ऐतिहासिक धार्मिक परम्परा — देव-पूजा, काव्य-परम्परा, सागा-साहित्य और आचार · स्कैंडिनेविया और नॉर्स संसार (पूर्व-ईसाई युग); आज जीवित परम्परा के रूप में नहीं चलती

Old Norse Religion / Norse Paganism

प्राचीन नॉर्स धर्म: उत्तरी यूरोप की देवपरम्पराओं, प्रकृति, कथाओं और सामुदायिक अनुष्ठानों का संसार।

0 ग्रंथ0 प्रमुख शाखाएँ
उद्भव
स्कैंडिनेविया में पुरानी जर्मनिक धार्मिक परम्पराओं से विकसित; वाइकिंग युग, लगभग आठवीं से ग्यारहवीं शताब्दी, के अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं।
संस्थापक/स्रोत
कोई ज्ञात एकल संस्थापक नहीं। इसकी जानकारी पुरातात्त्विक अवशेषों, अभिलेखों, काव्य, सागाओं और मध्यकालीन लेखकों के विवरणों से मिलती है।
मुख्य ग्रंथ
काव्यात्मक एड्डा और गद्यात्मक एड्डा प्रमुख साहित्यिक स्रोत हैं। ये किसी एक अधिकृत धर्मग्रंथ-संहिता का हिस्सा नहीं थे; इनके उपलब्ध लिखित रूप मुख्यतः ईसाईकरण के बाद के हैं।
अनुयायी
लगभग कितने लोग इस प्राचीन धर्म के अनुयायी थे, इसका विश्वसनीय संख्यात्मक अनुमान उपलब्ध नहीं है। आधुनिक पुनर्जीवित नॉर्स परम्पराओं को प्राचीन अनुयायियों की संख्या से अलग समझना चाहिए।
पवित्र स्थल
स्वीडन का गाम्ला उप्साला प्रमुख ऐतिहासिक धार्मिक केंद्र था। विभिन्न क्षेत्रों में पवित्र उपवन, जलस्रोत और अनुष्ठान-स्थल भी थे; आइसलैंड के होफ़स्तादिर में सामुदायिक अनुष्ठानिक भोज के पुरातात्त्विक प्रमाण मिले हैं।

उद्भव और इतिहास

यह परम्परा कैसे बनी

प्राचीन नॉर्स धर्म उत्तरी यूरोप, विशेषकर आज के डेनमार्क, नॉर्वे और स्वीडन से जुड़ी धार्मिक परम्पराओं का आधुनिक सामूहिक नाम है। इसका उद्भव किसी एक व्यक्ति, पुस्तक या निश्चित वर्ष से नहीं हुआ। यह पुरानी जर्मनिक मान्यताओं, स्थानीय रीति-रिवाजों और पीढ़ियों से सुनाई जाने वाली कथाओं के बीच विकसित हुआ। देवताओं, पूर्वजों, भूमि और समुदाय से जुड़े संबंध इसके विविध रूपों को समझने की महत्त्वपूर्ण कुंजी हैं।

वाइकिंग युग, लगभग आठवीं से ग्यारहवीं शताब्दी, में नॉर्स भाषी समुदाय समुद्री यात्राओं, व्यापार और बसावट के साथ अपनी परम्पराएँ आइसलैंड तथा दूसरे क्षेत्रों तक ले गए। इस धर्म के इतिहास को समझने के लिए आभूषण, कब्रें, चित्रयुक्त पत्थर और अन्य पुरातात्त्विक प्रमाण उपयोगी हैं। लिखित स्रोत भी महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन अनेक विवरण ईसाई लेखकों ने बाद में लिखे; इसलिए उनका उपयोग संदर्भ और सावधानी के साथ किया जाता है।

