जीवित धार्मिक परम्परा — मौखिक स्तोत्र-शास्त्र, गुरु-परम्परा और समुदाय-आचार · मुख्यतः उत्तरी इराक़ (सिंजार और लालिश क्षेत्र), साथ में सीरिया, तुर्किये, कॉकेसस और प्रवासी समुदाय; आज जीवित परम्परा

Yazidism / Ezidism (एज़ीदी धर्म)

यज़ीदी आस्था—मेसोपोटामिया की धरती से जुड़ी, मौखिक पवित्र वाणी, सामुदायिक स्मृति और ईश्वर-भक्ति की जीवंत परम्परा।

0 ग्रंथ0 प्रमुख शाखाएँ
उद्भव
उत्तरी मेसोपोटामिया, विशेषकर वर्तमान उत्तरी इराक का कुर्दी-भाषी क्षेत्र; इसकी ऐतिहासिक जड़ें पुरानी हैं, लेकिन आरम्भ की कोई सर्वमान्य तिथि नहीं है।
संस्थापक/स्रोत
किसी एक निर्विवाद संस्थापक का नाम नहीं दिया जा सकता। श्रद्धेय शेख़ अदी इब्न मुसाफ़िर और उनकी परम्परा ने लगभग बारहवीं शताब्दी से इसके ऐतिहासिक स्वरूप को गहराई से प्रभावित किया।
मुख्य ग्रंथ
पवित्र ज्ञान का प्रमुख स्रोत मौखिक क़ौल, प्रार्थनाएँ और धार्मिक कथाएँ हैं। समुदाय द्वारा सर्वमान्य पाँच–आठ लिखित धर्मग्रंथों की सूची उपलब्ध नहीं है। नीचे मौखिक विधाओं और यज़ीदी परम्परा से जोड़ी गई दो विवादित पुस्तकों को अलग-अलग स्पष्ट किया गया है।
अनुयायी
लगभग 7–10 लाख के अनुमान मिलते हैं; विस्थापन और अलग-अलग गणनाओं के कारण निश्चित संख्या उपलब्ध नहीं है। प्रमुख समुदाय इराक तथा जर्मनी, आर्मेनिया, जॉर्जिया और अन्य देशों में हैं।
पवित्र स्थल
लालिश, उत्तरी इराक—श्रद्धेय शेख़ अदी की समाधि और यज़ीदी समुदाय का प्रमुख तीर्थस्थल।

उद्भव और इतिहास

यह परम्परा कैसे बनी

यज़ीदी आस्था का उद्भव उत्तरी मेसोपोटामिया के उस सांस्कृतिक क्षेत्र में हुआ, जहाँ आज मुख्यतः इराक, सीरिया और तुर्किये के कुछ भाग आते हैं। इसकी प्रमुख धार्मिक भाषा कुर्दी की कुर्मांजी बोली है। परम्परा में प्राचीन क्षेत्रीय और ईरानी धार्मिक धारणाओं के साथ आसपास की संस्कृतियों से हुए संपर्कों के चिह्न मिलते हैं। फिर भी इसे किसी दूसरे धर्म की शाखा या केवल विभिन्न धर्मों का मिश्रण कहना इसकी स्वतंत्र पहचान को अधूरा समझना होगा।

लगभग बारहवीं शताब्दी में श्रद्धेय शेख़ अदी इब्न मुसाफ़िर लालिश में रहे। वे सूफ़ी पृष्ठभूमि के धर्माचार्य थे, और उनसे जुड़ी धार्मिक परम्परा ने बाद के यज़ीदी सामुदायिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। उनकी समाधि प्रमुख तीर्थ बनी। इतिहासकार यज़ीदी धर्म के वर्तमान स्वरूप को कई शताब्दियों में विकसित हुआ मानते हैं। इसलिए शेख़ अदी को किसी एक निश्चित दिन नया धर्म स्थापित करने वाला संस्थापक बताना ऐतिहासिक साक्ष्यों से अधिक सरल निष्कर्ष होगा।

