देश हेतु वे ग्रंथ लिखे गए जिनका परिचय नीचे है।