स्कैंडिनेविया का ईसाईकरण धीरे-धीरे हुआ और अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी गति भिन्न रही। लगभग दसवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच राजसत्ता, मिशनरियों और सामाजिक परिवर्तनों ने इसमें भूमिका निभाई। पुरानी कथाएँ पूरी तरह लुप्त नहीं हुईं; वे कविता, साहित्य और लोकपरम्पराओं में सुरक्षित रहीं। आधुनिक समय में कुछ समुदायों ने नॉर्स धार्मिक परम्पराओं को नए रूप में अपनाया है, पर उन्हें प्राचीन धर्म की अपरिवर्तित निरंतरता मानना उचित नहीं है।

मूल सिद्धान्त

मुख्य मान्यताएँ

01

अनेक देवता और विविध भूमिकाएँ

यह बहुदेववादी परम्परा थी। देवता ओडिन ज्ञान, काव्य और युद्ध से, देवता थोर गर्जन तथा संरक्षण से, और देवता फ्रेयर उर्वरता तथा समृद्धि से जुड़े थे। देवी फ्रेया के संबंध प्रेम, उर्वरता और अन्य विषयों से थे। ये भूमिकाएँ एक-दूसरे से मिलती भी थीं; पूजा की प्राथमिकताएँ क्षेत्र और समुदाय के अनुसार बदलती थीं।

02

परस्पर जुड़े लोकों की कल्पना

नॉर्स काव्य और कथाओं में संसार अनेक लोकों तथा प्राणियों से जुड़ा दिखाई देता है। विश्व-वृक्ष यग्द्रसिल इस कल्पना का प्रमुख रूपक है। मनुष्य, देवता और अन्य शक्तियाँ एक व्यापक विश्व-व्यवस्था में स्थित हैं। अलग-अलग स्रोतों के विवरण पूरी तरह समान नहीं हैं, इसलिए इन्हें एक निश्चित और सर्वमान्य ब्रह्मांडीय नक्शा नहीं समझना चाहिए।

03

भाग्य और जीवन की सीमाएँ

भाग्य नॉर्स कथाओं का महत्त्वपूर्ण विषय है। नॉर्न नामक स्त्रीरूप शक्तियाँ जीवन और नियति से जुड़ी बताई गई हैं। देवताओं को भी संकट, हानि और मृत्यु की संभावनाओं से मुक्त नहीं दिखाया जाता। कथाओं में अनिश्चित परिस्थितियों के बीच साहस, बुद्धि और निर्णय का महत्त्व उभरता है; फिर भी कोई एक व्यवस्थित भाग्यवाद सभी स्रोतों पर लागू नहीं होता।

04

भेंट, संबंध और पारस्परिकता

देवताओं के सम्मान में अर्पण और सामुदायिक भोज धार्मिक जीवन के प्रमुख अंग थे। लोग समृद्धि, अच्छी फसल, शांति या संरक्षण की कामना करते थे। इन अनुष्ठानों को केवल निजी विश्वास नहीं, बल्कि समुदाय और धार्मिक शक्तियों के बीच संबंध बनाए रखने की प्रक्रिया के रूप में भी समझा जाता है। व्यवहार स्थान और समय के अनुसार बदलता था।

05

मृत्यु के बाद की विविध कल्पनाएँ

मृत्यु के बाद के जीवन का कोई एक सर्वमान्य विवरण नहीं मिलता। स्रोतों में वल्हल्ला, देवी फ्रेया से संबद्ध फोल्कवांग और हेल जैसे गंतव्यों का उल्लेख है। सभी मृतक वल्हल्ला जाते थे, यह लोकप्रिय धारणा गलत है। दाह-संस्कार और दफनाने, दोनों के प्रमाण मिलते हैं; इनसे अंत्येष्टि की क्षेत्रीय तथा ऐतिहासिक विविधता स्पष्ट होती है।

06

राग्नारोक और संसार का नवीकरण

कुछ प्रमुख काव्यात्मक स्रोत राग्नारोक का वर्णन करते हैं, जिसमें बड़े संघर्ष और विनाश के साथ अनेक देवताओं का अंत होता है। उन्हीं कथाओं में उसके बाद पृथ्वी के फिर उभरने और जीवन आगे बढ़ने की कल्पना भी मिलती है। यह विषय परिवर्तन और नश्वरता को सामने लाता है, लेकिन इसे सभी समुदायों की समान आस्था मानना कठिन है।

पवित्र ग्रंथ

धार्मिक ग्रंथ — सार में

1काव्यात्मक एड्डाPoetic Edda / Eddukvæði · मुख्य पांडुलिपि लगभग 1270 ईस्वी की; अलग-अलग कविताओं की रचना-तिथियाँ अनिश्चित और कई उससे पुरानी हैं।▾

काव्यात्मक एड्डा पुरानी नॉर्स भाषा की देवकथात्मक और वीरगाथात्मक कविताओं का संग्रह है। इसका प्रमुख पांडुलिपि-साक्ष्य कोडेक्स रेगियस कहलाता है। इसमें संसार की उत्पत्ति, देवताओं के संबंध, ज्ञान की खोज, भाग्य, संघर्ष और मृत्यु जैसे विषय मिलते हैं। कुछ कविताएँ दैनिक व्यवहार पर सलाह देती हैं, जबकि अन्य ब्रह्मांडीय घटनाओं या नायकों की त्रासदियों को प्रस्तुत करती हैं। यह प्राचीन धार्मिक कल्पनाओं को समझने का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है, लेकिन किसी केंद्रीय संस्था द्वारा स्वीकृत धर्मसंहिता नहीं था। कविताओं की तिथियाँ और मौखिक पृष्ठभूमियाँ अलग-अलग हैं; उपलब्ध लिखित संग्रह ईसाईकालीन आइसलैंड में सुरक्षित हुआ।

2गद्यात्मक एड्डाProse Edda / Snorra Edda · लगभग 1220 ईस्वी; स्नोर्री स्तुर्लुसोन द्वारा रचित।▾

गद्यात्मक एड्डा मुख्यतः काव्यकला समझाने के उद्देश्य से तैयार किया गया ग्रंथ है। पुरानी नॉर्स कविता के रूपकों को समझने के लिए देवकथाओं का ज्ञान आवश्यक था, इसलिए इसमें देवताओं, विश्व की रचना और अनेक पौराणिक घटनाओं का वर्णन मिलता है। इसके प्रमुख भागों में गिल्फागिनिंग, स्काल्डस्कापारमाल और हाट्टाताल शामिल हैं। यह बताता है कि कथाएँ भाषा, स्मृति और काव्य-परम्परा से कैसे जुड़ी थीं। लेखक ईसाई समाज में रहते थे और सामग्री को अपने ढंग से व्यवस्थित करते थे। इसलिए यह अमूल्य ऐतिहासिक स्रोत है, पर इसे प्राचीन उपासकों की सीधी, संपूर्ण या सर्वमान्य धार्मिक पुस्तिका नहीं मानना चाहिए।

3हावामाल: उच्चस्थ के कथनHávamál · उपलब्ध प्रमुख पांडुलिपि लगभग 1270 ईस्वी की; कविता के विभिन्न अंशों का रचना-काल अनिश्चित है।▾

हावामाल काव्यात्मक एड्डा का एक हिस्सा है, स्वतंत्र अधिकृत धर्मग्रंथ नहीं। इसकी वाणी देवता ओडिन से जुड़ी हुई प्रस्तुत होती है। इसमें अतिथि-सत्कार, मित्रता, सावधानी, संयम, प्रतिष्ठा और विवेकपूर्ण व्यवहार पर अनेक विचार मिलते हैं। साथ ही ज्ञान, रूनी चिह्नों और मंत्रविद्या से संबंधित पौराणिक प्रसंग भी हैं। देवता ओडिन की ज्ञान-प्राप्ति के लिए किए गए आत्मत्याग का प्रसिद्ध वर्णन इसी कविता में मिलता है। रचना के अलग-अलग हिस्सों की शैली और विषय भिन्न हैं। इसे पढ़ते समय व्यावहारिक सामाजिक सलाह और पौराणिक ज्ञान, दोनों को ध्यान में रखना चाहिए; हर कथन को सभी नॉर्स समुदायों का अनिवार्य नियम नहीं माना जा सकता।

4वोलुस्पा: द्रष्टा की भविष्यवाणीVöluspá · रचना प्रायः लगभग 1000 ईस्वी के आसपास मानी जाती है; उपलब्ध प्रमुख पांडुलिपियाँ तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दी की हैं।▾

वोलुस्पा काव्यात्मक एड्डा की प्रमुख कविताओं में से एक है। इसमें एक द्रष्टा स्त्री देवता ओडिन के सामने अतीत और भविष्य का व्यापक चित्र प्रस्तुत करती है। संसार की प्रारंभिक अवस्था, उसकी व्यवस्था, देवताओं के संकट और राग्नारोक इसके मुख्य विषय हैं। विनाश के बाद पृथ्वी के फिर उभरने का दृश्य भी इसमें आता है। कविता नश्वरता, ज्ञान और विश्व-व्यवस्था की अस्थिरता पर विचार का अवसर देती है। इसकी भाषा संक्षिप्त, संकेतपूर्ण और कई जगह कठिन है। उपलब्ध पाठों में अंतर हैं तथा संभावित ईसाई प्रभाव पर विद्वानों में चर्चा होती है; इसलिए इसके हर विवरण को निर्विवाद प्राचीन मान्यता नहीं कहा जा सकता।

5यंग्लिंगा सागाYnglinga saga · लगभग 1230 ईस्वी; स्नोर्री स्तुर्लुसोन की हेम्सक्रिंग्ला का आरंभिक भाग।▾

यंग्लिंगा सागा राजवंशों के अतीत की कथा है, न कि पूजा-पद्धति निर्धारित करने वाला धर्मग्रंथ। इसे यहाँ प्राचीन धर्म के अध्ययन में उपयोगी साहित्यिक स्रोत के रूप में शामिल किया गया है। इसमें देवताओं को दूर अतीत के शक्तिशाली शासकों या मनुष्यों की तरह प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। देवता ओडिन, देवता फ्रेयर, राजसत्ता, बलि-अनुष्ठान और समृद्धि के संबंधों पर सामग्री मिलती है। यह समझने में सहायता करती है कि मध्यकालीन लेखक पुराने धार्मिक अतीत को इतिहास के रूप में कैसे ढालते थे। इसके विवरणों को प्रत्यक्ष समकालीन रिपोर्ट न मानकर कविता, अन्य स्रोतों और पुरातत्त्व से मिलाकर जाँचना आवश्यक है।

आचार

उपासना और साधना

ब्लोत: धार्मिक अर्पण

ब्लोत देवताओं या अन्य धार्मिक शक्तियों के सम्मान में किया जाने वाला अर्पण-अनुष्ठान था। ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक साक्ष्यों में पशुबलि तथा सामूहिक भोज का संबंध मिलता है। अवसर, अर्पण और अनुष्ठान की विधि क्षेत्र तथा काल के अनुसार भिन्न थी।

सामुदायिक भोज और पेय-अर्पण

धार्मिक अवसरों पर भोजन साझा करना और अनुष्ठानिक पेय ग्रहण करना समुदाय को जोड़ता था। कुछ लिखित स्रोत देवताओं के सम्मान में पेय उठाने का उल्लेख करते हैं। ऐसे आयोजनों में धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक संबंध और नेतृत्व की भूमिका भी दिखाई देती है।

घरेलू और स्थानीय धार्मिक जीवन

पूजा केवल बड़े केंद्रों तक सीमित नहीं थी। घर, खेत और स्थानीय भू-दृश्य भी धार्मिक जीवन से जुड़े थे। भूमि से संबद्ध शक्तियों तथा पूर्वजों की स्मृति के संकेत मिलते हैं, हालांकि निजी घरेलू अनुष्ठानों का विवरण बड़े सार्वजनिक आयोजनों की अपेक्षा कम सुरक्षित है।

अंत्येष्टि और स्मरण

दाह-संस्कार और दफनाने, दोनों प्रकार की अंत्येष्टि प्रचलित थीं। कुछ कब्रों में वस्तुएँ, पशु या नाव से संबंधित अवशेष मिले हैं। सभी को समान रूप से नहीं दफनाया जाता था; अंतर सामाजिक स्थिति, स्थानीय परम्परा और समय से जुड़े हो सकते थे।

सेइद्र और भविष्यज्ञान

साहित्यिक स्रोत सेइद्र नामक अनुष्ठानिक विद्या का उल्लेख करते हैं, जिसका संबंध भविष्य जानने या घटनाओं को प्रभावित करने से बताया जाता है। कुछ अनुष्ठान-विशेषज्ञ स्त्रियों को वोल्वा कहा गया है। इनके सटीक अभ्यास का पुनर्निर्माण कठिन है, क्योंकि विवरण प्रायः बाद के साहित्य में सुरक्षित हैं।

पर्व और प्रतीक

त्योहार, प्रतीक और मूल सीख

यूल

यूल मध्यशीतकालीन उत्सव से जुड़ा था, जिसमें भोज और धार्मिक आयोजन होते थे। इसकी प्राचीन तिथियाँ तथा अवधि सर्वत्र समान नहीं थीं; बाद में इसकी परम्पराएँ क्रिसमस से भी जुड़ गईं।

शीतरात्रियाँ

पुरानी नॉर्स परम्परा में शीतरात्रियाँ शीतकाल के आरंभ से जुड़ा मौसमी अवसर थीं। कुछ सागाओं में इस समय भोज और अर्पण का उल्लेख मिलता है; स्थानीय रूप भिन्न थे।

दिसाब्लोत

दिसाब्लोत दिसिर नामक स्त्रीरूप धार्मिक शक्तियों के सम्मान का अनुष्ठान था। इसके अवसर और समय के विवरण स्रोतों में अलग-अलग मिलते हैं; इसे एक निश्चित सार्वदेशिक त्योहार नहीं मानना चाहिए।

  • ◆ म्योल्निर — देवता थोर का हथौड़ा; हथौड़े के आकार के प्राचीन ताबीज संरक्षण और धार्मिक पहचान से जुड़े माने जाते हैं।
  • ◆ यग्द्रसिल — कथाओं का विश्व-वृक्ष; विभिन्न लोकों और जीवन की परस्पर संबद्धता की प्रमुख छवि।
  • ◆ रूनी चिह्न — मूलतः लेखन के अक्षर; कुछ अभिलेखों और कथाओं में अनुष्ठानिक या जादुई उपयोग भी मिलता है।
  • ◆ देवता ओडिन के कौवे — ह्यूगिन और म्यूनिन नामक पक्षी; कथाओं में संसार से समाचार लाने वाले, विचार और स्मृति से जुड़े साथी।
इस विविध परम्परा की कोई एक अधिकृत मूल सीख नहीं थी। फिर भी इसकी कथाओं और व्यवहार-संबंधी कविताओं में अतिथि-सत्कार, मित्रता, उदारता, विवेक और कठिन परिस्थितियों में साहस का महत्त्व दिखाई देता है। इन्हें पूरे धर्म की अनिवार्य आचारसंहिता मानने के बजाय उसके साहित्य और सामाजिक आदर्शों की प्रमुख झलक समझना अधिक उचित है।

अध्यायवार अध्ययन

प्राचीन नॉर्स धर्म — विस्तृत पाठ

विषय और ग्रंथ अलग अध्यायों में पढ़ें। प्रत्येक ग्रंथ की अपनी स्थिति और परम्परागत मर्यादा साथ दी गई है।

अध्याय 1

विषयगत परिचय

परिचय और सांस्कृतिक संदर्भ

प्राचीन नॉर्स धर्म स्कैंडिनेविया के योद्धा-किसान-नाविक समाज का धर्म था — उसके केंद्र में ओदिन (बुद्धि, काव्य और युद्ध), थोर (वज्र-शस्त्र रक्षक) और फ्रेया-फ्रेयर (उर्वरता और समृद्धि) जैसे देवता थे, साथ में नियति की दृष्टि थी कि स्वयं देवता भी भाग्य के अधीन हैं और अन्त में रैग्नरोक — देवताओं की महाप्रलय — आएगी। इस धर्म की एक अनूठी बात यह है कि उसका ग्रंथ-साहित्य धर्म के बाद लिखा गया — जिन द्वीपों (विशेषतः आइसलैंड) में ये काव्य लिखे गए, वहाँ लोग तब तक ईसाई हो चुके थे; इसलिए यह पृष्ठ इन ग्रंथों को वहाँ के साहित्य के रूप में प्रस्तुत करता है जहाँ प्राचीन धर्म की स्मृति सँजोई गई। ध्यान रहे — यह परम्परा मूल रूप से मौखिक थी; आचार, व्रत और पूजा-पद्धति का बड़ा भाग इन काव्यों में नहीं उतरा है।

अध्याय 2

मूल मान्यताएँ

प्रमुख आधार और दृष्टियाँ

नॉर्स विश्व-दृष्टि में संसार कई जगतों का समूह है — देवताओं (एसीर और वानीर दो परिवार), मनुष्यों, ज्ञान-जातियों, राक्षसों (जॉत्नर) और मृतकों के जगत — जो विशाल अश्वत्थ-सदृश वृक्ष यग्गद्रासिल के माध्यम से जुड़े माने जाते हैं। संसार के आरम्भ में आदिम जगतों से पहले देवता उठे, और पहले मनुष्य पेड़ों से बने माने जाते हैं — यह चित्र एड्डा-काव्यों में मिलता है।

इस धर्म की सबसे विशिष्ट दृष्टि नियति (भाग्य) की है — नॉर्न नाम की भाग्य-रक्षिकाएँ वृक्ष की जड़ों में दिन-प्रतिदिन संसार की डोर बुनती हैं, और कोई भी — देवता भी — उससे बच नहीं सकता। अन्त-काल का चित्र रैग्नरोक है — जब देवता और राक्षसों के बीच अन्तिम युद्ध होगा और अनेक देवता वीरगति पाएँगे; पर उसके बाद एक नए, शुद्ध संसार के उदय की आशा भी काव्यों में है। योद्धा-समाज के लिए यह दृष्टि उपयुक्त थी — साहस का धर्म यह नहीं कि हार न हो, बल्कि यह कि निश्चित पतन के बावजूद युद्ध-भूमि में खड़ा रहना।

पूजा का मूल आचार ब्लोत (बलिदान-समारोह) था — देवताओं को पशु-बलि अर्पण, उसके रक्त का छड़काव और समुदाय का साथ बैठकर भोजन; इसके साथ स्मृति-प्याले (मिन्नी) का चलन था — देवताओं, नायकों और पूर्वजों के नाम पद्य पढ़कर सुरा अर्पित करना। मन्दिर (होफ़) और घरेलू पूजा दोनों थे, तथा नामों में देवताओं के अंश (जैसे ‘थोर-’ से शुरू होने वाले नाम) बच्चों को दिए जाते थे; लेकिन इन आचारों की विस्तृत पद्धति हमें मुख्यतः बाद के लेखन और पर्यटक-विवरणों से मिलती है, इसलिए उसे पूर्ण समझा नहीं जा सकता।

अध्याय 3

आचार और सामुदायिक जीवन

बलि-समारोह, पर्व और समाज-जीवन

धार्मिक जीवन के केंद्र में ऋतु-पर्व थे — शीत के आरम्भ का बलि-समारोह, मध्य-शीत का, और ग्रीष्म का; इनमें देवताओं को बलि अर्पित होता, समुदाय साथ भोजन करता और स्मृति-प्याले चलते थे। राजा और प्रमुख व्यक्ति पूजा-समारोहों के प्रायोजक होते थे — धर्म और सामाजिक व्यवस्था एक ही आयोजन में मिलते थे। व्यक्तिगत व्रत, शपथ और देवताओं के नाम पर प्रतिज्ञाएँ भी जीवन का अंग थीं।

मृत्यु-संस्कार में शव-दाह और शव-समाधि दोनों प्रचलित थे; सम्पन्न लोगों के साथ नाव, अश्व और उपकरण समाधिस्थ किए जाते थे — यह विश्वास कि मृतक की यात्रा जारी रहती है। योद्धाओं की दृष्टि में युद्ध में मरने वाले ओदिन के प्रांगण (वलहल्ला) में जाते थे, जहाँ वे दैनिक युद्ध-अभ्यास और सामूहिक भोजन करते थे — और रैग्नरोक के दिन देवताओं के साथ लड़ने के लिए तैयार रहते थे; जबकि अन्य मार्ग भी थे — कुछ मृतकों के अन्य आवास। ये चित्र काव्यों से मिलते हैं; स्थानीय विविधता और समय-काल के अनुसार परिवर्तन की सीमा रही है।

अध्याय 4

विविधता-सूचना

शाखाएँ, पाठ-परम्परा और मर्यादा

नॉर्स धर्म क्षेत्र-क्षेत्र और युग-युग में भिन्न रहा — स्वीडेन, नॉर्वे, डेनमार्क और आइसलैंड की प्रथाएँ एक-सी नहीं थीं, और देवताओं की प्रधानता स्थान व समाज-वर्ग के अनुसार बदलती थी। हमारा सारा लिखित स्रोत धर्म-परिवर्तन के बाद का लेखन है, और यह पृष्ठ उस लेखन को प्राचीन धर्म का एकमात्र सही चित्र नहीं मानता।

अध्याय 5

ग्रंथ-अध्याय

पोएटिक एड्डा — देव और नायक-काव्यों का संकलन

नॉर्स धर्म-साहित्य की पढ़ाई पोएटिक एड्डा से आरम्भ होती है — अज्ञात कवियों के प्राचीन देव-काव्यों और नायक-काव्यों का संकलन, जिसकी सबसे प्रसिद्ध पाण्डुलिपि आइसलैंड में मिली है। ये काव्य शास्त्र नहीं, गाए जाने वाले काव्य हैं — पर इन्हीं में नॉर्स धर्म का देव-चित्र, सृष्टि-गाथा, अन्त-काल की भविष्यवाणी और जीवन-नीति सब सँजोए हैं। ध्यान देने योग्य है कि यह संकलन धर्म-परिवर्तन के बाद के युग का है — कवियों ने प्राचीन स्मृति को लिपिबद्ध किया, आचार-विधि नहीं।

अध्याय 6

ग्रंथ-अध्याय

प्रोज़ एड्डा — कवियों के लिए कथा और काव्य-शास्त्र

पोएटिक एड्डा के समकक्ष गद्य-सार है प्रोज़ एड्डा — आइसलैंड के विद्वान कवि-राजनेता स्नोरी स्तर्लुसोन का ग्रंथ। इसका उद्देश्य व्यावहारिक था — नवीन कवियों को प्राचीन केनिंग (पद-संकेत) की शिक्षा देना; और उसके लिए देवताओं की कथाएँ समझानी पड़ीं। इसीलिए यह ग्रंथ नॉर्स देव-कथाओं का सबसे सुसंगठित गद्य-विवरण बन गया — सृष्टि, ओदिन के आरम्भिक प्रवास की कथा, थोर की राक्षस-यात्राएँ, लोकी की चतुराइयाँ और बाल्दर की मृत्यु, जो रैग्नरोक का प्रथम सूचक बनती है। स्नोरी ईसाई विद्वान था — उसने आरम्भ में स्पष्ट लिखा कि ये देवता मूलतः प्राचीन योद्धा-पूर्वज माने जाते रहे हैं; यह उसकी अपनी व्याख्या है, जिसे ग्रंथ के बाकी भाग से अलग करके पढ़ना चाहिए।

अध्याय 7

ग्रंथ-अध्याय

हावामाल — ओदिन से जुड़ा नीति-काव्य

दूसरा प्रसिद्ध काव्य हावामाल है — ‘उच्चतम के (ओदिन के) कहे’। यह देव-कथा नहीं, जीवन-नीति का काव्य है — अतिथि की मर्यादा (घर में प्रवेश करते ही किसी के ऊपर दृष्टि न डालना, बल्कि पानी-तौलिया पूछना), मेहमान-नवाज़ी की सावधानियाँ, मित्रता, किफ़ायत, चुप्पी का मूल्य और स्तुति-पाठ की ओलाद — छोटे-छोटे अनुभव-सूत्रों की गाथा। इसके अन्तिम खंडों में ओदिन अपनी जादुई विद्याओं — मन्त्र-गान, मृतकों से वार्ता — की उपलब्धियाँ गाता है, जिन्हें उसने अपने प्राण-वृक्ष पर नौ रातें लटककर और बलि-देकर पाया — ज्ञान के लिए आत्म-त्याग का वह चित्र जो नॉर्स धर्म का केंद्रीय स्वर बन गया।

अध्याय 8

ग्रंथ-अध्याय

वोलुस्पा — सृष्टि और रैग्नरोक का दृष्टिगीत

इसी संकलन का सर्वाधिक प्रसिद्ध काव्य वोलुस्पा है — ‘भविष्यवक्त्री की भविष्यवाणी’। इसमें एक वृद्धा ज्ञान-जाति की स्त्री (वोल्वा) मृतकों को जगाकर उनसे स्मृति पूछती है और संपूर्ण काल-चक्र सुनाती है — आदिम शून्य से संसार की रचना, यग्गद्रासिल वृक्ष, पहले मनुष्य, देवताओं के आदर्श युग और उसके बाद पहली विसंगति — और अन्त में रैग्नरोक का पूरा दृश्य: सूर्य का काला होना, प्रकृति का उथल-पुथल, देवताओं की अन्तिम युद्ध-पंक्ति — और उसके बाद नया, हरा संसार जिसमें खेत बिना बोए उगेंगे। यह काव्य नॉर्स धर्म का वह संक्षिप्त विश्व-दर्शन है जो दूसरी परम्पराओं में पूरे ग्रंथ बनते हैं।

अध्याय 9

ग्रंथ-अध्याय

यंगलिंगा सागा — राजवंशीय इतिहास-कथा

सागा-साहित्य से यंगलिंगा सागा विशेष रूप से धर्म से जुड़ी है — यह भी स्नोरी की रचना है, स्वीडेन के प्राचीन राजवंशों की गाथा, जिसका आरम्भ ओदिन से होता है। कथा के अनुसार ओदिन एशिया के प्रदेश से आकर नॉर्स देशों में आया, उसके अनुयायी उसे देवता मानने लगे, और उसकी मृत्यु के बाद उसे विशेष समारोह में अर्पित किया गया — इसी वंश से स्वीडिश राजा अपना वंश जोड़ते थे। गाथा में प्राचीन बलि-स्थल (जैसे उप्साला) की पूजा-पद्धति का विवरण भी मिलता है। यह साहित्य इतिहास-काव्य है — धर्म-ग्रंथ नहीं — पर प्राचीन पूजा-प्रथा की स्मृति इसी में उतरी है।

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