— प्रश्न का परीक्षण
क्या संसार अनादि है?
Is the universe beginningless?
निष्कर्षतः, सृष्टि की अनादिता सनातन शास्त्रों का मूल आधार है। भारतीय दर्शन के विभिन्न सम्प्रदाय सृष्टि के इस रहस्य को ईश्वर की लीला, प्रकृति का परिणाम, या कर्मों के फल के रूप में स्वीकार करते हैं, परन्तु सभी इस बात पर एकमत हैं कि यह संसार किसी आकस्मिक घटना का परिणाम नहीं, अपितु एक शाश्वत प्रक्रिया है। शास्त्रों के अनुसार, समय स्वयं एक चक्र है, जिसका न आदि है और न अन्त। अतः, यह विषय मानव बुद्धि की सीमित परिधि से ऊपर उठकर परम्परा और शास्त्र-वचनों द्वारा स्वतः ही एक अटल सत्य के रूप में प्रतिपादित होता है।
7 प्रमाण-स्थल · 3 कथन · 6 तर्क / आपत्तियाँ

मूल पाठ · संदर्भ · परीक्षण
— संक्षिप्त उत्तर
30-सेकंड उत्तर
संसार अनादि है या नहीं, यह प्रश्न सनातन दर्शन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भारतीय परम्परा के अनुसार, सृष्टि का प्रवाह अनादि और अनंत है, जहाँ प्रलय और उत्पत्ति का चक्र नित्य चलता रहता है। वेदान्त और सांख्य जैसे दर्शनों में सृष्टि को ब्रह्म का विवर्त या प्रकृति का परिणाम माना गया है, जो एक अनवरत प्रक्रिया है। जहाँ कुछ मत सृष्टिकर्ता ईश्वर की इच्छा को ही सृष्टि का मूल कारण बताते हैं, वहीं अन्य मत सृष्टि के स्वतः-स्फूर्त प्रवाह को अनादि स्वीकार करते हैं। शास्त्र-वचन इस संसार को 'अनादि-अनन्त' प्रवाह के रूप में वर्णित करते हैं, जो नित्य काल के गर्भ में समाहित है।
— प्रमाण-सीढ़ी
शास्त्र क्रम से क्या कहते हैं
श्रुति · वेद एवं उपनिषद्
प्रमाण-स्थल: ऋग्वेद 10.129.7
इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न ।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद
यह सृष्टि जहाँ से उत्पन्न हुई, चाहे उसने (परमात्मा ने) इसे धारण किया हो या न किया हो, जो इसका स्वामी परम आकाश में है, वही वास्तव में जानता है, अथवा वह भी नहीं जानता।
यह 'नासदीय सूक्त' का अंतिम भाग है, जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर दार्शनिक संशय व्यक्त करता है।
इससे सिद्ध होता है: यह मन्त्र सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्यों पर संशय व्यक्त करता है, जो 'संसार अनादि है या स्रष्टाकृत' इस प्रश्न की दार्शनिक गहराई को पुष्ट करता है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह सृष्टि के 'अनादि' होने का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं देता, केवल अज्ञात पर चर्चा करता है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: ऋग्वेद 10.190.1
ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः
ऋत (ब्रह्म-संकल्प या सृष्टि का नियम) और सत्य (सृष्टि का यथार्थ रूप) उस तप (ज्ञान-तप) से उत्पन्न हुए। उसके बाद रात्रि (प्रलय-काल) उत्पन्न हुई, उसके बाद समुद्र (सृष्टि-विस्तार) उत्पन्न हुआ।
यह मन्त्र सृष्टि के आरम्भिक क्रम और पूर्व कल्पों के स्मरण का वर्णन करता है।
इससे सिद्ध होता है: यह मंत्र सृष्टि के चक्रीय क्रम (पूर्व कल्पों की पुनरावृत्ति) की ओर संकेत करता है, जो ऋत (नियम) की निरंतरता को दर्शाता है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
स्मृति · गीता एवं धर्मशास्त्र
प्रमाण-स्थल: मनुस्मृति 1.5
आसीदिदं तमोभूतं अप्रज्ञातं अलक्षणम् । अप्रतर्क्यं अविज्ञेयं प्रसुप्तं इव सर्वतः
यह (संसार) सृष्टि से पूर्व तमोमय, अप्रज्ञात (जिसे जाना न जा सके), अलक्षण (चिह्नरहित), अतर्क्य (तर्क से परे) और अविज्ञेय था; मानो सब ओर से प्रसुप्त (गहरी नींद में सोया हुआ) हो।
मनुस्मृति के प्रारम्भिक श्लोकों में सृष्टि की उत्पत्ति की प्रक्रिया और कल्पों के चक्र का वर्णन है।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक सृष्टि से पूर्व की प्रलय-अवस्था का वर्णन करता है, जहाँ सम्पूर्ण जगत एक अविभक्त, अज्ञेय और निष्क्रिय अवस्था में विद्यमान था। यह उस अवस्था को सिद्ध करता है जिससे सृष्टि का प्राकट्य होता है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह प्रलय की स्थिति का वर्णन करता है, 'अनादिता' के वैज्ञानिक-भौतिक स्वरूप की व्याख्या नहीं करता।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: भगवद्गीता 8.19
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे
हे पार्थ! भूतों का यह समुदाय वही (अनेकों बार) उत्पन्न होकर, रात्रि के आगमन पर (प्रलय काल में) विवश होकर लीन हो जाता है और दिन के आगमन पर (सृष्टि काल में) पुनः उत्पन्न हो जाता है।
भगवान कृष्ण अर्जुन को काल के प्रवाह और सृजन-प्रलय के दैवीय चक्र के बारे में समझा रहे हैं।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक सृष्टि और प्रलय के आवर्ती (cyclical) होने का स्पष्ट वर्णन करता है, जो अनादि प्रवाह की मान्यता का प्रबल प्रमाण है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह दार्शनिक और आध्यात्मिक चक्र की व्याख्या है, इसे भौतिक ब्रह्मांडीय उत्पत्ति (बिग बैंग) का विकल्प नहीं माना जा सकता।
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दर्शन
प्रमाण-स्थल: ब्रह्मसूत्र 2.1.37
सर्वधर्मोपपत्तेश् च
और (ईश्वर में) सभी धर्मों (शक्तियों और गुणों) की उपपत्ति (संभावना) होने से।
वेदान्त दर्शन में जगत के निमित्त कारण के रूप में ब्रह्म और जीव के कर्मों के सम्बन्ध पर चर्चा करते समय यह सूत्र आता है।
इससे सिद्ध होता है: शांकरभाष्य के अनुसार, यह सूत्र ईश्वर में कर्म-सापेक्ष सृजन करने की क्षमता और विश्व के अनादि प्रवाह के निर्वाह हेतु आवश्यक सर्वज्ञता एवं सर्वशक्तिमत्ता का प्रतिपादन करता है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह केवल तार्किक आधार पर अनादिता को स्थापित करता है, आधुनिक विज्ञान के साक्ष्यों पर मौन है।
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प्रमाण-स्थल: योगसूत्र 4.10
तासाम् अनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात्
उन वासनाओं की अनादिता है, क्योंकि इच्छा (आशी) नित्य है।
चित्त की वृत्तियों और वासनाओं के स्वरूप का वर्णन।
इससे सिद्ध होता है: यह सूत्र स्पष्ट रूप से वासनाओं की अनादिता को स्वीकार करता है, जो संसार के प्रवाह के अनादि होने का शास्त्र-सम्मत प्रमाण है।
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प्रमाण-स्थल: ब्रह्मसूत्र 1.1.2
जन्माद्यस्य यतः
जिस (ब्रह्म) से इस जगत् का जन्म, स्थिति और प्रलय होता है, वही ब्रह्म है।
ब्रह्म के लक्षण और जगत के कारण-कार्य संबंध के प्रसंग में।
इससे सिद्ध होता है: यह सूत्र ब्रह्म को इस जगत के जन्म, स्थिति और प्रलय का कारण बताता है। इस प्रकार, यह सूत्र ब्रह्म को जगत के निमित्त और उपादान कारण के रूप में स्थापित करता है। यह शास्त्र-वचन सिद्ध करता है कि जगत की उत्पत्ति आकस्मिक नहीं है, अपितु इसका एक निश्चित कारण (ब्रह्म) है।
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— कथन और आधार
क्या समर्थित है, कहाँ मतभेद हैं
संसार एक अनादि प्रवाह है जिसमें उत्पत्ति और विनाश के चक्र निरंतर चलते रहते हैं।
यह तर्क सांख्य और अन्य दर्शनों पर आधारित है, जो मानते हैं कि द्रव्य कभी नष्ट नहीं होता, केवल अपना रूप बदलता है।
आधुनिक ब्रह्मांडीय साक्ष्य एक विशिष्ट प्रारंभिक अवस्था (बिग बैंग) की ओर संकेत करते हैं।
सृष्टि का चक्र सनातन है और वेद एवं पुराणों के अनुसार यह प्रक्रिया अनादि काल से निरंतर प्रवाहित है। भौतिक जगत की उत्पत्ति और लय काल के एक विशिष्ट आयाम में घटित होते हैं, जबकि सृष्टि का मूल तत्त्व काल-बोध से परे शाश्वत है। इस प्रकार, आध्यात्मिक दृष्टि से सृष्टि का प्रवाह अनादि और अनंत है।
अनादिता का विचार तर्कसंगत है, लेकिन इसका कोई अंतिम प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
सृष्टि की अनादिता सनातन धर्म का सुदृढ़ सिद्धांत है, जिसे वेदों और शास्त्रों में अनादि-अनंत रूप में स्वीकार किया गया है। तार्किक सीमाओं के परे, परम्परागत ज्ञान और शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है कि परमात्मा और उनकी शक्ति का अस्तित्व नित्य और अनादि है, जो काल की गणना से परे है।
— आमने-सामने
आपत्तियाँ और उनका उत्तर
प्रश्न
क्या संसार का कोई आदि बिंदु है, या यह अतीत में अनंत काल तक फैला हुआ है?
पक्ष
संसार अनादि है, क्योंकि यदि इसकी शुरुआत हुई, तो उसके पहले 'कुछ नहीं' होना चाहिए, जो तार्किक रूप से असंभव है।
आक्षेप
यदि संसार अनादि है, तो आज तक की यात्रा पूरी कैसे हुई? एक अनंत कालक्रम कभी समाप्त नहीं हो सकता।
उत्तर
यह तर्क समय को रेखीय मानता है, जबकि अनादिता का सिद्धांत इसे चक्रीय मानता है, जहाँ कोई 'समाप्ति' की आवश्यकता नहीं होती।
प्रत्याक्षेप
चक्रीय सिद्धांत भी यह नहीं बता पाता कि यह प्रक्रिया स्वयं में कैसे अस्तित्व में आई; कारण की खोज का चक्र वहीं नहीं रुकता।
निष्कर्ष
तर्क 'प्रथम कारण' और 'अनंत श्रृंखला' के बीच झूलता रहता है, जिससे यह विषय बौद्धिक रहस्य बना रहता है।
यह प्रमाण क्या सिद्ध नहीं करता
यह चर्चा यह सिद्ध नहीं करती कि ब्रह्मांड का कोई निश्चित भौतिक प्रारंभ नहीं हो सकता। वैज्ञानिक साक्ष्य, जैसे कि ब्रह्मांड के विस्तार की गति, किसी एक विशिष्ट बिंदु की ओर संकेत करते हैं, जिसे पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। साथ ही, यह भी सिद्ध नहीं होता कि ईश्वर या किसी चेतन शक्ति ने इस प्रक्रिया को आरंभ किया या नहीं। 'अनादि' की धारणा एक दार्शनिक उपधारणा है, न कि कोई प्रयोगसिद्ध सत्य, जिसे प्रयोगशाला में मापा जा सके। सत्य की वस्तुनिष्ठ व्याख्या अभी भी हमारी समझ से परे है।
शास्त्र से क्या सिद्ध होता है
शास्त्रों का तर्क है कि 'असत्' से 'सत्' की उत्पत्ति सम्भव नहीं है; जैसे गीता में कहा गया है कि 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः'। कार्य-कारण सिद्धान्त के अनुसार, कोई भी कार्य बिना कारण के उत्पन्न नहीं हो सकता। यदि कार्य का बीज कारण में पहले से विद्यमान है, तो सृष्टि को भी किसी आदि बिन्दु से आरम्भ नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह आदि बिन्दु भी किसी कारण की अपेक्षा करेगा। इस प्रकार, शास्त्र यह व्यवस्था देते हैं कि सृष्टि का प्रवाह अनादि है, जिसमें परिवर्तन तो होता है, किन्तु अस्तित्व का सर्वथा अभाव कभी नहीं होता। यह परम्परागत मान्यता है कि यह जगत्-चक्र सदा से चला आ रहा है और सदा चलता रहेगा।
— ग्रंथ-सूची
स्रोत और संस्करण
Rigveda (Shakala Samhita) · ऋग्वेद 10.129.7
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Rigveda (Shakala Samhita) · ऋग्वेद 10.190.1
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Manusmriti · मनुस्मृति 1.5
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Bhagavadgita (Mahabharata, Bhishmaparva) · भगवद्गीता 8.19
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Brahmasutra · ब्रह्मसूत्र 2.1.37
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Yogasutra · योगसूत्र 4.10
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Brahmasutra · ब्रह्मसूत्र 1.1.2
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष