विश्व की मूलनिवासी परम्पराएँ किसी एक धर्म का नाम नहीं हैं। यह अभिव्यक्ति उन विविध धार्मिक और सांस्कृतिक विरासतों के लिए प्रयुक्त होती है जो विशिष्ट समुदायों, उनके पैतृक क्षेत्रों और ऐतिहासिक अनुभवों से जुड़ी हैं। अमेरिका, अफ्रीका, एशिया, ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत क्षेत्र में इनके अलग-अलग रूप मिलते हैं। इनका उद्भव प्रायः किसी एक घटना से नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक संचित कथाओं, आजीविका, रिश्तों और अनुष्ठानों से समझा जाता है।
इन परम्पराओं का इतिहास केवल प्राचीन अतीत तक सीमित नहीं है। समुदायों के बीच व्यापार, प्रवास और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से इनके रूप बदलते रहे। कई क्षेत्रों में उपनिवेशवाद, भूमि से विस्थापन, धार्मिक दमन और बच्चों को समुदाय से अलग करने वाली नीतियों ने ज्ञान के हस्तांतरण को गंभीर क्षति पहुँचाई। फिर भी परिवारों, बुज़ुर्गों और अनुष्ठान-विशेषज्ञों ने अनेक भाषाओं, स्मृतियों और धार्मिक प्रथाओं को जीवित रखा।
आज मूलनिवासी परम्पराएँ जीवित और परिवर्तनशील हैं। कई समुदाय अपनी भाषाओं, पवित्र स्थलों और पारम्परिक ज्ञान के संरक्षण तथा पुनर्जीवन में सक्रिय हैं। कुछ लोग पूर्वजों की प्रथाओं के साथ ईसाई धर्म या अन्य धार्मिक संबद्धताएँ भी रखते हैं; दूसरे अपनी विशिष्ट परम्परा पर बल देते हैं। संग्रहालयों से पवित्र वस्तुओं की वापसी, भूमि-अधिकार और ज्ञान पर सामुदायिक नियंत्रण भी महत्त्वपूर्ण विषय हैं। इन्हें केवल अतीत की विरासत मानना इसलिए अधूरा होगा।