ऐतिहासिक धार्मिक परम्परा — देव-पूजा, महाकाव्य, स्तोत्र और नगर-पर्व · एजियन संसार (प्राचीन यूनान); आज जीवित परम्परा नहीं चलती

Ancient Greek Religion

प्राचीन यूनानी धर्म: देवताओं, प्रकृति, नगर-जीवन और उत्सवों से जुड़ी एक बहुरंगी धार्मिक परम्परा।

0 ग्रंथ0 प्रमुख शाखाएँ
उद्भव
प्राचीन यूनान और एजियन क्षेत्र में विकसित; इसके कुछ देवताओं तथा पूजा-परम्पराओं के प्रमाण दूसरी सहस्राब्दी ईसा-पूर्व की माइसीनी सभ्यता में मिलते हैं।
संस्थापक/स्रोत
कोई एक संस्थापक नहीं। स्थानीय पूजा-परम्पराएँ, मौखिक कथाएँ, कवियों की रचनाएँ और सामुदायिक अनुष्ठान इसके प्रमुख स्रोत थे।
मुख्य ग्रंथ
इलियड, ओडिसी, थियोगनी, कार्य और दिवस तथा होमेरिक स्तुतियाँ महत्वपूर्ण स्रोत हैं; कोई एक सर्वमान्य धर्मग्रंथ नहीं था।
अनुयायी
लगभग संख्या बताना संभव नहीं: प्राचीन अनुयायियों की विश्वसनीय कुल गणना उपलब्ध नहीं है। आज इस परम्परा से प्रेरित पुनरुत्थानवादी समुदाय मौजूद हैं, लेकिन उनकी प्रमाणित वैश्विक संख्या उपलब्ध नहीं है।
पवित्र स्थल
डेल्फी में देवता अपोलो का पवित्र क्षेत्र, ओलिम्पिया में देवता ज़्यूस का उपासना-स्थल, एथेंस का एक्रोपोलिस, एल्यूसिस और डेलोस प्रमुख धार्मिक केंद्र थे।

उद्भव और इतिहास

यह परम्परा कैसे बनी

प्राचीन यूनानी धर्म किसी एक व्यक्ति द्वारा शुरू नहीं किया गया था। यह एजियन क्षेत्र के समुदायों की पूजा, कथाओं और सामाजिक जीवन से धीरे-धीरे विकसित हुआ। दूसरी सहस्राब्दी ईसा-पूर्व की माइसीनी सभ्यता के लेखों में कुछ ऐसे देवताओं के नाम मिलते हैं, जो बाद के यूनानी धर्म में भी महत्वपूर्ण रहे। फिर भी दोनों कालों की सभी मान्यताओं और अनुष्ठानों को एक जैसा मानना उचित नहीं है।

लगभग आठवीं शताब्दी ईसा-पूर्व से यूनानी साहित्य और पुरातात्त्विक साक्ष्य इस धर्म की अधिक स्पष्ट तस्वीर देते हैं। होमर और हेसिओड से जुड़ी काव्य-परम्पराओं ने देवताओं की कथाओं को व्यापक पहचान दी। एथेंस और अन्य नगर-राज्यों में धार्मिक उत्सव सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बने। मंदिर, वेदियाँ, खेल और नाट्य-प्रदर्शन केवल निजी श्रद्धा के विषय नहीं थे; वे नागरिक पहचान और सामुदायिक संबंधों से भी जुड़े थे।

हेलेनिस्टिक और रोमन काल में यूनानी धार्मिक परम्पराएँ नए क्षेत्रों तथा दूसरी संस्कृतियों के संपर्क में आईं। स्थानीय उपासनाओं के साथ साझा देवताओं की पूजा और दीक्षा-आधारित धार्मिक परम्पराएँ भी चलती रहीं। रोमन साम्राज्य में ईसाई धर्म के प्रसार और बाद के शासकीय प्रतिबंधों के बीच अनेक प्राचीन सार्वजनिक उपासनाएँ क्रमशः समाप्त हुईं। आधुनिक समय में कुछ समुदाय ऐतिहासिक स्रोतों से प्रेरणा लेकर यूनानी बहुदेववादी पूजा का पुनरुत्थान करते हैं।

मूल सिद्धान्त

मुख्य मान्यताएँ

01

अनेक देवता और विविध उपासनाएँ

प्राचीन यूनानी धर्म बहुदेववादी था। देवता ज़्यूस, देवता अपोलो, देवी एथेना और देवी डेमेटर सहित अनेक देवताओं की पूजा होती थी। उनके कार्यक्षेत्र कभी-कभी एक-दूसरे से जुड़े होते थे। एक ही देवता के अलग स्थानीय नाम, उपाधियाँ और अनुष्ठान हो सकते थे; सभी नगरों की पूजा बिल्कुल समान नहीं थी।

02

श्रद्धा का अनुष्ठानिक रूप

देवताओं के सम्मान में प्रार्थना, अर्पण, पेय-समर्पण और बलि जैसे अनुष्ठान किए जाते थे। धार्मिक जीवन में सही अवसर पर प्रचलित विधि निभाना महत्वपूर्ण था। उपासक सुरक्षा, स्वास्थ्य या अच्छी फसल की कामना कर सकते थे और सहायता मिलने पर धन्यवाद देते थे। इसे केवल निश्चित परिणाम देने वाला लेन-देन समझना उचित नहीं है।

03

घर, नगर और साझा उत्तरदायित्व

धर्म घर और नगर, दोनों के जीवन में उपस्थित था। परिवारों के अपने अनुष्ठान होते थे, जबकि नगर सामूहिक उत्सवों और पवित्र स्थलों की व्यवस्था करते थे। धार्मिक भागीदारी समुदाय से जुड़ाव व्यक्त करती थी। आधुनिक अर्थ में निजी धर्म और सार्वजनिक शासन के बीच स्पष्ट विभाजन उस समाज पर सीधे लागू नहीं होता।

04

सम्मान, न्याय और मानवीय सीमाएँ

अनेक कथाओं और काव्यों में देवताओं का सम्मान, शपथ की गंभीरता, अतिथि-सत्कार और न्याय महत्वपूर्ण दिखाई देते हैं। अहंकार से दूसरों या देवताओं का अपमान करना संकट का कारण बताया जा सकता था। फिर भी इस धर्म में सबके लिए एक समान लिखित नैतिक संहिता नहीं थी; विचार और आचरण समय तथा स्थान के अनुसार बदलते थे।

05

पवित्रता और शुद्धिकरण

कुछ घटनाओं और परिस्थितियों के बाद धार्मिक शुद्धिकरण आवश्यक माना जाता था। जल से शुद्धि और विशेष अनुष्ठान पवित्र स्थलों में प्रवेश या पूजा की तैयारी का हिस्सा हो सकते थे। धार्मिक अशुद्धि हमेशा नैतिक अपराध का पर्याय नहीं थी; जन्म और मृत्यु जैसी जीवन-घटनाएँ भी कुछ संदर्भों में उससे जुड़ती थीं।

06

मृत्यु के बाद जीवन की विविध धारणाएँ

कथाओं में मृतकों के लोक और देवता हेडीस का उल्लेख मिलता है, लेकिन मृत्यु के बाद की स्थिति पर एक ही सर्वमान्य मत नहीं था। कुछ दीक्षा-परम्पराएँ बेहतर परलोक की आशा से जुड़ी थीं। अंतिम संस्कार और मृतकों का सम्मान महत्वपूर्ण थे, जबकि दार्शनिकों तथा विभिन्न समुदायों की व्याख्याएँ अलग हो सकती थीं।

पवित्र ग्रंथ

धार्मिक ग्रंथ — सार में

1इलियडἸλιάς · वर्तमान काव्यरूप सामान्यतः लगभग आठवीं शताब्दी ईसा-पूर्व के उत्तरार्ध या सातवीं शताब्दी ईसा-पूर्व के आरम्भ से जोड़ा जाता है।▾

परम्परा अनुसार होमर से संबद्ध यह महाकाव्य ट्रॉय के युद्ध की पूरी कथा नहीं, बल्कि उसके एक सीमित चरण की घटनाएँ प्रस्तुत करता है। केंद्र में अखिलीस का क्रोध, योद्धाओं का सम्मान, हानि और मृत्यु हैं। देवता ज़्यूस, देवी हेरा, देवी एथेना और देवता अपोलो जैसे देवता घटनाओं में हस्तक्षेप करते हैं। प्रार्थना, बलि, शपथ और अंत्येष्टि के वर्णन तत्कालीन धार्मिक कल्पना समझने में सहायक हैं। यह पूजा-विधि की संहिता नहीं है। इसका काव्य मानवीय सीमाओं, करुणा और युद्ध की पीड़ा पर विचार कराता है, लेकिन हर प्रसंग को पूरे यूनानी समाज की एकमात्र धार्मिक मान्यता नहीं माना जा सकता।

2ओडिसीὈδύσσεια · लगभग आठवीं शताब्दी ईसा-पूर्व के उत्तरार्ध से सातवीं शताब्दी ईसा-पूर्व के आरम्भ के बीच का काव्यरूप माना जाता है।▾

परम्परा अनुसार होमर से संबद्ध ओडिसी, ट्रॉय के युद्ध के बाद ओडिसियस की कठिन घर-वापसी और उसके परिवार की परिस्थितियों का महाकाव्य है। इसमें देवी एथेना की सहायता तथा देवता पोसाइडन के विरोध सहित अनेक दैवी प्रसंग आते हैं। अतिथि-सत्कार, पहचान, निष्ठा, बुद्धिमत्ता और घर की व्यवस्था इसके प्रमुख विषय हैं। प्रार्थना, अर्पण और मृतकों से संबंधित प्रसंग यूनानी धार्मिक संसार की झलक देते हैं। यह किसी एक संप्रदाय का नियम-पुस्तक नहीं है। कथा दिखाती है कि मनुष्य का प्रयास, सामाजिक कर्तव्य और दैवी शक्तियों के प्रति व्यवहार आपस में कैसे जुड़े समझे जाते थे; इसके भीतर नैतिक जटिलताएँ भी हैं।

3थियोगनीΘεογονία · लगभग 700 ईसा-पूर्व के आसपास।▾

हेसिओड की थियोगनी देवताओं की उत्पत्ति, वंश-संबंधों और दैवी सत्ता के क्रमिक परिवर्तन का काव्यात्मक विवरण है। इसमें संसार के आरम्भ की अवस्थाओं, प्रारम्भिक दैवी शक्तियों, टाइटनों और देवता ज़्यूस की सत्ता स्थापित होने की कथाएँ आती हैं। यह समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है कि एक प्रभावशाली यूनानी काव्य-परम्परा ब्रह्मांड और देवताओं के बीच संबंधों को कैसे व्यवस्थित करती थी। इसका मुख्य विषय केवल जन्म-सूची नहीं, बल्कि संघर्ष के बाद दैवी व्यवस्था का बनना भी है। इसे आधुनिक वैज्ञानिक विवरण या सभी स्थानीय कथाओं का अंतिम निर्णय नहीं समझना चाहिए। अन्य क्षेत्रों और रचनाओं में उत्पत्ति-कथाओं के अलग रूप भी मिलते हैं।

4कार्य और दिवसἜργα καὶ Ἡμέραι · लगभग 700 ईसा-पूर्व के आसपास।▾

हेसिओड की यह शिक्षात्मक कविता श्रम, न्याय, कृषि और दैनिक जीवन पर विचार प्रस्तुत करती है। इसमें देवता ज़्यूस के न्याय से जुड़े प्रसंग, मानव युगों की कथा और पांडोरा का प्रसंग भी आते हैं। कविता ईमानदार परिश्रम, समय की पहचान और अन्याय से बचने पर बल देती है। खेती और समुद्री यात्रा संबंधी सलाह के साथ शुभ-अशुभ दिनों तथा धार्मिक व्यवहार का उल्लेख दिखाता है कि जीविका और आस्था अलग-अलग संसार नहीं थे। यह सार्वभौमिक धार्मिक कानून नहीं, बल्कि एक विशेष सामाजिक परिवेश की काव्यात्मक शिक्षा है। इसके माध्यम से ग्रामीण जीवन, नैतिक चिंता और दैवी व्यवस्था के संबंध समझे जा सकते हैं।

5होमेरिक स्तुतियाँὉμηρικοὶ ὕμνοι · विभिन्न रचनाएँ; प्रमुख लंबी स्तुतियाँ लगभग सातवीं से पाँचवीं शताब्दी ईसा-पूर्व की हैं, जबकि कुछ अन्य बाद की हैं।▾

होमेरिक स्तुतियाँ अलग-अलग देवताओं को संबोधित काव्यरचनाओं का संग्रह हैं। नाम के बावजूद इन्हें एक ही कवि होमर की रचनाएँ मानना उचित नहीं है; इनकी भाषा और छंद होमेरिक काव्य-परम्परा से जुड़े हैं। देवी डेमेटर, देवता अपोलो, देवता हर्मीस और देवी अफ्रोडाइट को समर्पित लंबी स्तुतियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इनमें देवताओं की शक्तियों, जन्म, यात्राओं और उपासना-स्थलों से संबंधित कथाएँ आती हैं। देवी डेमेटर की स्तुति एल्यूसिस की धार्मिक परम्परा समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है। संग्रह भक्ति, कथा और अनुष्ठानिक स्मृति का मेल दिखाता है, लेकिन सभी स्तुतियों का वास्तविक प्रदर्शन-संदर्भ निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है।

आचार

उपासना और साधना

प्रार्थना और अर्पण

उपासक देवताओं से प्रार्थना करते और भोजन, फूल, वस्तुएँ या पेय अर्पित करते थे। पेय का कुछ भाग धरती या वेदी पर समर्पित करना प्रचलित था। अर्पण सहायता की कामना, धन्यवाद या किसी प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिए किया जा सकता था।

बलि और सामुदायिक भोजन

अनेक सार्वजनिक उत्सवों में पशुबलि दी जाती थी और उसका मांस सामूहिक भोजन में बाँटा जाता था। अनुष्ठान की विधि और अर्पण का प्रकार देवता तथा अवसर के अनुसार बदलता था। अनाज, फल और अन्य पशुरहित अर्पण भी धार्मिक जीवन का हिस्सा थे।

मंदिर, वेदियाँ और शोभायात्राएँ

मंदिरों में प्रायः देवता की प्रतिमा और अर्पित वस्तुएँ रखी जाती थीं, जबकि अनेक प्रमुख अनुष्ठान बाहर की वेदियों पर होते थे। उत्सवों में शोभायात्राएँ निकलती थीं। पवित्र क्षेत्र की देखभाल और अनुष्ठानों का आयोजन समुदाय तथा नियुक्त धार्मिक पदाधिकारियों की जिम्मेदारी हो सकती थी।

दैवज्ञों से परामर्श

व्यक्ति और नगर महत्वपूर्ण निर्णयों पर दैवी मार्गदर्शन पाने के लिए दैवज्ञ-केंद्रों से परामर्श कर सकते थे। डेल्फी में देवता अपोलो का केंद्र विशेष प्रसिद्ध था। पक्षियों और बलि संबंधी संकेतों की व्याख्या जैसी अन्य भविष्यसूचक विधियाँ भी प्रचलित थीं।

दीक्षा और रहस्य-अनुष्ठान

कुछ उपासनाओं में भाग लेने के लिए विशेष दीक्षा ली जाती थी। एल्यूसिस के अनुष्ठान देवी डेमेटर और देवी पर्सेफोनी से जुड़े थे। इनके कुछ विवरण गोपनीय रखे जाते थे, इसलिए आधुनिक इतिहासकार उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इनके सभी चरण निश्चित रूप से नहीं बता सकते।

पर्व और प्रतीक

त्योहार, प्रतीक और मूल सीख

पानाथेनाइया

एथेंस में देवी एथेना के सम्मान का प्रमुख उत्सव था। इसमें शोभायात्रा और अर्पण होते थे; हर चौथे वर्ष मनाए जाने वाले बड़े आयोजन में खेल और संगीत प्रतियोगिताएँ भी शामिल थीं।

ओलिम्पिक उत्सव

ओलिम्पिया में देवता ज़्यूस के सम्मान में आयोजित इस उत्सव में खेल प्रतियोगिताएँ और धार्मिक अनुष्ठान जुड़े थे। यह केवल खेलकूद नहीं, बल्कि विभिन्न यूनानी समुदायों के मिलने का महत्वपूर्ण अवसर भी था।

नगर डायोनिसिया

एथेंस का यह उत्सव देवता डायोनिसस को समर्पित था। शोभायात्राओं और धार्मिक अर्पणों के साथ नाट्य-प्रतियोगिताएँ आयोजित होती थीं, जिनमें त्रासदी और हास्य नाटक प्रस्तुत किए जाते थे।

थेस्मोफोरिया

देवी डेमेटर और देवी पर्सेफोनी से जुड़ा यह उत्सव अनेक यूनानी समुदायों में मनाया जाता था। इसमें मुख्यतः विवाहित स्त्रियाँ भाग लेती थीं; कृषि और उर्वरता इसके महत्वपूर्ण विषय थे।

पाइथियन उत्सव

डेल्फी में देवता अपोलो के सम्मान में आयोजित इस उत्सव में संगीत और खेल प्रतियोगिताएँ होती थीं। यह प्रमुख साझा यूनानी उत्सवों में गिना जाता था और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ा था।

  • ◆ वज्र — देवता ज़्यूस की शक्ति और आकाशीय अधिकार से जुड़ा चिह्न।
  • ◆ त्रिशूल — देवता पोसाइडन और समुद्र पर उनके अधिकार का चिह्न।
  • ◆ उल्लू — देवी एथेना से संबद्ध पक्षी और प्राचीन एथेंस का प्रसिद्ध चिह्न।
  • ◆ लॉरेल की शाखा — देवता अपोलो तथा सम्मान और विजय से जुड़ा प्रतीक।
  • ◆ गेहूँ की बालियाँ — देवी डेमेटर, कृषि और अन्न की समृद्धि से संबद्ध चिह्न।
  • ◆ थिर्सोस दंड — देवता डायोनिसस और उनकी उत्सवी उपासना से जुड़ा, वनस्पतियों से सजाया जाने वाला दंड।
इस विविध परम्परा की कोई एक आधिकारिक मूल सीख नहीं थी। फिर भी इसके अनेक स्रोत देवताओं का सम्मान, समुदाय के प्रति दायित्व, अतिथि-सत्कार, न्याय और अपनी मानवीय सीमाओं की पहचान को महत्व देते हैं। इसे समझने की कुंजी है: कथाओं के साथ अनुष्ठानों, स्थानीय भिन्नताओं और दैनिक जीवन को भी देखना।

अध्यायवार अध्ययन

प्राचीन यूनानी धर्म — विस्तृत पाठ

विषय और ग्रंथ अलग अध्यायों में पढ़ें। प्रत्येक ग्रंथ की अपनी स्थिति और परम्परागत मर्यादा साथ दी गई है।

अध्याय 1

विषयगत परिचय

परिचय और सांस्कृतिक संदर्भ

प्राचीन यूनानी धर्म नगरों, द्वीपों और समुद्र-तटों से जुड़ा धर्म था — देवता ओलम्पुस की ऊँचाइयों में और प्रकृति के हर स्थान में माने जाते थे: ज़्यूस (आकाश और न्याय), हेरा, एथीना, अपोलो, आर्टेमिस, डायोनाइसस, एफ़्रोडाइटी और अनेक और। यहाँ कोई एक संगठित पुरोहित-संस्था या बाध्यकारी शास्त्र-संहिता नहीं थी — धर्म मंदिरों के बलिदान, नगरों के पर्व, पूछ-परीक्षा के स्थलों (जैसे देल्फ़ी) और कवियों की गाई जाने वाली कविता के माध्यम से जीया जाता था। यही कारण है कि इस परम्परा का वाङ्मय — महाकाव्य, स्तोत्र और देव-कथाएँ — साहित्य और धर्म दोनों रूपों में पढ़ा जाता है। ध्यान रहे — यह परम्परा आज जीवित नहीं चलती; जो कुछ हमें मिला है, वह पाण्डुलिपियों, शिलालेखों, मूर्तियों और मंदिर-अवशेषों के माध्यम से है।

अध्याय 2

मूल मान्यताएँ

प्रमुख आधार और दृष्टियाँ

यूनानी धर्म का जीवन-स्वरूप नगर (पोलिस) से बँधा था — हर नगर के अपने प्रमुख देवता, अपने मंदिर और अपने पर्व थे; किसी नगर का आराध्य दूसरे में सदैव वही नहीं होता था। देवताओं के समक्ष मनुष्य की स्थिति सामान्यतः विनम्र मानी जाती थी — देवता शक्तिशाली और मानव की अपेक्षा बहुत विशाल स्वरूप माने जाते थे, और ‘अति-स्वाभिमान’ (ह्यूब्रिस) उनकी अवमानना का गुरुतर पाप माना जाता था।

पूजा का मूल आचार बलिदान था — देवताओं के सामने पशु अर्पण, अग्नि में भाग अर्पित करना और समुदाय का साथ बैठकर भोजन करना; इसके साथ प्रार्थना, अर्पण, पावन-स्नान और पर्व-जुलूस भी थे। मंदिर को मुख्यतः देवता का निवास माना जाता था — उसकी प्रतिमा वहाँ स्थापित रहती थी, और बड़े समारोह बाह्य प्रांगण व वेदी पर होते थे।

भविष्य जानने के स्थल इस धर्म का विशेष अंग थे — सबसे प्रसिद्ध देल्फ़ी का अपोलो-मंदिर, जहाँ देवी-माध्यम के द्वारा उत्तर दिया जाता था। देल्फ़ी परिसर में खुदे दो कहे जाने वाले सूत्र — ‘स्वयं को जानो’ और ‘अति नहीं कुछ भी’ — यूनानी ज्ञान-परम्परा के स्वतःसिद्ध वाक्य बन गए। मृत्यु के बाद की दृष्टि में पाताल-जगत की कल्पना है — नदियों, परीक्षक न्यायाधीशों और आत्माओं के आवासों से युक्त चित्र, जो आगे दर्शन-परम्पराओं में विस्तृत भी हुआ।

अध्याय 3

आचार और सामुदायिक जीवन

मंदिर, पर्व और दैनिक पूजा

नगरों के विशाल पर्व इस धर्म की आत्मा थे — एथीना नगर का वह पर्व जिसमें नगर-भर जुलूस देवी को नया वस्त्र अर्पित करता, ओलम्पिया के ज़्यूस-पर्व के उत्सव, जिन्हें बाद की ओलम्पिक-परम्परा से जोड़ा जाता है, और डायोनाइसस के पर्व जिनमें कथा-गान और नाटक सँवरे। इन उत्सवों में बलिदान, जुलूस, संगीत, खेल और काव्य-गान एक साथ होते थे — धर्म, समाज और कला एक ही आयोजन में मिलते थे।

घर की पूजा का केंद्र अलग था — देवताओं के साथ पूर्वजों की वंदना और अग्नि-स्थान (हेस्टिया की वेदी) की चौकसी; यात्रा से पहले वापसी पर, भोजन के पहले-बाद में अर्पण-प्रथा सामान्य थी। भविष्य-सूचना के साधन भी जीवन का अंग थे — देल्फ़ी जैसे मंदिर-स्थल, पक्षियों की उड़ान के संकेत और विशेष स्थानों की पूछ-परीक्षा; इन्हें मंत्रियों (देव-परामर्शदाताओं) की तरह समझा जाता था।

अध्याय 4

विविधता-सूचना

शाखाएँ, पाठ-परम्परा और मर्यादा

यूनानी धर्म नगर-नगर, द्वीप-द्वीप और युग-युग में भिन्न रहा — हर स्थान के अपने आराध्य, अपने पर्व और अपने ग्रंथ-संग्रह थे; महाकाव्यों में दिए देव-चरित्रों को पारम्परिक और दार्शनिक धाराओं ने अलग-अलग रूप से पढ़ा है, और यह पृष्ठ किसी एक रूप को एकमात्र सही नहीं मानता।

अध्याय 5

ग्रंथ-अध्याय

इलियड — युद्ध, क्रोध और देव-मानव संबंध

यूनानी धर्म-साहित्य की पढ़ाई उसी वाङ्मय से आरम्भ होती है जिसे यूरोप के सबसे प्राचीन महाकाव्यों में गिना जाता है — इलियड और ओडिसी, दोनों का स्थान कवि होमर की परम्परा में है। ये शास्त्र-संहिता नहीं, कथा-काव्य हैं — पर उन्होंने यूनानी संसार को देवताओं का वह साझा चित्र दिया जो शास्त्र देता है। इलियड त्रोय-युद्ध के एक अंश की कथा है — योद्धा एकिलीस का क्रोध, उसका रोष और पश्चात् उसकी करुणा — पर इसकी हर घटना के चारों ओर देवता भी चलते हैं: ज़्यूस के सिंहासन से लेकर युद्ध-भूमि तक, कोई देवता किसी पक्ष में, कोई किसी में — मनुष्यों की कथा और देवताओं की इच्छा एक-दूसरे में उतरती हैं।

अध्याय 6

ग्रंथ-अध्याय

ओडिसी — घर-वापसी, आतिथ्य और मर्यादा

ओडिसी योद्धा ओडिसियस की घर-वापसी की कथा है — दस वर्षों की सागर-यात्रा, अनेक प्रतिकूल शक्तियों से मुलाक़ात और अन्त में स्वदेश। इस काव्य में यूनानी धर्म की नैतिक मर्यादाओं का जीता-जागता चित्र मिलता है — अतिथि-मर्यादा (ज़ेनिया): अजनबी के प्रति सत्कार को देवताओं की अपेक्षा के रूप में देखना; अति-स्वाभिमान का दण्ड: जो देवताओं को छोटा समझता है, सागर उसे पकड़ लेते हैं। साथ ही देवी एथीना की यात्री-सहायता दिखाती है कि यूनानी दृष्टि में सहयोग और बुद्धि भी देव-अनुग्रह के मार्ग हैं।

अध्याय 7

ग्रंथ-अध्याय

थियोगोनी — देवताओं की वंशावली

देवताओं की उत्पत्ति की कथा गायक-कवि हेसिओड के ग्रंथ थियोगोनी में मिलती है — इसका नाम ही ‘देवताओं की उत्पत्ति’ का काव्य है। यहाँ सृष्टि की गाथा है: सबसे पहले रिक्तता (केऑस), फिर पृथ्वी (गेया) और आकाश (यूरेनस) — फिर देवताओं की वह पीढ़ी-शृंखला जिसमें आकाश-देवता का पतन, उसके पुत्र क्रोनस का राज्य और उसके पुत्र ज़्यूस का उत्थान हुआ; ज़्यूस शक्तिशाली दानवों को पराजित कर देवताओं का राजा बनता है। इस काव्य ने यूनानी धर्म को वह साझा ‘देव-वंशावली’ दी जो बाद की सारी कविता और कथा का आधार बनी।

