धर्म

विषय

धर्म

धर्म — जो धारण करता है, टिकाए रखता है।

यह पृष्ठ संपादकीय सरल परिचय है — मूल श्लोक, अनुवाद या उद्धरण नहीं। किसी पंक्ति को शास्त्र-वचन न मानें।

परिचय

धर्म को अक्सर 'रिलीजन' कहकर समझा जाता है, पर परम्परा में इसका अर्थ और चौड़ा है — वह आचरण जो व्यक्ति, परिवार और समाज को टिकाए रखता है। स्थान, पद और समय के अनुसार धर्म का रूप बदलता रहता है।

सरल अर्थ

सरल भाषा में — अपनी जगह पर रहते हुए जो उचित है, वही धर्म है। विद्यार्थी का धर्म अलग, माता-पिता का अलग, राजा का अलग।

जिज्ञासु और सन्त

जिज्ञासु पूछता है — धर्म और नियम में अन्तर क्या है?

सन्त कहते हैं — नियम बाहर से बाँधता है, धर्म भीतर से सँभालता है। नियम टूटने पर दण्ड मिलता है, धर्म छूटने पर भीतर का सन्तुलन बिगड़ता है।

ध्यान देने योग्य बातें

  • धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं, आचरण भी है।
  • एक ही व्यक्ति के अनेक धर्म हो सकते हैं — भूमिका के अनुसार।
  • संकट के समय धर्म का निर्णय सरल नहीं होता; परम्परा में इसीलिए विवाद भी मिलते हैं।

सावधानी

धर्म-निर्णय के प्रश्न परम्परा में विवादित रहे हैं; यहाँ कोई निर्णय नहीं दिया गया।

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