तीर्थंकर-परम्परा, अहिंसा और तप पर आधारित धर्म · भारत में आरम्भ; आज विश्वव्यापी

जैन धर्म

जैन धर्म आत्मसंयम, अहिंसा और अनेक दृष्टियों के सम्मान के सहारे आत्मा की मुक्ति का मार्ग दिखाता है।

0 ग्रंथ0 प्रमुख शाखाएँ
उद्भव
प्राचीन भारत की श्रमण परम्परा में विकसित धर्म; भगवान महावीर का काल लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है।
संस्थापक/स्रोत
जैन परम्परा में 24 तीर्थंकर माने जाते हैं। भगवान ऋषभनाथ प्रथम और भगवान महावीर चौबीसवें तीर्थंकर हैं; भगवान महावीर ऐतिहासिक रूप से इसके प्रमुख प्रवर्तक थे।
मुख्य ग्रंथ
आगम साहित्य, तत्त्वार्थसूत्र, समयसार तथा आचार, दर्शन और कथाओं से जुड़े अनेक ग्रंथ; अलग सम्प्रदायों की ग्रंथ-मान्यताओं में भिन्नता है।
अनुयायी
लगभग 44 लाख भारत में, भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार; अन्य देशों में भी जैन समुदाय रहते हैं।
पवित्र स्थल
सम्मेद शिखरजी, पावापुरी, शत्रुंजय–पालिताना, गिरनार और श्रवणबेलगोला प्रमुख जैन तीर्थों में शामिल हैं।

उद्भव और इतिहास

यह परम्परा कैसे बनी

जैन धर्म का उद्भव प्राचीन भारत की श्रमण परम्परा के परिवेश में हुआ। इस परिवेश में तप, संयम, कर्म और जन्म-मरण से मुक्ति पर गहरा विचार किया जाता था। जैन परम्परा अपने धर्म को अनादि मानती है और वर्तमान कालचक्र में 24 तीर्थंकरों की शिक्षा का स्मरण करती है। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभनाथ हैं। इन प्राचीन धार्मिक स्मृतियों और आधुनिक इतिहास द्वारा प्रमाणित घटनाओं के बीच अंतर रखना आवश्यक है।

इतिहास की दृष्टि से भगवान महावीर जैन धर्म के सबसे स्पष्ट रूप से ज्ञात प्रारम्भिक शिक्षकों में हैं। उनका जीवन लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तर भारतीय परिवेश से जुड़ा था। वे चौबीसवें तीर्थंकर माने जाते हैं; उनसे पहले भगवान पार्श्वनाथ की परम्परा थी। भगवान महावीर ने कठोर साधना के बाद मुक्ति का मार्ग सिखाया। उनकी शिक्षाओं को साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका के चार अंगों वाले संघ ने आगे बढ़ाया।

समय के साथ जैन समुदाय पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी भारत सहित अनेक क्षेत्रों में विकसित हुए। दिगम्बर और श्वेताम्बर प्रमुख परम्पराएँ बनीं, जिनमें मुनि-आचार, ग्रंथों और कुछ धार्मिक मान्यताओं के विषय में अंतर है। प्राकृत, संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में समृद्ध साहित्य रचा गया। व्यापार, कला, स्थापत्य और पांडुलिपि-संरक्षण में भी जैन समुदायों का योगदान रहा। आज भारत के बाहर बसे समुदाय भी पूजा, अध्ययन और अहिंसा की परम्परा को आगे बढ़ाते हैं।

मूल सिद्धान्त

मुख्य मान्यताएँ

01

अहिंसा: जीवन के प्रति सावधानी

अहिंसा जैन आचार का केन्द्रीय आधार है। इसका अर्थ केवल किसी को न मारना नहीं, बल्कि विचार, वाणी और व्यवहार से होने वाली हानि को कम करना भी है। जैन दृष्टि में पशु-पक्षियों से लेकर सूक्ष्म जीवों तक जीवन सम्मान योग्य है। साधु-साध्वियों के लिए इसके नियम गृहस्थों की अपेक्षा अधिक कठोर होते हैं।

02

जीव, कर्म और मुक्ति

जैन दर्शन में जीव चेतन है और कर्म के बंधन के कारण जन्म-मरण के चक्र में रहता है। कर्म को आत्मा से बँधने वाला सूक्ष्म पुद्गल माना जाता है। संयम, तप और सही आचरण से कर्मों का बंधन रोका और क्षय किया जाता है। पूर्ण मुक्ति प्राप्त आत्मा सिद्ध कहलाती है; सृष्टि के लिए किसी सर्जक ईश्वर को आवश्यक नहीं माना जाता।

03

रत्नत्रय: मुक्ति के तीन आधार

सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र को रत्नत्रय कहा जाता है। सरल अर्थ में ये सत्य के प्रति उचित श्रद्धा, वस्तुओं की सही समझ और उसके अनुरूप जीवन हैं। जैन शिक्षा में केवल जानकारी या बाहरी अनुष्ठान पर्याप्त नहीं माने जाते। समझ, दृष्टि और व्यवहार का मेल आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है।

04

अनेकान्तवाद और स्याद्वाद

अनेकान्तवाद के अनुसार वास्तविकता के अनेक पक्ष होते हैं, जिन्हें एक सीमित कथन पूरी तरह नहीं समेट सकता। स्याद्वाद कथनों को उनकी शर्तों और दृष्टिकोणों के संदर्भ में समझने की पद्धति है। इसका आशय यह नहीं कि हर दावा समान रूप से सही है। यह विचार में सावधानी और दूसरे दृष्टिकोण को समझने का आग्रह करता है।

05

पाँच व्रत और अपरिग्रह

अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैन आचार के पाँच प्रमुख व्रत हैं। अपरिग्रह वस्तुओं तथा उनसे जुड़ी आसक्ति को सीमित करने की शिक्षा देता है। साधु-साध्वियाँ इन्हें महाव्रत के रूप में अपनाते हैं, जबकि गृहस्थ जीवन की परिस्थितियों के अनुसार सीमित रूप, अर्थात अणुव्रत, ग्रहण करते हैं। लक्ष्य इच्छाओं और व्यवहार पर सजग नियंत्रण है।

पवित्र ग्रंथ

धार्मिक ग्रंथ — सार में

1आचारांग सूत्रĀcārāṅga Sūtra / Āyāraṅga · सबसे पुराने अंश लगभग अंतिम कुछ शताब्दियों ईसा पूर्व के माने जाते हैं; उपलब्ध श्वेताम्बर आगमिक रूप का संकलन लगभग पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ।▾

आचारांग सूत्र श्वेताम्बर आगम परम्परा के प्रमुख और प्राचीन ग्रंथों में है। इसका मुख्य विषय साधु का आचरण, अहिंसा और संयमपूर्ण जीवन है। इसमें चलने, भोजन ग्रहण करने और दैनिक गतिविधियों में जीवों को हानि से बचाने की सावधानी समझाई गई है। भगवान महावीर की तपस्या और सहनशीलता से जुड़े वर्णन भी मिलते हैं। ग्रंथ बताता है कि आध्यात्मिक साधना केवल विचार नहीं, बल्कि हर क्रिया में जागरूकता माँगती है। इसमें त्याग, इन्द्रिय-संयम और आसक्ति से दूरी को महत्त्व मिलता है। इसे पढ़ते समय ध्यान रखना चाहिए कि इसके अनेक निर्देश विशेष रूप से मुनि-जीवन के लिए हैं, सभी गृहस्थों के लिए समान नियम नहीं।

2सूत्रकृतांग सूत्रSūtrakṛtāṅga Sūtra / Sūyagaḍaṅga · प्राचीन स्तर लगभग अंतिम कुछ शताब्दियों ईसा पूर्व के; विभिन्न स्तरों का काल अनिश्चित, उपलब्ध श्वेताम्बर आगमिक संकलन लगभग पाँचवीं शताब्दी ईस्वी का।▾

सूत्रकृतांग सूत्र श्वेताम्बर आगम साहित्य का एक प्रमुख ग्रंथ है। इसमें जैन साधना के साथ उस समय प्रचलित विभिन्न दार्शनिक मतों पर चर्चा और उनकी समीक्षा मिलती है। इसके मुख्य विषय आत्मा, कर्म, नैतिक उत्तरदायित्व, संयम और मुक्ति हैं। ग्रंथ साधक को असावधानी, आसक्ति और भ्रमपूर्ण दृष्टियों से बचने की शिक्षा देता है। अहिंसा यहाँ केवल व्यवहार का नियम नहीं, बल्कि व्यापक आध्यात्मिक अनुशासन का हिस्सा है। संवाद, तर्क और उपदेश के माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि सही समझ का संबंध जीवनचर्या से है। अन्य मतों के वर्णनों को प्राचीन धार्मिक वाद-विवाद के संदर्भ में पढ़ना उपयोगी है, निष्पक्ष आधुनिक विवरण की तरह नहीं।

3उत्तराध्ययन सूत्रUttarādhyayana Sūtra / Uttarajjhayaṇa · विभिन्न अंश लगभग अंतिम शताब्दियों ईसा पूर्व से प्रारम्भिक शताब्दियों ईस्वी के बीच विकसित माने जाते हैं; निश्चित रचना-तिथि ज्ञात नहीं।▾

उत्तराध्ययन सूत्र श्वेताम्बर परम्परा का महत्त्वपूर्ण आगमिक ग्रंथ है, जिसमें 36 अध्याय हैं। इसमें उपदेश, संवाद और कथाओं के माध्यम से साधना का मार्ग समझाया गया है। विनय, गुरु-शिष्य संबंध, जीवन की अनित्यता, कर्म, संयम और मुक्ति इसके प्रमुख विषय हैं। कथात्मक शैली कठिन विचारों को अपेक्षाकृत सहज बनाती है। यह याद दिलाता है कि जन्म या बाहरी प्रतिष्ठा की अपेक्षा व्यक्ति का आचरण आध्यात्मिक मूल्य रखता है। साधु-जीवन के अनुशासन के साथ ऐसा नैतिक चिंतन भी मिलता है जो गृहस्थ पाठकों के लिए उपयोगी है। इसके अनेक स्तर हैं, इसलिए पूरे ग्रंथ को एक ही समय की रचना मानना उचित नहीं।

4तत्त्वार्थसूत्रTattvārthasūtra · लगभग दूसरी–पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के बीच; आचार्य उमास्वाति, जिन्हें उमास्वामी भी कहा जाता है, का निश्चित काल विवादित है।▾

आचार्य उमास्वाति का तत्त्वार्थसूत्र संस्कृत में रचा गया जैन दर्शन का व्यवस्थित सूत्रग्रंथ है। दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराओं में इसे महत्त्व प्राप्त है, हालांकि पाठ और व्याख्या में कुछ अंतर मिलते हैं। यह सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र से आरम्भ करके जीव, अजीव, कर्म के आगमन, बंधन, रोक, क्षय और मोक्ष जैसे विषयों को क्रमबद्ध करता है। इसमें ज्ञान के प्रकार, ब्रह्माण्ड की संरचना तथा नैतिक अनुशासन की चर्चा भी है। संक्षिप्त सूत्रों के कारण इसे प्रायः टीकाओं के साथ पढ़ा जाता है। जैन विचार को एक संगठित दार्शनिक रूप में समझने के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी ग्रंथ है।

5समयसारSamayasāra · लगभग प्रारम्भिक शताब्दियाँ ईस्वी; आचार्य कुन्दकुन्द का सटीक काल विद्वानों में अनिश्चित है।▾

समयसार आचार्य कुन्दकुन्द से संबद्ध प्राकृत ग्रंथ है और दिगम्बर परम्परा में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसका केन्द्र आत्मा का वास्तविक स्वरूप और आत्मा को शरीर, कर्म तथा आसक्ति से अलग समझने का विवेक है। इसमें निश्चय और व्यवहार, अर्थात वास्तविक स्वरूप की दृष्टि और सांसारिक व्यवहार की दृष्टि, के बीच भेद का उपयोग किया गया है। ग्रंथ राग-द्वेष से मुक्त चेतना और आत्मबोध की ओर ध्यान दिलाता है। इसका आशय नैतिक आचरण को छोड़ना नहीं, बल्कि बाहरी अनुशासन के साथ आन्तरिक परिवर्तन को समझना है। इसकी सूक्ष्म दार्शनिक भाषा के कारण पारम्परिक टीकाएँ और अनुभवी अध्यापकों का मार्गदर्शन अध्ययन में सहायक होते हैं।

आचार

उपासना और साधना

शाकाहार और भोजन में सावधानी

जैन आहार का प्रमुख आधार शाकाहार और जीवों को कम से कम हानि पहुँचाने का प्रयास है। अनेक अनुयायी कंदमूल या रात्रि-भोजन से भी बचते हैं। इन नियमों का पालन परिवार, सम्प्रदाय और व्यक्तिगत व्रत के अनुसार भिन्न होता है।

सामायिक और ध्यान

सामायिक में कुछ समय के लिए दैनिक उलझनों से हटकर समता, संयम और आत्मचिंतन का अभ्यास किया जाता है। मन, वाणी और शरीर को शांत रखना इसका महत्त्वपूर्ण पक्ष है। यह अभ्यास साधक को राग-द्वेष तथा असावधानी पहचानने में सहायता देता है।

प्रतिक्रमण और क्षमा

प्रतिक्रमण में अपने आचरण की समीक्षा, हुई भूलों का स्वीकार और उन्हें न दोहराने का संकल्प किया जाता है। क्षमा माँगना और दूसरों को क्षमा करना इसका महत्त्वपूर्ण भाव है। इसका उद्देश्य केवल विधि निभाना नहीं, बल्कि व्यवहार सुधारना है।

उपवास और तप

उपवास तथा भोजन या इच्छाओं को सीमित करने के अन्य अभ्यास आत्मसंयम के साधन हैं। जैन परम्परा में तप के आन्तरिक रूपों में प्रायश्चित्त, स्वाध्याय और ध्यान भी शामिल हैं। तप का लक्ष्य प्रदर्शन नहीं, आसक्ति घटाना और आत्मशुद्धि है।

पूजा, अध्ययन और दान

मूर्तिपूजक परम्पराओं में तीर्थंकर प्रतिमाओं की पूजा और तीर्थयात्रा महत्त्वपूर्ण हैं; स्थानकवासी और तेरापंथी श्वेताम्बर मूर्तिपूजा नहीं करते। स्वाध्याय, साधु-साध्वियों के प्रवचन, जरूरतमंदों की सहायता और जीवदया से जुड़े कार्य भी धार्मिक जीवन के प्रमुख अंग हैं।

पर्व और प्रतीक

त्योहार, प्रतीक और मूल सीख

महावीर जन्म कल्याणक

भगवान महावीर के जन्म का उत्सव है, जिसे महावीर जयंती भी कहते हैं। पूजा, प्रवचन, शोभायात्रा और सेवा के माध्यम से उनके जीवन तथा शिक्षाओं का स्मरण किया जाता है।

पर्युषण

श्वेताम्बर परम्परा का प्रमुख आठ-दिवसीय पर्व है। इसमें स्वाध्याय, तप, प्रतिक्रमण और क्षमा पर विशेष ध्यान दिया जाता है। अंतिम दिन संवत्सरी आत्मसमीक्षा और क्षमायाचना का महत्त्वपूर्ण अवसर है।

दशलक्षण पर्व

दिगम्बर परम्परा का प्रमुख दस-दिवसीय पर्व है। इसमें क्षमा, मार्दव, आर्जव और शौच सहित दस धर्मों का चिंतन किया जाता है। संयम, अध्ययन और आत्मशुद्धि इसके प्रमुख भाव हैं।

दीपावली

जैन परम्परा में दीपावली भगवान महावीर के पावापुरी में निर्वाण का स्मरण कराती है। इस अवसर पर पूजा, दीप-प्रज्ज्वलन और आध्यात्मिक चिंतन किया जाता है।

अक्षय तृतीया

जैन परम्परा अनुसार यह दिन भगवान ऋषभनाथ के दीर्घ उपवास के बाद आहार ग्रहण करने से जुड़ा है। वर्षीतप करने वाले अनेक साधक इस दिन पारणा करते हैं।

  • ◆ अहिंसा-हस्त — उठी हुई हथेली और उसमें चक्र हिंसा रोकने तथा जीवन के प्रति सजग रहने का संदेश देते हैं।
  • ◆ स्वस्तिक — जैन संदर्भ में जीव की चार गतियों: देव, मनुष्य, तिर्यंच और नरक का संकेत; यह प्राचीन भारतीय धार्मिक प्रतीक है।
  • ◆ तीन बिंदु — सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र, अर्थात रत्नत्रय के प्रतीक हैं।
  • ◆ अर्धचन्द्र और शीर्ष बिंदु — जैन संयुक्त प्रतीक में सिद्धशिला और मुक्त आत्मा की अवस्था का संकेत देते हैं।
  • ◆ लांछन — तीर्थंकर प्रतिमाओं की पहचान से जुड़े चिह्न; जैसे भगवान ऋषभनाथ का वृषभ और भगवान महावीर का सिंह।
जैन परम्परा की मूल सीख है कि आत्मिक उन्नति अपने विचारों, इच्छाओं और कर्मों की जिम्मेदारी लेने से शुरू होती है। दूसरों को कम से कम हानि पहुँचाना, संग्रह और आसक्ति सीमित रखना, सत्यनिष्ठ रहना तथा अपनी दृष्टि की सीमाएँ पहचानना जीवन को अधिक संयमी, करुणामय और सजग बनाता है।

अध्यायवार अध्ययन

जैन परम्परा — विस्तृत पाठ

विषय और ग्रंथ अलग अध्यायों में पढ़ें। प्रत्येक ग्रंथ की अपनी स्थिति और परम्परागत मर्यादा साथ दी गई है।

अध्याय 1

विषयगत परिचय

परिचय और सांस्कृतिक संदर्भ

जैन परम्परा चौबीस तीर्थंकरों के मार्ग की शिक्षा देती है, जिनमें भगवान् महावीर अन्तिम हैं। जीव के स्वभाव सिद्ध-स्वरूप, कर्म का भौतिक बन्धन, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह — ये इस मार्ग के केन्द्रीय आधार हैं; साधना का अन्त ज्ञान-दर्शन-चारित्र की पूर्णता में है।

अध्याय 2

मूल मान्यताएँ

प्रमुख आधार और दृष्टियाँ

जैन दृष्टि में सत्य बहुपक्षीय है — अणेकान्तवाद और स्याद्वाद कहते हैं कि कोई भी वक्तव्य एक विशेष दृष्टिकोण (नय) से ही होता है। इसी से मतभेद के बीच भी परस्पर-सहनशीलता का जीवन-व्यवहार निकलता है।

जीव, अजीव, आश्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष — सात तत्त्वों की पहचान जैन आचार और साधना की सीढ़ियाँ हैं; अहिंसा इन सबका अधिष्ठाता व्रत है।

अध्याय 3

आचार और सामुदायिक जीवन

व्रत, साधना और समाज

अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य/संयम और अपरिग्रह — व्रत और संवर साधना के मूल हैं। श्रावक-श्राविकाओं के अनुव्रत, पूजा-आराधना, स्वाध्याय और पर्युषण/दशलक्षण जैसे पर्व सामान्य जैन जीवन का अंग हैं; साधु-साध्वियों के लिए महाव्रत और विशिष्ट संयम हैं।

दान, शील, तप और भाव — छह आवश्यकों की साधना, देरासर-बासदी-मंदिर जैसी विभिन्न स्थापत्य परम्पराएँ और श्रावक-संघ की संस्थाएँ जैन समुदाय को जोड़ती हैं। अनेक व्यापार, कला, ग्रंथ-रक्षा और विद्या-संस्थाओं में जैन समाज का योगदान इतिहास में प्रसिद्ध है।

अध्याय 4

विविधता-सूचना

शाखाएँ, पाठ-परम्परा और मर्यादा

स्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों परम्पराओं की ग्रंथ-सूची, आचार और भाषा-परम्परा अलग है; इनमें से किसी एक को एकमात्र सही नहीं माना गया है।

अध्याय 5

ग्रंथ-अध्याय

आगम साहित्य — श्रुत-परम्परा और ग्रंथ-सूची

जैन परम्परा के ग्रंथों का नाम आगम है — अर्थात् आने वाला, आने देने वाला ज्ञान। इस परम्परा में ज्ञान किताब से पहले सुनाई गई वाणी है: भगवान् महावीर की शिक्षाएँ पहले शिष्यों के स्मृति-ग्रंथ में बँधीं, फिर आगे चलकर लिखित रूप में सँभाली गईं। इसीलिए आगम साहित्य का स्वरूप संवाद है — प्रश्न, उत्तर, शंका और उसका समाधान; कोई आदेश की पुस्तक नहीं, ज्ञान का बातचीत-रूप है।

अध्याय 6

ग्रंथ-अध्याय

आचारांग सूत्र — अहिंसा और मुनि-आचार

आगमों की प्रथम श्रेणी अंग कही जाती है। आचारांग सूत्र इनमें प्रथम है — साधु-साध्वियों के आचरण का ग्रंथ, जिसमें अहिंसा, संयम और तप के व्यवहार इतनी खुली-सी, ईमानदार भाषा में बताए गए हैं कि उसमें साधु-जीवन की कठिनाइयाँ भी छिपाई नहीं गईं। यह ग्रंथ पहला नियम-पुस्तक ही नहीं, भगवान् महावीर के व्यक्तित्व की भी झलक देता है — कैसे उन्होंने आलोचना, आघात और अकेलेपन को भी धैर्य से सहा।

अध्याय 7

ग्रंथ-अध्याय

सूत्रकृतांग — मत-संवाद और संयम

सूत्रकृतांग का स्वर आचारांग से अलग है — यह ग्रंथ अपने युग की अनेक दृष्टियों से बहस करता है। यहाँ सांसारिक सुख की आलोचना है, तर्क-मग्न विद्वत्ता की है, तब की अनेक धारणाओं की है; और इस बहस के बीच से जैन दृष्टि खुद को स्थापित करती है — जीव अजर है, कर्म बन्धन है, संयम मुक्ति का मार्ग है। यह पढ़ने में विवाद-ग्रंथ जैसा लगता है, पर इसकी शक्ति विवाद में ही है: आगम डरता नहीं, प्रश्नों का सामना करता है।

अध्याय 8

ग्रंथ-अध्याय

स्थानांग सूत्र — संख्या-क्रम में अध्ययन

स्थानांग सूत्र श्वेताम्बर परम्परा के अंग-साहित्य में रखा जाता है। इसमें अनेक धार्मिक और दार्शनिक विषय संख्याओं के क्रम में वर्गीकृत हैं। यह विन्यास मौखिक अध्ययन में विषयों को क्रम से याद रखने और फिर उनका विस्तार समझाने में सहायक रहा। दिगम्बर परम्परा मूल अंग-साहित्य को लुप्त मानती है, इसलिए वहाँ इसकी ग्रंथ-स्थिति समान नहीं है।

अध्याय 9

ग्रंथ-अध्याय

समवायांग सूत्र — ज्ञान का संख्यात्मक विन्यास

समवायांग सूत्र भी संख्यात्मक संगठन का उपयोग करता है, पर उसका विषय-विस्तार स्थानांग से अलग है। इसमें जैन ज्ञान-परम्परा के विविध वर्ग, गणनाएँ और सैद्धान्तिक सूचियाँ एक शिक्षण-क्रम में रखी गई हैं। इसे स्थानांग का दूसरा नाम नहीं, श्वेताम्बर अंग-संग्रह का स्वतंत्र ग्रंथ समझना चाहिए; दिगम्बर ग्रंथ-सूची में इसकी वही प्रामाणिक स्थिति नहीं है।

अध्याय 10

ग्रंथ-अध्याय

भगवती सूत्र — प्रश्नोत्तर का विस्तृत संसार

अंगों में सबसे विशाल और विद्वत्ता में सबसे चर्चित है भगवती सूत्र — व्याख्याप्रज्ञप्ति, अर्थात् प्रज्ञा की व्याख्या। यह ग्रंथ प्रश्न-उत्तर के अनन्त क्रम में बँधा है: जीव कितने प्रकार के हैं, कर्म किस तरह बँधता है, कौन-सा जीव कितने इन्द्रियों वाला है, संसार का भूगोल और गणित कैसा है — हर प्रश्न को श्रेणियों में तोड़कर समझाया गया है। जैन दर्शन के लगभग हर भारी विषय का विस्तृत विवेचन यहीं मिलता है; इसीलिए इसे आगम-साहित्य का कोश जैसा ग्रंथ माना जाता है।

अध्याय 11

ग्रंथ-अध्याय

उत्तराध्ययन सूत्र — आचार और आत्म-अनुशासन

उत्तराध्ययन सूत्र इन सबमें सबसे पुरानी गूँज वाला और सबसे मानवीय ग्रंथ है — नैतिक उपदेश, संतों की नीति-पंक्तियाँ, राजा-व्यापारी-साधु के चरित-प्रसंग, और ऐसे प्रश्न जो आज भी उतने ही जीवित हैं: सुख क्या है, दुःख कहाँ से आता है, संयमी जीवन में आनन्द कैसा? इसीलिए यह ग्रंथ सभी परम्पराओं में प्रतिदिन-स्वाध्याय के लिए जितना आदर पाता है, उतना कोई और नहीं।

अध्याय 12

ग्रंथ-अध्याय

तत्त्वार्थ सूत्र — साझा दार्शनिक आधार

इन आगमों के बाद आते हैं उन ग्रंथ जिन्होंने जैन दर्शन को सिद्धान्त की कसौटी दी। तत्त्वार्थ सूत्र उनमें सबसे प्रसिद्ध है — संस्कृत में लिखा गया, सात तत्त्वों, षड्-द्रव्य और मोक्ष-मार्ग का सूक्ष्म और संगठित विवेचन। इसकी महत्ता इसी से समझी जाती है कि स्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों परम्पराएँ इसे अपना मानती हैं — जहाँ आगम-परम्पराएँ अलग-अलग हैं, वहाँ यह ग्रंथ दोनों का साझा सिद्धान्त-शास्त्र बन गया है। इस पर इतनी टीकाएँ लिखी गईं कि जैन विद्वत्ता की एक परम्परा ही इसकी व्याख्या से आरम्भ होती है।

अध्याय 13

ग्रंथ-अध्याय

समयसार — आत्म-स्वभाव की दृष्टि

समयसार आचार्य कुन्दकुन्द से संबद्ध दिगम्बर दार्शनिक ग्रंथ है। इसका केंद्र शुद्ध आत्मा का स्वरूप और कर्म-बन्ध से उसका भेद है। निश्चय और व्यवहार—इन दो दृष्टियों के सहारे यह समझाता है कि आत्मा को उसके निज स्वभाव में देखना और संसारगत व्यवहार का वर्णन करना अलग स्तरों की बातें हैं। इसे श्वेताम्बर आगम का भाग नहीं, दिगम्बर आत्म-अध्ययन की प्रभावशाली धारा में पढ़ा जाता है।

अध्याय 14

ग्रंथ-अध्याय

प्रवचनसार — ज्ञान, आचार और वस्तु-दृष्टि

प्रवचनसार आचार्य कुन्दकुन्द से संबद्ध दिगम्बर ग्रंथ है, जिसमें ज्ञान, ज्ञेय और साधु-आचार के प्रश्न जुड़े हुए हैं। इसका चिंतन आत्मा और अन्य द्रव्यों के भेद को समझने से आरम्भ होकर उस समझ के अनुरूप आचरण तक जाता है। समयसार से इसका संबंध निकट है, पर दोनों एक ही पुस्तक नहीं हैं: समयसार का मुख्य बल आत्म-स्वभाव पर है, जबकि प्रवचनसार ज्ञान और आचार के संबंध को अधिक विस्तार देता है।

अध्याय 15

ग्रंथ-अध्याय

नियमसार — आत्म-संयम का विवेचन

नियमसार भी आचार्य कुन्दकुन्द से संबद्ध दिगम्बर ग्रंथ है। यहाँ ‘नियम’ केवल बाहरी अनुशासन नहीं, आत्मा की ओर लौटता सम्यक् दर्शन, ज्ञान और चारित्र है। ग्रंथ बाह्य आचरण और आन्तरिक शुद्ध भाव के संबंध को निश्चय-व्यवहार की दृष्टियों से खोलता है। इसकी लेखकता और प्राचीन पाठ-इतिहास पर आधुनिक अध्ययन में प्रश्न हैं, इसलिए परम्परागत संबद्धता और ऐतिहासिक निष्कर्ष को एक नहीं माना गया है।

अध्याय 16

ग्रंथ-अध्याय

षट्खंडागम — कर्म-सिद्धान्त की दिगम्बर धारा

उसी शुद्ध दर्शन-पक्ष में दिगम्बर दृष्टि का अपना विशाल साहित्य-स्तम्भ आता है — षट्खण्डागम। परम्परा में यह विशाल संकलन प्राकृत सूत्रों में बँधा कहा जाता है, और इसी के ऊपर धवला, जयधवला और महाधवला जैसे अत्यन्त परिश्रमी टीका-ग्रंथ सँवरे, जो जैन गणित, कर्म-विज्ञान और ब्रह्माण्ड-विवेचन का गहरा कोश माने जाते हैं। दिगम्बर परम्परा की दृष्टि यही है कि जहाँ मूल आगम-स्मृति का मार्ग भिन्न पड़ गया, वहाँ यह साहित्य दर्शन का प्रामाणिक आधार है।

अध्याय 17

ग्रंथ-अध्याय

कषायपाहुड — कषाय और कर्म-बन्ध

कषायपाहुड इसी धारा का विशेष ग्रंथ है — क्रोध, मान, माया और लोभ अर्थात् कषाय का विवेचन। जैन दृष्टि में ये चार कर्म के सबसे गहरे बीज हैं; इसलिए इनकी पहचान, उनके उदय-क्रम और उनसे मुक्ति का मार्ग इस ग्रंथ की साधना-सारणी है। यह पढ़ना आसान नहीं, पर यही ग्रंथ साधक को अपने भीतर के शत्रु को पहचानाता है — जैन साधना का यही मूल प्रश्न है।

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