यहूदी धर्म की जड़ें प्राचीन पश्चिम एशिया के इस्राएली समुदायों में हैं। यह एक लंबे ऐतिहासिक विकास का परिणाम है, इसलिए इसकी शुरुआत किसी एक निश्चित वर्ष से नहीं बताई जा सकती। परम्परा अनुसार, आदरणीय पितामह अब्राहम का ईश्वर के साथ विशेष संबंध और पैगंबर मूसा के माध्यम से तोरा की प्राप्ति इसके आधार हैं। इतिहासकार धार्मिक परम्परा के इन विवरणों और पुरातात्त्विक प्रमाणों का अध्ययन अलग-अलग प्रकार के स्रोतों के रूप में करते हैं।
प्राचीन इस्राएल और यहूदा के इतिहास में यरूशलेम का मंदिर धार्मिक जीवन का प्रमुख केंद्र था। लगभग 586 ईसा पूर्व बेबीलोनी विजय में पहला मंदिर नष्ट हुआ और अनेक लोगों को निर्वासन झेलना पड़ा। फ़ारसी शासन के दौरान कुछ निर्वासित लौटे और दूसरा मंदिर बना। 70 ईस्वी में रोमन सेनाओं ने उसे नष्ट कर दिया। इन घटनाओं ने उपासना, सामुदायिक पहचान और धार्मिक चिंतन को गहराई से प्रभावित किया।
दूसरे मंदिर के विनाश के बाद रब्बियों की शिक्षाओं, ग्रंथ-अध्ययन, प्रार्थना और आराधनालयों का महत्त्व और बढ़ा। यहूदी समुदाय मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, यूरोप और बाद में अन्य महाद्वीपों में विकसित हुए। अलग-अलग भाषाओं और स्थानीय संस्कृतियों के बीच साझा धार्मिक स्मृतियाँ बनी रहीं। आधुनिक काल में ऑर्थोडॉक्स, कंज़र्वेटिव और रिफॉर्म जैसे धार्मिक प्रवाह उभरे। आज यहूदी जीवन में धार्मिक पालन से लेकर सांस्कृतिक पहचान तक अनेक रूप दिखाई देते हैं।