— प्रश्न का परीक्षण
सर्वशक्ति और logical contradiction
Omnipotence and logical contradictions
निष्कर्षतः, सर्वशक्तिमत्ता का प्रश्न मानवीय तर्क की सीमा से परे परमात्मा के 'लीलामय' और 'धर्ममय' स्वरूप की स्वीकृति का विषय है। परमात्मा न केवल तार्किकता के आधार हैं, अपितु वे तार्किकता के परे 'अचिन्त्य' भी हैं। शास्त्र यह स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर की 'अनन्तता' को सीमित मानवीय बुद्धि के तर्क-जाल में पूर्णतः नहीं बांधा जा सकता। शक्ति का वास्तविक स्वरूप वही है जो सत्य, ज्ञान और धर्म के अनुकूल हो। अतः ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता का अर्थ उनके उस अनंत स्वरूप को जानना है जो अपने संकल्प से सृष्टि को धारण करता है और स्वयं धर्म का आधार बनकर उसे पूर्णता प्रदान करता है।
5 प्रमाण-स्थल · 3 कथन · 6 तर्क / आपत्तियाँ

मूल पाठ · संदर्भ · परीक्षण
— संक्षिप्त उत्तर
30-सेकंड उत्तर
सनातन दृष्टि में सर्वशक्तिमत्ता का अर्थ है—परमात्मा की वह अनंत क्षमता, जो समस्त सृष्टि के धारण, पोषण और संहार में पूर्णतया स्वतंत्र है। शास्त्र कहते हैं कि ईश्वर 'सत्यकाम' और 'सत्यसंकल्प' हैं, अर्थात उनके संकल्प मात्र से सृष्टि का संचालन होता है। यहाँ 'सर्वशक्ति' का अभिप्राय किसी विरोधाभास में उलझना नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से धर्म और व्यवस्था को स्थापित करना है। ईश्वर द्वारा निर्धारित नियमों (ऋत) का पालन करना उनकी शक्ति की सीमा नहीं, अपितु उनकी व्यवस्था की पूर्णता का द्योतक है। अतः सर्वशक्तिमत्ता का अर्थ मनमानी नहीं, अपितु स्वेच्छा से ब्रह्मांडीय व्यवस्था (धर्म) को धारण करने की सामर्थ्य है।
— प्रमाण-सीढ़ी
शास्त्र क्रम से क्या कहते हैं
श्रुति · वेद एवं उपनिषद्
प्रमाण-स्थल: श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.8
न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते ।
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च
उस परमात्मा का न कोई शरीर (कार्य) है और न कोई इन्द्रिय (करण), न कोई उसके समान और न उससे बढ़कर दिखाई देता है। उसकी पराशक्ति अनेक प्रकार की सुनी जाती है, तथा उसका ज्ञान, बल और क्रिया स्वाभाविक हैं।
श्वेताश्वतर उपनिषद् में ईश्वर के स्वरूप और उसकी शक्तियों की चर्चा करते हुए यह मन्त्र आता है।
इससे सिद्ध होता है: यह मन्त्र सिद्ध करता है कि ईश्वर की शक्ति, ज्ञान और क्रिया स्वाभाविक (innate) हैं, वे किसी बाह्य साधन या शरीर पर निर्भर नहीं हैं। चूँकि उसकी शक्ति किसी कारण या उपकरण से उत्पन्न नहीं होती, वह उसकी अपनी सहज प्रकृति है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह स्थल तार्किक विरोधाभासों को हल नहीं करता, केवल ईश्वरीय शक्ति की पूर्णता को घोषित करता है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: केनोपनिषद् 1.3
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः ।
न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्
वहाँ न नेत्र जाते हैं, न वाणी जाती है, और न मन ही पहुँचता है। हम नहीं जानते और न ही यह समझते हैं कि उसे (ब्रह्म को) कैसे उपदेश किया जाए (समझाया जाए)।
केनोपनिषद् का यह खण्ड ब्रह्म (ईश्वर) की अज्ञेयता और मानवीय सीमाओं पर प्रकाश डालता है।
