— प्रश्न का परीक्षण
प्रलय के बाद क्या होता है?
What follows dissolution?
निष्कर्षतः, प्रलय के पश्चात की अवस्था को एक पूर्ण अंत न मानकर, इसे निरंतरता की एक अपरिहार्य कड़ी के रूप में देखना ही शास्त्रानुकूल है। सनातन दर्शन में प्रलय केवल वह विश्राम-काल है, जो पुनः सृजन के लिए आधार तैयार करता है। यह विचार कि 'कुछ भी पूर्णतः नष्ट नहीं होता, अपितु सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहता है', सृष्टि के चक्र को समझने का मुख्य आधार है। प्रलय के बाद का अस्तित्व एक संभावना है, जो समय के अनंत विस्तार में एक नए प्रारंभ की प्रतीक्षा करता है।
8 प्रमाण-स्थल · 3 कथन · 6 तर्क / आपत्तियाँ

मूल पाठ · संदर्भ · परीक्षण
— संक्षिप्त उत्तर
30-सेकंड उत्तर
सनातन परम्परा में प्रलय का तात्पर्य अस्तित्व का पूर्ण विनाश नहीं, अपितु उसे पुनः सूक्ष्म अवस्था में लीन करना है। जब सृष्टि का चक्र अपने अंतिम चरण में पहुँचता है, तो समस्त तत्व अपने मूल कारण में विलीन हो जाते हैं। इसे बीजावस्था कहा गया है, जहाँ काल और दिक् का सामान्य बोध अव्यक्त हो जाता है। प्रलय के पश्चात, वही अव्यक्त बीज पुनः सृजन की प्रतीक्षा करता है। यह एक नित्य चलने वाली चक्रीय प्रक्रिया है। अतः, प्रलय के उपरान्त का काल शून्य नहीं, अपितु आगामी सृष्टि की संभावनाओं से परिपूर्ण एक शांत कालखंड है। इस दर्शन में अंत और आरंभ केवल परिप्रेक्ष्य का भेद हैं, न कि पूर्ण विराम।
— प्रमाण-सीढ़ी
शास्त्र क्रम से क्या कहते हैं
श्रुति · वेद एवं उपनिषद्
प्रमाण-स्थल: ऋग्वेद 10.190.1
ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः
तप की अग्नि से ऋत और सत्य उत्पन्न हुए, उसके बाद रात्रि उत्पन्न हुई और उसके बाद समुद्र (अर्णव) उत्पन्न हुआ।
यह सूक्त सृष्टि की उत्पत्ति के वैज्ञानिक और दार्शनिक क्रमिक विकास को वर्णित करता है, जो प्रलय के बाद के प्रथम स्पंदन को दर्शाता है।
इससे सिद्ध होता है: यह सृष्टि की उत्पत्ति का वैदिक वर्णन है, जो प्रलय के बाद की अवस्था (सृष्टि आरम्भ) को स्पष्ट करता है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह स्थल प्रलय की पूरी प्रक्रिया की विस्तृत भौतिक विवेचना नहीं करता, केवल प्रारंभिक घटनाक्रम को इंगित करता है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: ऋग्वेद 10.190.3
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चाऽन्तरिक्षमथो स्वः
विधाता ने सूर्य, चंद्रमा, स्वर्ग, पृथ्वी, अंतरिक्ष और प्रकाश को पहले के कल्पों की भांति ही (पुनः) रचा।
ऋग्वेद में सृष्टि के निर्माण और काल-चक्र की निरंतरता का वर्णन।
इससे सिद्ध होता है: वाक्यांश 'यथापूर्वमकल्पयत्' (जैसा पहले रचा था, वैसा ही रचा) स्पष्ट करता है कि सृष्टि की रचना कोई एकबारगी घटना नहीं है, बल्कि यह चक्र पूर्व कल्पों की निरंतरता में है, जो सृष्टि के अनादि होने का प्रमाण है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
स्मृति · गीता एवं धर्मशास्त्र
प्रमाण-स्थल: भगवद्गीता 8.18
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके
अव्यक्त से ही सब व्यक्त (जगत) ब्रह्मा के दिन के आगमन पर उत्पन्न होते हैं और रात्रि के आगमन पर उसी अव्यक्त नामक तत्व में विलीन हो जाते हैं।
श्रीकृष्ण अर्जुन को कालचक्र की व्याख्या देते हुए बताते हैं कि कैसे भौतिक अस्तित्व का सृजन और प्रलय निरंतर चलते रहते हैं।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक सृष्टि और प्रलय के चक्र को ब्रह्मा के दिन और रात के रूप में स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह केवल समय के चक्र का वर्णन करता है, ऊर्जा के सूक्ष्म वैज्ञानिक संरक्षण नियमों का तकनीकी विवरण नहीं देता।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: मनुस्मृति 1.5
आसीदिदं तमोभूतं अप्रज्ञातं अलक्षणम् । अप्रतर्क्यं अविज्ञेयं प्रसुप्तं इव सर्वतः
यह सब (सृष्टि पूर्व) अंधकारमय था, अप्राज्ञ (अज्ञात), अलक्षण (जिसका कोई चिन्ह न हो), तर्क से परे और अविज्ञेय था, मानो सब ओर से गहन निद्रा में हो।
मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में सृष्टि के आदिकाल और प्रलय की अवस्था का वर्णन करते हुए यह श्लोक आता है।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक 'प्रलय की अवस्था' का सटीक वर्णन करता है, जब सृष्टि सुषुप्ति के समान अंधकार में होती है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह स्थल केवल सृष्टि पूर्व की अवस्था का वर्णन है, प्रलय के तकनीकी तंत्र पर मौन है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: भगवद्गीता 2.16
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः
असत् (अविद्यमान) वस्तु की सत्ता नहीं होती और सत् (विद्यमान) वस्तु का अभाव नहीं होता। तत्वदर्शी पुरुषों ने इन दोनों का ही निष्कर्ष (अनंत काल तक) देखा है।
श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को आत्मा की नित्यता और जगत के परिवर्तनशील स्वरूप का उपदेश।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक 'सत्' (विद्यमान तत्व) की नित्यता को सिद्ध करता है, क्योंकि इसका कभी अभाव नहीं होता। इसके विपरीत, 'असत्' (अविद्यमान) की कोई सत्ता नहीं होती। तत्वदर्शियों ने इस भेद के यथार्थ स्वरूप को जाना है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: मनुस्मृति 1.30
यथा र्तुलिङ्गान्यृतवः स्वयं एव र्तुपर्यये । स्वानि स्वान्यभिपद्यन्ते तथा कर्माणि देहिनः
जिस प्रकार ऋतु परिवर्तन होने पर ऋतुएँ स्वयं ही अपने-अपने काल में उपस्थित हो जाती हैं, उसी प्रकार देहधारी जीव (प्रलय के बाद कर्मफल के अनुसार) अपने-अपने कर्मों को पुनः प्राप्त करते हैं।
मनुस्मृति में कल्प और युगों के चक्र का वर्णन।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक सृष्टि के चक्रीय स्वभाव को ऋतुओं के दृष्टांत से सिद्ध करता है। जैसे ऋतुएँ अंतहीन रूप से आती-जाती हैं, वैसे ही सृष्टि का विनाश और पुनर्निर्माण भी अनादि चक्र है।
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प्रमाण-स्थल: मनुस्मृति 1.8
सोऽभिध्याय शरीरात्स्वात्सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यं अवासृजत्
उस (परमात्मा) ने विविध प्रजाओं की सृष्टि करने की इच्छा से ध्यान करके, अपने शरीर से सर्वप्रथम जलों की ही रचना की और उनमें अपना वीर्य (सृजन-शक्ति) का आधान किया।
मनुस्मृति के आरम्भ में सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक सृष्टि के आरम्भ की प्रक्रिया का वर्णन करता है, जिसमें परमात्मा द्वारा जलों में 'वीर्य' (सृजन-शक्ति का बीज) स्थापित किया जाता है, जिससे विविध प्रजाओं की उत्पत्ति होती है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
दर्शन
प्रमाण-स्थल: वैशेषिकसूत्र 4.1.1
सदकारणवन्नित्यम्
जो कारणरहित (कार्य न होने वाला) है, वह नित्य है।
वैशेषिक दर्शन में द्रव्य और परमाणुओं के स्वरूप का विवेचन।
इससे सिद्ध होता है: वैशेषिक सूत्र का यह कथन नित्य द्रव्यों (जैसे परमाणु) की सत्ता की बात करता है, क्योंकि वे किसी अन्य वस्तु के कार्य नहीं हैं। इस सिद्धांत के अनुसार, प्रलय केवल 'संयोग' (कार्य) का विभाग है, 'कारण' (मूल द्रव्य) का विनाश नहीं।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
— कथन और आधार
क्या समर्थित है, कहाँ मतभेद हैं
प्रलय के बाद की अवस्था सृजन की क्षमता को अपने भीतर समाहित रखती है।
यह दावा सांख्य दर्शन के इस तर्क पर आधारित है कि कार्य (सृष्टि) अपने कारण (प्रकृति) में अव्यक्त रूप से विद्यमान रहता है।
प्रलय की अवधारणा और ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत के मध्य तुलनात्मक विचार।
सनातन शास्त्रों के अनुसार प्रलय का तात्पर्य अस्तित्व का विनाश न होकर, चर और अचर जगत का अपने मूल कारण में विलीन होकर अव्यक्त अवस्था में संक्रमण है। जिस प्रकार शास्त्र सम्मत सत्य है कि सत्ता कभी शून्य नहीं होती, उसी प्रकार प्रलय काल में भी मूल तत्व अपनी सूक्ष्म अवस्था में सदैव विद्यमान रहता है। अतः, सृष्टि का चक्र निरन्तर बना रहता है और तत्व की सत्ता का कभी लोप नहीं होता।
सृष्टि का चक्र अनंत है और इसका कोई आदि या अंत नहीं है।
यह एक दार्शनिक धारणा है जिसे प्रत्यक्ष प्रमाणों द्वारा न तो सिद्ध किया जा सकता है और न ही खंडित।
— आमने-सामने
आपत्तियाँ और उनका उत्तर
प्रश्न
यदि सब कुछ प्रलय में विलीन हो जाता है, तो उस शून्य अवस्था में क्या बचा रहता है, और पुनः सृष्टि का आरंभ कौन करता है?