आगे की शताब्दियों में यज़ीदी समुदाय ने अपनी धार्मिक वाणी, तीर्थों और पारिवारिक परम्पराओं के माध्यम से पहचान बनाए रखी। उसे बार-बार उत्पीड़न और विस्थापन भी सहना पड़ा। वर्ष 2014 में तथाकथित इस्लामिक स्टेट ने इराक के सिंजार क्षेत्र में यज़ीदियों के विरुद्ध नरसंहार किया, जिसे संयुक्त राष्ट्र की जाँचों ने मान्यता दी है। आज इराक और प्रवासी समुदायों में धार्मिक गायन, सांस्कृतिक संस्थाओं तथा डिजिटल अभिलेखन से परम्परा सुरक्षित रखने के प्रयास जारी हैं।

मूल सिद्धान्त

मुख्य मान्यताएँ

01

एक सर्वोच्च सृष्टिकर्ता

यज़ीदी आस्था एक सर्वोच्च ईश्वर को सृष्टि का मूल मानती है। ईश्वर और संसार का संबंध पवित्र कथाओं, प्रार्थनाओं तथा दिव्य सत्ताओं की भूमिका से समझाया जाता है। इसे केवल अनेक देवताओं की पूजा कहना उचित नहीं है। इसकी अपनी धार्मिक शब्दावली और व्याख्याएँ हैं, जिन्हें दूसरे धर्मों की श्रेणियों में पूरी तरह नहीं समेटा जा सकता।

02

सात पवित्र दिव्य सत्ताएँ

यज़ीदी परम्परा में सात पवित्र दिव्य सत्ताओं का विशेष स्थान है, जिन्हें प्रायः देवदूत कहा जाता है। इनमें श्रद्धेय ताऊसे मेलेक, अर्थात् मयूर देवदूत, केंद्रीय हैं। उन्हें ईश्वर द्वारा संसार की देखरेख से जुड़ी भूमिका सौंपी गई मानी जाती है। उन्हें शैतान समझना बाहरी आरोप और गंभीर धार्मिक भ्रांति है।

03

आत्मा की निरन्तर यात्रा

आत्मा का एक जीवन से दूसरे जीवन में जाना यज़ीदी धार्मिक परम्परा का एक महत्त्वपूर्ण विचार है। इसे कभी रूपक में आत्मा के वस्त्र बदलने जैसा समझाया जाता है। इसके विवरण अलग-अलग मौखिक कथाओं और व्याख्याओं में भिन्न हो सकते हैं; इसे किसी अन्य धर्म के पुनर्जन्म-सिद्धान्त की हूबहू प्रतिलिपि नहीं मानना चाहिए।

04

पवित्रता और धार्मिक अनुशासन

यज़ीदी जीवन में धार्मिक पवित्रता, पवित्र स्थलों के सम्मान और निर्धारित आचरण का महत्त्व है। सूर्य की दिशा की ओर प्रार्थना तथा जल और अग्नि के प्रति आदर इसके परिचित उदाहरण हैं। इनके आधार पर यज़ीदियों को केवल सूर्य-पूजक या अग्नि-पूजक कहना भ्रामक होगा; ये व्यापक धार्मिक संसार के अंग हैं।

05

समुदाय और धार्मिक उत्तरदायित्व

यज़ीदी पहचान परम्परागत रूप से जन्म और समुदाय से जुड़ी है; धर्मांतरण द्वारा प्रवेश सामान्यतः स्वीकार नहीं किया जाता। विवाह भी समुदाय के भीतर और पारम्परिक वंशानुगत धार्मिक वर्गों के नियमों के अनुसार होते हैं। शेख़, पीर और मुरीद जैसे वर्गों के बीच विशिष्ट धार्मिक संबंध तथा दायित्व हैं, जिनका पालन अलग-अलग समुदायों में भिन्न हो सकता है।

06

मौखिक ज्ञान का आदर

पवित्र ज्ञान केवल लिखित पुस्तक में सीमित नहीं है। धार्मिक गायकों और ज्ञानधारकों द्वारा स्मरण, गायन और व्याख्या के माध्यम से उसे आगे पहुँचाया जाता है। क़ौल इस परम्परा के प्रमुख वाहक हैं। इसलिए किसी एक मुद्रित पुस्तक को समूचे यज़ीदी धर्म का अंतिम और सर्वमान्य विधान मानना सही नहीं होगा।

पवित्र ग्रंथ

धार्मिक ग्रंथ — सार में

1पवित्र क़ौल-संग्रहQewl / Qewlên Êzdiyan · अलग-अलग रचनाओं का काल अनिश्चित; पीढ़ियों से मौखिक संचार, आधुनिक काल में अनेक लिप्यंतरण और संकलन।▾

क़ौल यज़ीदी परम्परा के पवित्र धार्मिक काव्य या भजन हैं; यह किसी एक लेखक की एक निश्चित पुस्तक का नाम नहीं है। इन्हें विशेष धार्मिक गायकों, जिन्हें क़व्वाल कहा जाता है, और अन्य जानकारों ने मौखिक रूप से सुरक्षित रखा है। इनके विषयों में सृष्टि, ईश्वर, पवित्र दिव्य सत्ताएँ, श्रद्धेय धार्मिक व्यक्तित्व, मृत्यु और उचित आचरण शामिल हैं। धार्मिक अवसरों पर इनका गायन ज्ञान के साथ सामुदायिक स्मृति भी संप्रेषित करता है। अलग-अलग क़ौलों के पाठ और व्याख्याओं में भिन्नताएँ मिल सकती हैं। आधुनिक प्रकाशित संग्रह महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं, लेकिन किसी एक संग्रह को सभी यज़ीदियों का बंद और अंतिम धर्मग्रंथ नहीं माना जाना चाहिए।

2धार्मिक बेत और स्तुति-काव्यBeyt · रचनाओं का काल अलग-अलग और प्रायः अनिश्चित; दीर्घकालीन मौखिक परम्परा।▾

बेत यज़ीदी मौखिक धार्मिक साहित्य की एक काव्य-विधा है, न कि सर्वमान्य स्वतंत्र धर्मग्रंथ का शीर्षक। यह धार्मिक स्तुति, स्मरण और पवित्र व्यक्तित्वों से जुड़े विषयों को काव्यात्मक रूप देता है। इसके कुछ रूप विशिष्ट धार्मिक अवसरों और भक्ति-संबंधी गतिविधियों से जुड़े हैं। इन रचनाओं को समझने के लिए केवल लिखे हुए शब्द पर्याप्त नहीं होते; गायन, प्रसंग और जानकारों की व्याख्या भी महत्त्वपूर्ण हैं। बेत और दूसरी मौखिक विधाओं की सीमाएँ हर विवरण में समान ढंग से नहीं बताई जातीं। इसलिए इसे निश्चित अध्यायों और एक रचना-तिथि वाली पुस्तक बताने के बजाय जीवित पवित्र साहित्य की श्रेणी के रूप में पहचानना अधिक सटीक है।

3प्रार्थनाएँ और आशीर्वचनDu'a · अनेक प्रार्थनाओं की रचना-तिथि अज्ञात; मौखिक रूप से संचारित, बाद में विभिन्न संकलनों में लिखित।▾

यज़ीदी प्रार्थनाएँ दैनिक भक्ति और धार्मिक अवसरों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। दुआ किसी एक सर्वमान्य पुस्तक का नाम नहीं, बल्कि प्रार्थना की व्यापक विधा है। इनके विषयों में ईश्वर की महिमा, पवित्र सत्ताओं का स्मरण, संरक्षण की कामना और समुदाय के कल्याण की प्रार्थना शामिल हो सकती है। इनका प्रयोग अवसर, स्थानीय परम्परा और धार्मिक भूमिका के अनुसार बदलता है। प्रकाशित संकलन इन्हें अध्ययन और संरक्षण के लिए उपलब्ध कराते हैं, लेकिन वे मौखिक अभ्यास की पूरी विविधता नहीं समेटते। इनसे यह समझने में सहायता मिलती है कि यज़ीदी धर्म में विश्वास केवल विचार नहीं, बल्कि बोली गई और जी गई भक्ति भी है।

4प्रकाशना की पुस्तकKitêba Cilwe / Kitāb al-Jilwa · प्रचलित लिखित रूप लगभग उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में सामने आए; मूल रचना-काल और प्रामाणिकता विवादित।▾

इस नाम से प्रसारित पुस्तक को पुराने बाहरी विवरणों में यज़ीदियों का प्रमुख धर्मग्रंथ बताया गया था। इसके प्रचलित पाठ में दिव्य अधिकार, मार्गदर्शन और समुदाय से जुड़े निर्देश मिलते हैं; इसे विशेष रूप से श्रद्धेय ताऊसे मेलेक से संबद्ध किया गया है। किंतु आधुनिक शोध इन प्रसारित लिखित प्रतियों को निर्विवाद, प्राचीन और समुदाय द्वारा सर्वमान्य धर्मग्रंथ नहीं मानता। कुछ अंश वास्तविक परम्पराओं से समानता रख सकते हैं, पर इससे पूरे पाठ का प्रामाणिक होना सिद्ध नहीं होता। इसका अध्ययन यज़ीदी धर्म की बाहरी प्रस्तुतियों के इतिहास को समझने में उपयोगी है। इसे वास्तविक मौखिक क़ौल-परम्परा का विकल्प नहीं बनाना चाहिए।

5काली पुस्तकMishefa Reş / Maṣḥaf Rash · प्रचलित लिखित रूप लगभग उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में सामने आए; प्राचीन रचना-तिथि प्रमाणित नहीं।▾

काली पुस्तक के नाम से ज्ञात पाठ में सृष्टि, पवित्र सत्ताओं, समुदाय की उत्पत्ति और कुछ धार्मिक निषेधों से संबंधित कथाएँ मिलती हैं। पुराने विवरणों ने इसे अक्सर यज़ीदी धर्म की दूसरी मुख्य पुस्तक कहा, लेकिन ऐसा सीधा परिचय आज सावधानी के बिना नहीं देना चाहिए। उपलब्ध प्रतियों की उत्पत्ति और प्रामाणिकता पर गंभीर प्रश्न हैं; उन्हें पूरे समुदाय का स्वीकृत प्राचीन धर्मग्रंथ नहीं माना जा सकता। इनमें यज़ीदी परम्परा से संबंधित सामग्री और बाहरी प्रस्तुति के तत्व साथ मिल सकते हैं। इसलिए इसकी उपयोगिता मुख्यतः तुलनात्मक अध्ययन और धर्म के प्रतिनिधित्व के इतिहास में है, न कि अकेले इसके आधार पर यज़ीदी विश्वास निर्धारित करने में।

आचार

उपासना और साधना

दैनिक प्रार्थना

परम्परागत प्रार्थनाओं में सूर्य की दिशा की ओर मुख करना महत्त्वपूर्ण माना जाता है, विशेषकर सूर्योदय और सूर्यास्त से जुड़े अवसरों पर। यह प्रकाश की धार्मिक महत्ता दर्शाता है। प्रार्थना की नियमितता और विस्तृत रीति परिवार, स्थान तथा व्यक्ति के अनुसार बदल सकती है।

लालिश की तीर्थयात्रा

लालिश में श्रद्धेय शेख़ अदी की समाधि और अन्य पवित्र स्थानों का दर्शन प्रमुख धार्मिक अभ्यास है। तीर्थक्षेत्र में नंगे पाँव चलना सम्मान की परिचित रीति है। यात्रा में प्रार्थना, पवित्र जल से जुड़े संस्कार और सामुदायिक मिलन शामिल हो सकते हैं।

पवित्र गायन

क़व्वाल धार्मिक क़ौलों का गायन करके परम्परा को जीवित रखते हैं। कुछ धार्मिक अवसरों पर दफ़ और शबाब जैसे वाद्य प्रयुक्त होते हैं। यह केवल संगीत-प्रदर्शन नहीं, बल्कि पवित्र ज्ञान, स्मृति और सामुदायिक पहचान के संचार का माध्यम है।

उपवास

दिसम्बर में ईश्वर के सम्मान में मनाए जाने वाले ईज़ी पर्व से पहले तीन दिन का उपवास प्रमुख सामुदायिक अभ्यास है। उपवास में दिन के समय भोजन और पेय से परहेज़ किया जाता है। इसके बाद उत्सव, पारिवारिक मेल-मिलाप और सामूहिक प्रसन्नता का अवसर आता है।

पवित्र जल का संस्कार

लालिश के कानिया स्पी, अर्थात् श्वेत झरने, के जल से संबंधित मोर किरिन संस्कार यज़ीदी धार्मिक जीवन में महत्त्वपूर्ण है। इसे प्रायः बच्चों से जोड़ा जाता है। यह जन्म से प्राप्त सामुदायिक पहचान का धार्मिक संस्कार है, बाहरी व्यक्ति के धर्मांतरण का सामान्य माध्यम नहीं।

पर्व और प्रतीक

त्योहार, प्रतीक और मूल सीख

यज़ीदी नववर्ष—चारशेमा सोर

पारम्परिक जूलियन कैलेंडर के अप्रैल के पहले बुधवार को मनाया जाता है। रंगे हुए अंडे, फूल और घरों की सजावट इसके परिचित रूप हैं; यह वसंत और सृष्टि के नवीकरण से जुड़ा है।

जमाइया—समागम पर्व

शरद ऋतु में लालिश का प्रमुख सामुदायिक तीर्थ-समागम होता है। श्रद्धालु प्रार्थना, पवित्र गायन और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं; श्रद्धेय शेख़ अदी का स्मरण केंद्रीय रहता है।

ईज़ी का पर्व

दिसम्बर में तीन दिन के उपवास के बाद मनाया जाने वाला यह पर्व ईश्वर के सम्मान से जुड़ा है। परिवार और समुदाय मिलकर भोजन, मुलाक़ात और शुभकामनाओं के साथ उत्सव मनाते हैं।

  • ◆ मयूर — श्रद्धेय ताऊसे मेलेक का प्रमुख दृश्य प्रतीक; दिव्य देखरेख और पवित्र उपस्थिति से जुड़ा।
  • ◆ संजक — धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयुक्त मयूर-रूप पवित्र धातु-चिह्न।
  • ◆ सूर्य और प्रकाश — प्रार्थना की दिशा तथा पवित्रता से जुड़े संकेत; इन्हें अकेले पूरी आस्था की परिभाषा नहीं समझना चाहिए।
  • ◆ शंक्वाकार तीर्थ-शिखर — लालिश और अन्य यज़ीदी पवित्र स्थलों की विशिष्ट स्थापत्य पहचान।
  • ◆ दीपक की ज्योति — तीर्थस्थलों और धार्मिक अवसरों पर श्रद्धा तथा पवित्र प्रकाश की अभिव्यक्ति।
यज़ीदी परम्परा से ईश्वर के प्रति श्रद्धा, पवित्र जीवन के सम्मान और पीढ़ियों से मिले ज्ञान को सँजोने का महत्त्व सामने आता है। उसका इतिहास यह भी याद दिलाता है कि किसी समुदाय को बाहरी आरोपों से नहीं, उसकी अपनी पहचान, जीवित परम्पराओं और मानवीय गरिमा के आधार पर समझना चाहिए।

अध्यायवार अध्ययन

यज़ीदी धर्म — विस्तृत पाठ

विषय और ग्रंथ अलग अध्यायों में पढ़ें। प्रत्येक ग्रंथ की अपनी स्थिति और परम्परागत मर्यादा साथ दी गई है।

अध्याय 1

विषयगत परिचय

परिचय और सांस्कृतिक संदर्भ

यज़ीदी धर्म कुर्द-भाषी समुदायों की जीवित धार्मिक परम्परा है, जिसका विशेष केंद्र सिंजार का क्षेत्र और इराक़ी कुर्दिस्तान का लालिश मन्दिर-परिसर है; प्रवास और इतिहास की परिस्थितियों से समुदाय आज विश्व के कई देशों में फैला है। यह एकेश्वरवादी परम्परा है — इसकी दृष्टि में ईश्वर ने संसार रचा और उसकी देखरेख देवदूतों को सौंपी, जिनमें सबसे प्रमुख ताऊसी मेलेक (मोर-राजा देवदूत) हैं। इस परम्परा की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मूल रूप से और आज भी मुख्यतः मौखिक है — इसका धार्मिक ज्ञान लिखित ‘शास्त्र’ से कम और गुरु-शिष्य परम्परा तथा स्तोत्र-गायकों (क़ेववाल) के सुनाए स्तोत्रों से ज़्यादा चलता है। ध्यान रहे — इस परम्परा पर इतिहास में बार-बार भ्रामक आरोप लगाए गए हैं; यह पृष्ठ समुदाय की अपनी समझ के अनुसार उसे प्रस्तुत करता है, बाहरी आरोपों के अनुसार नहीं।

अध्याय 2

मूल मान्यताएँ

प्रमुख आधार और दृष्टियाँ

यज़ीदी दृष्टि में एक ईश्वर ने संसार रचा और उसका संचालन सात देवदूतों को सौंपा, जिनका मुखिया ताऊसी मेलेक है — परम्परा में उनकी कथा यह है कि जब उनसे अहंकार के लिए कहा गया, उन्होंने अन्तर्मन से पश्चात् किया और ईश्वर ने उन्हें क्षमा कर उनका मुखिया-पद दिया; इसीलिए वे आत्म-समर्पण और क्षमा के स्वरूप के रूप में आदर पाते हैं। मोर उनका संकेत-रूप है। यह परम्परा समुदाय के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है — इतिहास में बाहरी लोगों ने ताऊसी मेलेक को अन्य धर्मों की दृष्टि से पढ़कर यज़ीदियों पर गलत आरोप लगाए; समुदाय उन आरोपों को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करता है — यज़ीदी धर्म में वह स्वरूप जिसे अन्य परम्पराएँ ‘शैतान’ कहती हैं, किसी भी रूप में पूज्य नहीं है।

इस परम्परा का दूसरा केंद्र शेख आदी हैं — वह आध्यात्मिक पुरुष जिन्हें परम्परा धर्म का संगठनकर्ता और ताऊसी मेलेक का प्रतिबिम्ब मानती है; लालिश मन्दिर-परिसर उनकी समाधि से जुड़ा है और यही समुदाय का सबसे पवित्र स्थल है। साथ में सन्तों और वंश-गुरुओं की विशाल परम्परा है — यज़ीदी समाज में हर व्यक्ति को विशेष वंशों से गुरु (शेख और पीर) मिलते हैं, जो उसके धार्मिक जीवन के मार्गदर्शक होते हैं।

यज़ीदी आचार की पहचान है — सूर्य की दिशा में प्रार्थना, अग्नि और प्रकाश का आदर, पवित्र-शुद्धता की देखरेख, वंश के भीतर विवाह की मर्यादा और ऋतु-पर्व। समुदाय के पर्वों में वसंत के नववर्ष का उत्सव (चर्शेमा सोर, ‘लाल बुधवार’) सबसे प्रमुख है, जब लालिश में विशेष आयोजन होता है। यह धर्म जन्म से जुड़ा है — यज़ीदी न धर्म-परिवर्तन करता है, न बाहर से प्रवेश होता है; यह समुदाय की पहचान और अस्तित्व की समझ का अंग है, जो सदियों के उत्पीड़न के अनुभव से और गहरा हुआ है।

अध्याय 3

आचार और सामुदायिक जीवन

लालिश, पर्व और गुरु-परम्परा

यज़ीदी धार्मिक जीवन का केंद्र लालिश मन्दिर-परिसर है — शेख आदी की समाधि, उसके मन्दिर-गुम्बज और पवित्र झरने-स्थल समुदाय की तीर्थ-यात्रा का लक्ष्य हैं; नववर्ष के पर्व पर विश्व-भर से यज़ीदी यहाँ आते हैं। लालिश की अपनी मर्यादा है — त्योहार के आयोजनों में शुद्धता के नियम, विशेष वस्त्र और आचार-प्रवेश; परिसर की पवित्रता और उसकी देखरेख की ज़िम्मेदारी विशेष वंशों के पास है।

दैनिक जीवन में प्रार्थना का चलन है — सूर्य की दिशा की ओर मुख करके प्रार्थना, दिन-प्रतिदिन के समय-चक्र से जुड़ी। गुरु-परम्परा धार्मिक जीवन का स्थायी सहारा है — हर यज़ीदी के शेख और पीर उसके जीवन-संस्कारों (जन्म, विवाह, अन्त्येष्टि) में भागी होते हैं। पर्वों में वसंत-नववर्ष के साथ उपवास-अवधियाँ, स्मृति-दिवस और सन्तों की स्मृति-सभाएँ भी हैं; धार्मिक ज्ञान के सुनाने वाले क़ेववाल पर्वों और सभाओं में स्तोत्र गाकर समुदाय तक परम्परा पहुँचाते हैं।

अध्याय 4

विविधता-सूचना

शाखाएँ, पाठ-परम्परा और मर्यादा

यज़ीदी परम्परा क्षेत्र-क्षेत्र में भिन्न रूपों में चलती है — इराक़, तुर्किये, सीरिया, कॉकेसस और प्रवासी समुदायों की आचार-पद्धतियाँ एक-सी नहीं हैं, और उसके ज्ञान-स्रोतों की प्रामाणिकता (विशेषतः मिशफ़ा रेश और किताब अल-जिल्वा पर) समुदाय-भीतर भी विभिन्न दृष्टियाँ रखी गई हैं; यह पृष्ठ किसी एक रूप को एकमात्र सही नहीं मानता और समुदाय की अपनी समझ को प्राथमिक रखता है।

अध्याय 5

ग्रंथ-अध्याय

क़ेवल — मौखिक पवित्र भजन

यज़ीदी धर्म का वास्तविक ‘शास्त्र’ उसके स्तोत्र हैं — क़ेवल (क़ेव्ल)। ये धार्मिक भजन-स्तोत्र हैं जो शताब्दियों से मौखिक रूप में विशेष गायक-जाति (क़ेववाल) द्वारा याद किए और सुनाए जाते रहे हैं — इन्हें लिखने की परम्परा हाल के युग में ही बढ़ी है। क़ेवलों में इस धर्म का सार है — सृष्टि की कथा, ताऊसी मेलेक का पात्र, शेख आदी और सन्तों की महिमा, नैतिक शिक्षा और समुदाय के पर्व-आचार का विवरण। ये स्तोत्र शास्त्र-पाठ नहीं, गाया जाने वाला ज्ञान है — लालिश के आयोजनों, पर्वों और धार्मिक सभाओं में विशेष धुनों पर गाए जाते हैं, और गायक-परम्परा को इन्हें यथार्थ रखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।

अध्याय 6

ग्रंथ-अध्याय

बैत — संकेतात्मक धार्मिक काव्य

क़ेवलों से गहरे जुड़ा दूसरा रूप है बैत — धार्मिक काव्य-पंक्तियाँ, जो संकेतात्मक और गूढ़ भाषा में लिखी जाती हैं। बैत पढ़ने-सुनने की अपनी मर्यादा है — परम्परा में इन्हें विशेष अवसरों पर, विशेष लोगों द्वारा सुनाया जाता है। इन काव्यों में आध्यात्मिक कथाएँ, सन्तों के पात्र और दर्शन-संकेत छिपे हैं — उनका पूरा अर्थ गुरु-परम्परा के अनुभव से समझा जाता है, केवल पाठ से नहीं। यह गूढ़ता यज़ीदी वाङ्मय की विशेषता है — ज्ञान उपलब्ध है, पर उसका अर्थ परम्परा के भीतर से ही खुलता है।

अध्याय 7

ग्रंथ-अध्याय

मिशेफ़ा रेश — परम्परागत रूप से संबद्ध पाठ

मिशेफ़ा रेश, जिसे ‘काली पुस्तक’ के नाम से भी प्रस्तुत किया गया है, यज़ीदी धर्म से परम्परागत रूप से संबद्ध एक लिखित पाठ है। प्रकाशित रूपों में सृष्टि, समुदाय और धार्मिक पहचान से जुड़ी सामग्री मिलती है, पर इसकी उत्पत्ति और प्रामाणिकता पर गंभीर प्रश्न हैं। इसलिए इसे समुदाय की निर्विवाद शास्त्र-संहिता नहीं कहा गया है; जीवित मौखिक क़ेवल-बैत परम्परा को प्राथमिक रखा गया है।

अध्याय 8

ग्रंथ-अध्याय

किताब अल-जिल्वा — परम्परागत रूप से संबद्ध पाठ

किताब अल-जिल्वा, अर्थात् ‘प्रकटीकरण की पुस्तक’, भी यज़ीदी परम्परा से संबद्ध बताई गई लिखित रचनाओं में गिनी जाती है। इसके प्रकाशित पाठ और उनकी प्रामाणिकता को लेकर समुदाय तथा शोध में एकमत स्थिति नहीं है। इस कारण यहाँ इसका परिचय केवल परम्परागत रूप से संबद्ध पाठ के रूप में है—यज़ीदी धर्म का निश्चित, सर्वमान्य मूल ग्रंथ कहकर नहीं।

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