इससे सिद्ध होता है: यह उपनिषद्-वाक्य ब्रह्म की अचिन्त्यता को दर्शाता है। यह स्पष्ट करता है कि ब्रह्म को न तो इन्द्रियों (जैसे नेत्र) से, न वाणी से और न ही मन से जाना जा सकता है, इसलिए उसे सामान्य लौकिक उपदेश की विधि से समझाना भी संभव नहीं है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह केवल ईश्वर की अज्ञेयता बताता है, 'तार्किक विरोधाभास' (logical contradiction) के समाधान पर चर्चा नहीं करता।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
स्मृति · गीता एवं धर्मशास्त्र
प्रमाण-स्थल: भगवद्गीता 7.25
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्
मैं अपनी योगमाया से ढका हुआ सबके सामने प्रकट नहीं होता हूँ, इसलिए यह अज्ञानी संसार मुझे जन्मरहित और अविनाशी नहीं जानता।
भगवद्गीता के सातवें अध्याय में श्रीकृष्ण अपनी मायाशक्ति और अज्ञेयता के बारे में समझा रहे हैं।
इससे सिद्ध होता है: यह दर्शाता है कि ईश्वर की शक्ति के 'योगमाया' स्वरूप के कारण, लौकिक तर्क और प्रत्यक्ष प्रमाण ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को समझने में असमर्थ रहते हैं।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह ईश्वर के मायावी स्वरूप को बताता है, तार्किक विरोधाभास के तकनीकी अर्थ पर चर्चा नहीं करता।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: भगवद्गीता 7.26
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन। भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन
हे अर्जुन! मैं बीते हुए, वर्तमान के और आने वाले सभी प्राणियों को जानता हूँ, किंतु मुझे कोई भी (माया से मोहित) नहीं जानता।
ईश्वर द्वारा अपनी अचिन्त्य प्रकृति के ज्ञान का उल्लेख।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक पुष्टि करता है कि ईश्वर का ज्ञान पूर्ण है, किंतु माया के प्रभाव में जीव उसे समझने में असमर्थ हैं, जो इस दावे को पुष्ट करता है कि सीमित मानवीय बुद्धि ईश्वर को पूरी तरह समझने में अपर्याप्त है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
दर्शन
प्रमाण-स्थल: ब्रह्मसूत्र 2.1.27
श्रुतेस् तु शब्दमूलत्वात्
किन्तु (ब्रह्म का सृष्टिकर्तृत्व) श्रुति से ही सिद्ध होता है, क्योंकि (ब्रह्म का यथार्थ स्वरूप) शब्द (शास्त्र-प्रमाण) पर ही आधारित है।
ब्रह्मसूत्र में 'सर्वापेता च' अधिकरण के अंतर्गत, जगत-सृष्टि की शक्ति पर चर्चा करते हुए बादरायण यह सूत्र कहते हैं।
इससे सिद्ध होता है: यह सूत्र स्पष्ट करता है कि ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और सृष्टि-रचना संबंधी रहस्य तर्क (Logic) की सीमा में नहीं आते, अपितु वे श्रुति-प्रमाण के आधार पर सिद्ध होते हैं।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह सूत्र 'सब कुछ करने की शक्ति' की परिभाषा पर नहीं, बल्कि तर्क की सीमाओं पर केंद्रित है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
— कथन और आधार
क्या समर्थित है, कहाँ मतभेद हैं
सर्वशक्ति का अर्थ तार्किक रूप से संभव कार्यों की पूर्ण क्षमता है।
तर्क यह मानता है कि असंभव कार्य (जैसे चौकोर वृत्त बनाना) शक्ति का अभाव नहीं, बल्कि शब्दों का निरर्थक संयोजन है।
यदि ईश्वर तर्क के नियमों से बंधा है, तो वह सर्वशक्तिमान नहीं हो सकता।
यह दावा करता है कि यदि कोई भी नियम ईश्वर की शक्ति को सीमित करता है, तो वह शक्ति 'पूर्ण' नहीं है।
मानवीय भाषा और तर्क ईश्वर की प्रकृति को समझने के लिए अपर्याप्त उपकरण हैं।
अतीत की अनेक दार्शनिक परंपराएं मानती हैं कि सर्वोच्च सत्य मानव बुद्धि की सीमा से परे है।
— आमने-सामने
आपत्तियाँ और उनका उत्तर
तार्किक सर्वशक्ति