सिद्धांत
प्रलय 'शून्य' नहीं, बल्कि 'अव्यक्त' अवस्था है। इसमें चेतना और पदार्थ अपने मूलतम बीज रूप में विद्यमान रहते हैं, जो कालक्रम के अनुसार पुनः जागृत होते हैं।
आक्षेप
यदि सब कुछ अव्यक्त है, तो वह पुनः सृजन की इच्छा या आवेग कहां से उत्पन्न होता है, जो भौतिक नियमों के बाहर प्रतीत होता है?
उत्तर
यह आवेग पूर्ववर्ती कर्मों के फलों के रूप में अव्यक्त अवस्था में संचित रहता है, जो सृजन के लिए अनिवार्य चालक बल का कार्य करता है।
प्रति-उत्तर
किंतु कर्मों का संचय भी एक व्यवस्था की मांग करता है, क्या वह व्यवस्था स्वयं काल से परे है या वह भी प्रलय में नष्ट हो जाती है?
निष्कर्ष
अतः यह स्पष्ट है कि प्रलय एक सीमा है, जहाँ तर्क और अनुभवातीत अवस्थाएं आपस में मिलती हैं, जिन्हें पूर्णतः समझना मानव बोध के परे हो सकता है।
यह प्रमाण क्या सिद्ध नहीं करता
यह अध्याय यह सिद्ध नहीं करता कि प्रलय का यह चक्रीय मॉडल भौतिक विज्ञान के 'एंट्रोपी' या 'बिग बैंग' जैसे सिद्धांतों के साथ पूर्णतः मेल खाता है। इसके अतिरिक्त, यह भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि यह चक्र वास्तव में अनंत है या इसका कोई अंतिम छोर है। दार्शनिक तर्क केवल एक तार्किक ढांचे की व्याख्या करते हैं; वे यह नहीं बता सकते कि अनुभवजन्य रूप से प्रलय का अनुभव कैसा होता है या क्या यह प्रक्रिया प्रत्येक इकाई के लिए अनिवार्य है। ये बिंदु अभी भी विश्वास और व्याख्या के दायरे में हैं।
शास्त्र से क्या सिद्ध होता है
सृष्टि के स्वरूप पर विचार करते हुए न्याय और सांख्य दर्शन स्पष्ट करते हैं कि कार्य अपने कारण के बिना उत्पन्न नहीं हो सकता। प्रलय के पश्चात की अवस्था वस्तुतः वह 'अवशिष्ट कारण' है, जो भविष्य के सृजन की आवश्यक सामग्री को सूक्ष्म रूप में समाहित रखती है। शास्त्र सम्मत दृष्टिकोण यह है कि परिवर्तन का एक अंतर्निहित नियम है, जहाँ कोई भी प्रक्रिया अचानक शून्य से उत्पन्न नहीं होती, बल्कि पूर्ववर्ती सूक्ष्म अवस्थाओं के रूपांतरण से ही पुनः प्रकट होती है। यह अवस्था सृजन की क्षमता को स्वयं में सुरक्षित रखती है।
— ग्रंथ-सूची
स्रोत और संस्करण
Rigveda (Shakala Samhita) · ऋग्वेद 10.190.1
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Rigveda (Shakala Samhita) · ऋग्वेद 10.190.3
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Bhagavadgita (Mahabharata, Bhishmaparva) · भगवद्गीता 8.18
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Manusmriti · मनुस्मृति 1.5
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Bhagavadgita (Mahabharata, Bhishmaparva) · भगवद्गीता 2.16
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Manusmriti · मनुस्मृति 1.30
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Manusmriti · मनुस्मृति 1.8
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Vaisheshikasutra · वैशेषिकसूत्र 4.1.1
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष