यूनानी धर्म का जीवन-स्वरूप नगर (पोलिस) से बँधा था — हर नगर के अपने प्रमुख देवता, अपने मंदिर और अपने पर्व थे; किसी नगर का आराध्य दूसरे में सदैव वही नहीं होता था। देवताओं के समक्ष मनुष्य की स्थिति सामान्यतः विनम्र मानी जाती थी — देवता शक्तिशाली और मानव की अपेक्षा बहुत विशाल स्वरूप माने जाते थे, और ‘अति-स्वाभिमान’ (ह्यूब्रिस) उनकी अवमानना का गुरुतर पाप माना जाता था।
पूजा का मूल आचार बलिदान था — देवताओं के सामने पशु अर्पण, अग्नि में भाग अर्पित करना और समुदाय का साथ बैठकर भोजन करना; इसके साथ प्रार्थना, अर्पण, पावन-स्नान और पर्व-जुलूस भी थे। मंदिर को मुख्यतः देवता का निवास माना जाता था — उसकी प्रतिमा वहाँ स्थापित रहती थी, और बड़े समारोह बाह्य प्रांगण व वेदी पर होते थे।
भविष्य जानने के स्थल इस धर्म का विशेष अंग थे — सबसे प्रसिद्ध देल्फ़ी का अपोलो-मंदिर, जहाँ देवी-माध्यम के द्वारा उत्तर दिया जाता था। देल्फ़ी परिसर में खुदे दो कहे जाने वाले सूत्र — ‘स्वयं को जानो’ और ‘अति नहीं कुछ भी’ — यूनानी ज्ञान-परम्परा के स्वतःसिद्ध वाक्य बन गए। मृत्यु के बाद की दृष्टि में पाताल-जगत की कल्पना है — नदियों, परीक्षक न्यायाधीशों और आत्माओं के आवासों से युक्त चित्र, जो आगे दर्शन-परम्पराओं में विस्तृत भी हुआ।