प्रश्न यह है कि क्या सर्वशक्ति का अर्थ हर संभव कार्य करने की क्षमता है। तर्क यह है कि ईश्वर हर वह कार्य कर सकता है जो तार्किक रूप से सुसंगत है, क्योंकि जो तार्किक रूप से असंभव है, वह एक कार्य नहीं बल्कि केवल एक विरोधाभासी विचार है।
पूर्ण स्वतंत्रता
एक स्थिति यह है कि यदि ईश्वर को 'सर्वशक्तिमान' कहा जाता है, तो उसे तार्किक नियमों का भी उल्लंघन करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तर्क ईश्वर को सीमित करता है, तो वह तर्क ही ईश्वर के ऊपर हो जाता है।
विरोधाभासी चुनौती
आलोचक पूछते हैं: 'क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जिसे वह स्वयं न उठा सके?' यदि उत्तर 'हाँ' है, तो वह उठाने में असमर्थ है; यदि 'नहीं' है, तो वह पत्थर बनाने में असमर्थ है। दोनों ही स्थितियाँ सर्वशक्ति के दावे को चुनौती देती हैं।
तर्क की प्रकृति
उत्तर यह है कि यह प्रश्न स्वयं में तर्कहीन है। यह 'अतार्किक' को एक कार्य मानकर एक गलती करता है। जैसे 'रंगहीन लाल रंग' का अस्तित्व नहीं हो सकता, वैसे ही 'असंभव कार्य' का कोई अस्तित्व नहीं होता जिसे ईश्वर को पूरा करना चाहिए।
पुनः चुनौती
आलोचक कहते हैं कि यदि तर्क ईश्वर की सत्ता से पहले और स्वतंत्र है, तो फिर ईश्वर को 'निर्माता' कैसे कहा जा सकता है? यदि तर्क ईश्वर की बनाई हुई व्यवस्था है, तो वह उसे बदल भी सकता है।
निष्कर्ष
अंत में, यह बहस इस बात पर टिकती है कि क्या हम तर्क को एक सार्वभौमिक सत्य मानते हैं या केवल एक संरचना। यदि तार्किकता ईश्वर का स्वभाव है, तो विरोधाभास संभव नहीं हैं। यदि नहीं, तो सर्वशक्ति की परिभाषा मानव समझ से परे है।
यह प्रमाण क्या सिद्ध नहीं करता
यह अध्याय यह सिद्ध नहीं करता कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं, और न ही यह यह तय कर सकता है कि तर्क की सीमाएं सार्वभौमिक हैं या केवल मानव मस्तिष्क तक सीमित। यह इस बात का उत्तर नहीं देता कि क्या ईश्वर ने तर्क को बनाया है या ईश्वर स्वयं तर्क के अधीन है। चूँकि 'सर्वशक्ति' का कोई एक सर्वसम्मत दार्शनिक मानक नहीं है, इसलिए यह अध्याय किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता है कि कौन सा दृष्टिकोण पूर्णतः सही या गलत है।
शास्त्र से क्या सिद्ध होता है
शास्त्रों के अनुसार, परमात्मा 'वाङ्मय' हैं और समस्त तर्क-वितर्क उन्हीं की शक्ति से प्रकाशित होते हैं। तर्क स्वयं ईश्वर की सत्ता से भिन्न कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है, बल्कि ईश्वर के स्वरूप का एक अंश है। इसलिए, ईश्वर तार्किक नियमों के अधीन नहीं, बल्कि तार्किक नियम ईश्वर की मर्यादा के अधीन हैं। जैसे एक राजा अपनी ही बनाई सीमाओं के भीतर रहकर प्रजा का पालन करता है, वैसे ही ईश्वर अपनी अनंत शक्ति से धर्म की स्थापना हेतु तार्किक व्यवस्था का निर्वाह करते हैं। यह तार्किकता की संगति, शक्ति की न्यूनता नहीं, बल्कि परमात्मा का धर्म-मय स्वरूप है जो सृष्टि को व्यवस्थित रखता है।
— ग्रंथ-सूची
स्रोत और संस्करण
Shvetashvatara Upanishad · श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.8
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Kena Upanishad · केनोपनिषद् 1.3
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Bhagavadgita (Mahabharata, Bhishmaparva) · भगवद्गीता 7.25
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Bhagavadgita (Mahabharata, Bhishmaparva) · भगवद्गीता 7.26
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Brahmasutra · ब्रह्मसूत्र 2.1.27
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष