जैन धर्म का उद्भव प्राचीन भारत की श्रमण परम्परा के परिवेश में हुआ। इस परिवेश में तप, संयम, कर्म और जन्म-मरण से मुक्ति पर गहरा विचार किया जाता था। जैन परम्परा अपने धर्म को अनादि मानती है और वर्तमान कालचक्र में 24 तीर्थंकरों की शिक्षा का स्मरण करती है। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभनाथ हैं। इन प्राचीन धार्मिक स्मृतियों और आधुनिक इतिहास द्वारा प्रमाणित घटनाओं के बीच अंतर रखना आवश्यक है।
इतिहास की दृष्टि से भगवान महावीर जैन धर्म के सबसे स्पष्ट रूप से ज्ञात प्रारम्भिक शिक्षकों में हैं। उनका जीवन लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तर भारतीय परिवेश से जुड़ा था। वे चौबीसवें तीर्थंकर माने जाते हैं; उनसे पहले भगवान पार्श्वनाथ की परम्परा थी। भगवान महावीर ने कठोर साधना के बाद मुक्ति का मार्ग सिखाया। उनकी शिक्षाओं को साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका के चार अंगों वाले संघ ने आगे बढ़ाया।
समय के साथ जैन समुदाय पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी भारत सहित अनेक क्षेत्रों में विकसित हुए। दिगम्बर और श्वेताम्बर प्रमुख परम्पराएँ बनीं, जिनमें मुनि-आचार, ग्रंथों और कुछ धार्मिक मान्यताओं के विषय में अंतर है। प्राकृत, संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में समृद्ध साहित्य रचा गया। व्यापार, कला, स्थापत्य और पांडुलिपि-संरक्षण में भी जैन समुदायों का योगदान रहा। आज भारत के बाहर बसे समुदाय भी पूजा, अध्ययन और अहिंसा की परम्परा को आगे बढ़ाते हैं।