तर्क–प्रमाण / सभी प्रश्न

— प्रश्न का परीक्षण

‘कुछ नहीं’ से सृष्टि

Creation from nothing

असिद्ध

निष्कर्षतः, सृष्टि का उद्भव भारतीय दर्शन के लिए एक नित्य और शाश्वत सत्य है। जहाँ शास्त्र सृजन के मूल आधार को ब्रह्म अथवा अव्यक्त तत्व के रूप में प्रतिपादित करते हैं, वहीं 'कुछ नहीं' से सृष्टि की अवधारणा उस पूर्ण ब्रह्म की अनंतता को ही व्यक्त करती है। यह विषय मनुष्य की जिज्ञासा को भौतिक जगत की सीमाओं से परे उस परम चेतना की ओर ले जाता है जो सृजन का अधिष्ठान है। सत्य यही है कि सृष्टि का कारण स्वयं सृष्टा ही है, जो अनादि काल से इस चक्र को संचालित कर रहा है, और यह आध्यात्मिक यात्रा ही पूर्ण सत्य का मार्ग है।

4 प्रमाण-स्थल · 3 कथन · 6 तर्क / आपत्तियाँ

— संक्षिप्त उत्तर

30-सेकंड उत्तर

सृष्टि के उद्भव के विषय में शास्त्रों में 'असत्' से 'सत्' के आविर्भाव का वर्णन मिलता है। उपनिषदों में वर्णित 'शून्य' का तात्पर्य अभाव नहीं, अपितु वह अव्यक्त स्थिति है जो सृजन से पूर्व विद्यमान थी। जहाँ एक ओर सृष्टि का विस्तार ब्रह्म से माना गया है, वहीं दूसरी ओर 'असद् वा इदमग्र आसीत्' जैसे वचनों में उस मूल तत्व की ओर संकेत है जो अस्तित्व का आधार है। भारतीय दर्शन में सृष्टि प्रक्रिया उस 'अनव्यक्त' से ही व्यक्त रूप में प्रकट होती है। यह विषय तार्किक विश्लेषण के परे, आध्यात्मिक अनुभूतियों और तात्विक चिंतन का गहन प्रतिपाद्य है, जहाँ सृष्टि एक अनादि और नित्य प्रक्रिया के रूप में स्थापित है।

— प्रमाण-सीढ़ी

शास्त्र क्रम से क्या कहते हैं

श्रुति · वेद एवं उपनिषद्

प्रमाण-स्थल: छान्दोग्य उपनिषद् 6.2.1

छान्दोग्य उपनिषद्यही श्लोक यहाँ पढ़ें

सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ।

sad eva somyedam agra āsīd ekam evādvitīyam

हे सौम्य! आदि में यह सत् ही था — एक ही, अद्वितीय।

उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद में यह वाक्य ‘असत् से सत् कैसे’ इस आपत्ति का उत्तर है।

इससे सिद्ध होता है: उपनिषद् स्पष्ट कहता है कि आदि में सत् था — अर्थात् ‘कुछ नहीं से सब कुछ’ इस परम्परा का पक्ष नहीं है।

इससे सिद्ध नहीं होता: यह आधुनिक भौतिकी के ‘quantum vacuum’ विवाद पर कोई निर्णय नहीं देता।

संस्करण-जाँच दर्ज

प्रमाण-स्थल: ऋग्वेद 10.129.1

ऋग्वेद संहितायही श्लोक यहाँ पढ़ें

नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् । किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्

सृष्टि के आरम्भ काल में न 'असत्' (अभाव) था और न 'सत्' (भाव) ही था; न (उस समय) अन्तरिक्ष था और न उसके परे आकाश ही था। (उस समय) किसने, कहाँ और किसकी रक्षा में (यह सब) ढका था? क्या वह गम्भीर और अथाह जल (अव्यक्त तत्त्व) था?

यह प्रसिद्ध 'नासदीय सूक्त' है, जो सृष्टि की उत्पत्ति और उसके पूर्व की अवस्था पर दार्शनिक विचार करता है।

इससे सिद्ध होता है: यह मन्त्र 'नासदीय सूक्त' का आरम्भ है। यह स्पष्ट करता है कि सृष्टि के आरम्भ में 'सत्' और 'असत्' दोनों के अस्तित्व का निषेध किया गया है, जो 'शून्य' या 'अनभिव्यक्त' अवस्था की ओर संकेत करता है।

इससे सिद्ध नहीं होता: यह 'कुछ नहीं' से सृष्टि की भौतिक प्रक्रिया को स्पष्ट नहीं करता, केवल उस अवस्था के अनिर्वचनीय होने का संकेत देता है।

पूर्ण संस्करण-जाँच शेष

The Hymns of the Rigveda (Shakala Samhita) · Ralph T. H. Griffith

पाठ-भेद: मूल पाठ मुद्रित/डिजिटल संस्करण से यथावत् लिया गया — शाकल संहिता का मानक क्रम। अनुवाद सम्पादकीय है।

मण्डल 10 में यही श्लोक — ऋग्वेद 10.129.1

अन्य स्रोत

प्रमाण-स्थल: साङ्ख्यकारिका 9

साङ्ख्यकारिकायही श्लोक यहाँ पढ़ें

असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम्

कार्य (सृष्टि) असत् से उत्पन्न नहीं हो सकता (असत्कारण), उपादान कारण के ग्रहण से, सर्वसम्भव के अभाव से, समर्थ के द्वारा ही कार्य करने से और कारण के भाव से; अतः कार्य (सृष्टि) कारण में पहले से ही विद्यमान है (सत्कार्यवाद)।

सांख्य दर्शन सृष्टि की उत्पत्ति के सिद्धांत (सत्कार्यवाद) की स्थापना कर रहा है।

इससे सिद्ध होता है: यह सांख्य दर्शन का मुख्य सिद्धांत 'सत्कार्यवाद' है। यह 'कुछ नहीं' से सृष्टि होने के मत का खंडन करता है और यह स्थापित करता है कि कार्य सदैव अपने कारण में सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहता है, अतः 'शून्य' से उत्पत्ति नहीं होती।

इससे सिद्ध नहीं होता: यह आधुनिक वैज्ञानिक अवधारणा कि 'शून्य' से कण उत्पन्न होते हैं, के विरुद्ध तर्क देता है।

पूर्ण संस्करण-जाँच शेष

प्रमाण-स्थल: साङ्ख्यकारिका 21

साङ्ख्यकारिकायही श्लोक यहाँ पढ़ें

पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः

पुरुष को (प्रकृति का) अनुभव कराने हेतु तथा (उसी पुरुष के) कैवल्य (मोक्ष) के लिए, प्रधान (प्रकृति) का (पुरुष के साथ) संयोग होता है। यह संयोग पंगु और अन्धे के समान है, और इसी से सृष्टि होती है।

सांख्य दर्शन में प्रकृति और पुरुष के मिलन से सृष्टि के आरंभ का विवेचन।

इससे सिद्ध होता है: सांख्यकारिका का यह सूत्र स्पष्ट करता है कि चेतना (पुरुष) का सान्निध्य ही अचेतन प्रकृति को सृष्टि हेतु सक्रिय करता है। यह उस दार्शनिक प्रश्न का समाधान करता है कि सृष्टि प्रक्रिया में चेतना और जड़ पदार्थ का संबंध क्या है; यह सिद्ध करता है कि बिना पुरुष के सान्निध्य के प्रकृति स्वतः सृजन में प्रवृत्त नहीं होती।

पूर्ण संस्करण-जाँच शेष

— कथन और आधार

क्या समर्थित है, कहाँ मतभेद हैं

परम्परा एवं शास्त्र-संकेत

आधुनिक भौतिकी यह मानती है कि निर्वात में भी ऊर्जा के उतार-चढ़ाव होते हैं जो कणों को जन्म दे सकते हैं।

सांख्य दर्शन के अनुसार यह दृश्यमान जगत अपनी सूक्ष्म और अप्रकट अवस्था से ही अभिव्यक्त होता है। प्रकृति के गुणों में निरंतर परिवर्तन सृष्टि का मूल स्वभाव है, जहाँ से चराचर जगत का उद्भव और लय होता रहता है। यह प्रक्रिया पूर्णतः शास्त्रसम्मत है और सृष्टि के निरंतर परिवर्तनशील स्वरूप को दर्शाती है।

मूल शास्त्र-प्रमाण

दार्शनिक रूप से यह बहस अभी भी जारी है कि क्या चेतना पदार्थ का उत्पाद है या सृष्टि का मूल कारण।

सनातन शास्त्रों के अनुसार, चेतना ही सृष्टि का आदि और शाश्वत मूल आधार है, जो जड़ पदार्थ से उत्पन्न नहीं होती। सम्पूर्ण दृश्य जगत इसी चैतन्य सत्ता का अभिव्यक्ति रूप है, जिसे वेदों और उपनिषदों में परब्रह्म के रूप में प्रतिपादित किया गया है।

शास्त्र-व्याख्या से प्रमाणित

प्राचीन ग्रंथों में 'असत्' का उल्लेख अक्सर 'अव्यक्त' अवस्था के लिए होता है, न कि पूर्ण अभाव के लिए।

विभिन्न दार्शनिक टीकाओं में 'शून्य' शब्द का प्रयोग सृष्टि से पूर्व की उस स्थिति के लिए हुआ है जो अभी तक नाम और रूप धारण नहीं कर पाई थी।

— आमने-सामने

आपत्तियाँ और उनका उत्तर

प्रश्न

क्या ब्रह्मांड का सृजन पूर्णतः 'कुछ नहीं' से हुआ था?

पक्ष

सृजन के लिए किसी पूर्ववर्ती पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ऊर्जा स्वयं पदार्थ में रूपांतरित हो सकती है।

आक्षेप

यदि कुछ भी नहीं था, तो ऊर्जा कहाँ से आई और वह किस नियम के तहत काम कर रही थी?

उत्तर

विज्ञान का तर्क है कि 'शून्य' स्वयं एक ऐसी अवस्था है जिसमें भौतिक नियम स्वतः निहित हैं।

प्रति-उत्तर

यह केवल एक नाम देना है; नियमों का बिना किसी आधार के होना स्वयं एक दार्शनिक समस्या है।

निष्कर्ष

सृजन का बिंदु अभी भी एक ऐसी पहेली है जहाँ भौतिक साक्ष्य और तात्विक चिंतन एक दूसरे को चुनौती देते हैं।

यह प्रमाण क्या सिद्ध नहीं करता

यह अध्याय यह सिद्ध नहीं करता कि ब्रह्मांड का एक निश्चित 'प्रथम क्षण' था या यह सृष्टि अनादि है। 'कुछ नहीं' से उत्पत्ति की वैज्ञानिक व्याख्या यह स्पष्ट नहीं कर पाती कि स्वयं भौतिक नियम और ऊर्जा का स्रोत क्या था। इसी प्रकार, दार्शनिक तर्क यह सिद्ध करने में असमर्थ हैं कि चेतना पहले आई या पदार्थ। यह विषय अभी भी एक रहस्य बना हुआ है क्योंकि हमारे पास उस 'शून्य' का प्रत्यक्ष अवलोकन करने का कोई साधन नहीं है जो समय और स्थान के उदय से पहले मौजूद था।

शास्त्र से क्या सिद्ध होता है

शास्त्रों में 'शून्य' और 'अस्तित्व' का समन्वय स्पष्ट है। 'नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्' के माध्यम से यह बोध होता है कि सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व की अवस्था साधारण बोध से परे है, जिसमें संभावनाएँ बीज रूप में निहित थीं। यह तर्क स्थापित है कि ब्रह्मांड का सृजन किसी रिक्तता से नहीं, बल्कि उस परम तत्व से हुआ है जो स्वयं पूर्ण है। अतः, 'शून्य' को पूर्णता का ही एक सूक्ष्म और अव्यक्त रूप माना गया है, जो सृष्टि के उदय के लिए पर्याप्त आधार प्रदान करता है।

— ग्रंथ-सूची

स्रोत और संस्करण

Chandogya Upanishad · छान्दोग्य उपनिषद् 6.2.1

संस्करण-जाँच दर्ज

Rigveda (Shakala Samhita) · ऋग्वेद 10.129.1

पूर्ण संस्करण-जाँच शेष

The Hymns of the Rigveda (Shakala Samhita) · Ralph T. H. Griffith

पाठ-भेद: मूल पाठ मुद्रित/डिजिटल संस्करण से यथावत् लिया गया — शाकल संहिता का मानक क्रम। अनुवाद सम्पादकीय है।

मण्डल 10 में यही श्लोक — ऋग्वेद 10.129.1

Samkhyakarika · साङ्ख्यकारिका 9

पूर्ण संस्करण-जाँच शेष

Samkhyakarika · साङ्ख्यकारिका 21

पूर्ण संस्करण-जाँच शेष