प्राचीन नॉर्स धर्म उत्तरी यूरोप, विशेषकर आज के डेनमार्क, नॉर्वे और स्वीडन से जुड़ी धार्मिक परम्पराओं का आधुनिक सामूहिक नाम है। इसका उद्भव किसी एक व्यक्ति, पुस्तक या निश्चित वर्ष से नहीं हुआ। यह पुरानी जर्मनिक मान्यताओं, स्थानीय रीति-रिवाजों और पीढ़ियों से सुनाई जाने वाली कथाओं के बीच विकसित हुआ। देवताओं, पूर्वजों, भूमि और समुदाय से जुड़े संबंध इसके विविध रूपों को समझने की महत्त्वपूर्ण कुंजी हैं।
वाइकिंग युग, लगभग आठवीं से ग्यारहवीं शताब्दी, में नॉर्स भाषी समुदाय समुद्री यात्राओं, व्यापार और बसावट के साथ अपनी परम्पराएँ आइसलैंड तथा दूसरे क्षेत्रों तक ले गए। इस धर्म के इतिहास को समझने के लिए आभूषण, कब्रें, चित्रयुक्त पत्थर और अन्य पुरातात्त्विक प्रमाण उपयोगी हैं। लिखित स्रोत भी महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन अनेक विवरण ईसाई लेखकों ने बाद में लिखे; इसलिए उनका उपयोग संदर्भ और सावधानी के साथ किया जाता है।
स्कैंडिनेविया का ईसाईकरण धीरे-धीरे हुआ और अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी गति भिन्न रही। लगभग दसवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच राजसत्ता, मिशनरियों और सामाजिक परिवर्तनों ने इसमें भूमिका निभाई। पुरानी कथाएँ पूरी तरह लुप्त नहीं हुईं; वे कविता, साहित्य और लोकपरम्पराओं में सुरक्षित रहीं। आधुनिक समय में कुछ समुदायों ने नॉर्स धार्मिक परम्पराओं को नए रूप में अपनाया है, पर उन्हें प्राचीन धर्म की अपरिवर्तित निरंतरता मानना उचित नहीं है।