अध्याय 8

ग्रंथ-अध्याय

होमेरिक हिम्न्स — देव-स्तोत्र और कथा

फिर आता है वह वाङ्मय जो सीधे पूजा का भाग था — होमेरिक हिम्न्स, अर्थात् ‘होमर-परम्परा के स्तोत्र’। ये अनेक संक्षिप्त और दीर्घ देव-स्तोत्र हैं, जिनमें एक-एक देवता की वंदना, उसका परिचय और उसकी उत्पत्ति की कथा गाई जाती है — जन्म से देवता के प्रकट होने तक: डेलोस द्वीप पर अपोलो का जन्म, नवजात हर्मीज़ की प्रथम चतुराई, देवताओं की सभा में प्रवेश — हर स्तोत्र में एक देवता का स्वरूप बनता है। ये स्तोत्र संभवतः कथा-गायकों के आरम्भिक गान-पाठ रहे हैं — कथा सुनाने से पहले उस देवता की वंदना।

अध्याय 9

ग्रंथ-अध्याय

ऑर्फिक हिम्न्स — अनुष्ठानिक स्तोत्र-संग्रह

पूजा के गूढ़ पक्ष का वाङ्मय है — ऑर्फिक हिम्न्स, ‘ओर्फ़ियस-परम्परा के स्तोत्र’। ये अनेक संक्षिप्त स्तोत्र हैं, जिनमें देवताओं को नाम, रूप और गुणों से सम्बोधित किया गया है — रात्रि, सूर्य, नेक्टर-स्वर देवता और अनेक और। ये स्तोत्र ओर्फ़ियस की परम्परा से जुड़े माने जाते हैं — वह पौराणिक कवि और गायक जिसकी वीणा देवताओं और मनुष्यों, यहाँ तक कि पाताल को भी भाती थी। ओर्फ़िक धारा में देवता डायोनाइसस का विशेष स्थान है, आत्मा की बारहमासी यात्रा (पुनर्जन्म) की दृष्टि मिलती है, और गूढ़ समारोहों (रहस्य-उत्सवों) की मर्यादा है, जिनके बारे में प्रतिज्ञा करके ही प्रवेश मिलता था। यह परम्परा यूनानी धर्म के सामान्य नगर-आचार से अलग, आध्यात्मिक-गूढ़ पक्ष की साधना रही है।

अध्याय 10

ग्रंथ-अध्याय

वर्क्स एंड डेज़ — श्रम, न्याय और ऋतु

हेसिओड का दूसरा ग्रंथ वर्क्स एंड डेज़ (‘कर्म और दिवस’) इसी कथा-प्रवाह में एक अलग स्वर है — देवताओं की दुनिया से साधारण मनुष्य के जीवन तक। यहाँ कवि अपने भाई को न्याय करने, ईमानदार श्रम करने, ऋतु के अनुसार खेती-जहाज़ चलाने की शिक्षा देता है। ग्रंथ में मानव-युगों की कथा है — स्वर्ण, रजत, ताम्र, नायकों का युग और लोहे का वर्तमान युग, जिसमें दुर्भाग्य बढ़ा है; पाण्डोरा की कथा है — देवताओं का प्रेषित वह जुड़वाँ-स्वरूप जिसमें संसार में दुःख के साथ आशा भी सँजोई गई। ग्रंथ का केंद्रीय संदेश स्पष्ट है — ज़्यूस के न्याय की अवमानना नगर को नष्ट करती है, और श्रम व न्याय ही मनुष्य का धर्म है।

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