यज़ीदी दृष्टि में एक ईश्वर ने संसार रचा और उसका संचालन सात देवदूतों को सौंपा, जिनका मुखिया ताऊसी मेलेक है — परम्परा में उनकी कथा यह है कि जब उनसे अहंकार के लिए कहा गया, उन्होंने अन्तर्मन से पश्चात् किया और ईश्वर ने उन्हें क्षमा कर उनका मुखिया-पद दिया; इसीलिए वे आत्म-समर्पण और क्षमा के स्वरूप के रूप में आदर पाते हैं। मोर उनका संकेत-रूप है। यह परम्परा समुदाय के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है — इतिहास में बाहरी लोगों ने ताऊसी मेलेक को अन्य धर्मों की दृष्टि से पढ़कर यज़ीदियों पर गलत आरोप लगाए; समुदाय उन आरोपों को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करता है — यज़ीदी धर्म में वह स्वरूप जिसे अन्य परम्पराएँ ‘शैतान’ कहती हैं, किसी भी रूप में पूज्य नहीं है।
इस परम्परा का दूसरा केंद्र शेख आदी हैं — वह आध्यात्मिक पुरुष जिन्हें परम्परा धर्म का संगठनकर्ता और ताऊसी मेलेक का प्रतिबिम्ब मानती है; लालिश मन्दिर-परिसर उनकी समाधि से जुड़ा है और यही समुदाय का सबसे पवित्र स्थल है। साथ में सन्तों और वंश-गुरुओं की विशाल परम्परा है — यज़ीदी समाज में हर व्यक्ति को विशेष वंशों से गुरु (शेख और पीर) मिलते हैं, जो उसके धार्मिक जीवन के मार्गदर्शक होते हैं।
यज़ीदी आचार की पहचान है — सूर्य की दिशा में प्रार्थना, अग्नि और प्रकाश का आदर, पवित्र-शुद्धता की देखरेख, वंश के भीतर विवाह की मर्यादा और ऋतु-पर्व। समुदाय के पर्वों में वसंत के नववर्ष का उत्सव (चर्शेमा सोर, ‘लाल बुधवार’) सबसे प्रमुख है, जब लालिश में विशेष आयोजन होता है। यह धर्म जन्म से जुड़ा है — यज़ीदी न धर्म-परिवर्तन करता है, न बाहर से प्रवेश होता है; यह समुदाय की पहचान और अस्तित्व की समझ का अंग है, जो सदियों के उत्पीड़न के अनुभव से और गहरा हुआ है।