— प्रश्न का परीक्षण
समय और space कहाँ से आए?
Origins of time and space
निष्कर्षतः, काल और स्थान की उत्पत्ति का प्रश्न ईश्वर की अनंत लीला का एक भाग है। शास्त्र हमें यह समझाते हैं कि जिस प्रकार एक सूत्र पर मोती पिरोए होते हैं, उसी प्रकार यह चराचर जगत काल और दिक के तंतुओं में गूँथा हुआ है। हमारी खोज केवल भौतिक जगत के सीमित अवलोकनों तक नहीं, अपितु उस ब्रह्म तक है जो काल के प्रभाव से परे है। सृष्टि के इस रहस्यमय ताने-बाने को समझना ही आत्म-साक्षात्कार की यात्रा है। सत्य की खोज में शास्त्र ही वह प्रकाश स्तंभ हैं, जो हमें क्षणभंगुर संसार से परे उस नित्य-निरंतर सत्य की ओर ले जाते हैं, जहाँ काल और स्थान का कोई बंधन नहीं है।
5 प्रमाण-स्थल · 3 कथन · 6 तर्क / आपत्तियाँ

मूल पाठ · संदर्भ · परीक्षण
— संक्षिप्त उत्तर
30-सेकंड उत्तर
काल (समय) और दिक (स्थान) की उत्पत्ति का प्रश्न सृष्टि के रहस्य से अभिन्न है। सनातन परंपरा में सृष्टि को एक अनादि प्रवाह माना गया है, जहाँ 'काल' ईश्वर की विभूति है और 'दिक' प्रकृति का विस्तार। सांख्य दर्शन के अनुसार, समय और स्थान अव्यक्त प्रकृति के परिणाम हैं, जो चेतना के साथ मिलकर जगत का आभास रचते हैं। अनेक आर्ष ग्रंथों में इन्हें ईश्वर की इच्छाशक्ति अथवा लीला का स्वरूप बताया गया है। काल और स्थान वस्तुतः उसी एक ब्रह्म की अभिव्यक्ति हैं, जिसका कोई आदि या अंत नहीं है। हमारा बोध यद्यपि सीमित है, किंतु शास्त्र यह स्पष्ट करते हैं कि काल और स्थान स्वयं में सत्य न होकर परम सत्य की छायामात्र हैं।
— प्रमाण-सीढ़ी
शास्त्र क्रम से क्या कहते हैं
श्रुति · वेद एवं उपनिषद्
प्रमाण-स्थल: ऋग्वेद 10.129.6
को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः ।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाऽथा को वेद यत आबभूव
सृष्टि के उद्भव के विषय में कौन यथार्थ जानता है, और कौन इसे यहाँ कह सकता है? यह (सृष्टि) कहाँ से उत्पन्न हुई? देवता तो इस (सृष्टि) की रचना के बाद हुए हैं, अतः यह कौन जानता है कि यह (सृष्टि) कहाँ से उत्पन्न हुई?
यह नासदीय सूक्त का अंश है, जो ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति पर परम रहस्यमयी और दार्शनिक दृष्टिकोण से विचार करता है।
इससे सिद्ध होता है: यह ऋचा सृष्टिविज्ञान के मूल प्रश्न को उठाती है, जो कि अध्याय के विषय 'सृष्टि कहाँ से आई' के लिए एक उचित दार्शनिक आधार है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह किसी निश्चित भौतिक उत्पत्ति का सिद्धांत नहीं देता, अपितु अज्ञानता को स्वीकार करता है।
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प्रमाण-स्थल: श्वेताश्वतर उपनिषद् 1.2
कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्यम् ।
संयोग एषां न त्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः
क्या काल (समय), स्वभाव, नियति, संयोग, भूत (पंचभूत), या पुरुष (जीवात्मा) इस सृष्टि के कारण हैं? यह विचारणीय है। इनका संयोग भी आत्मा के कारण नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मा (जीव) स्वयं सुख-दुःख के वश में है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् का प्रथम अध्याय परमात्मा को जानने के लिए ब्रह्मांड के कारणों का विश्लेषण करता है।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक स्पष्ट रूप से 'काल' (Time) को सृष्टि के संभावित कारणों की सूची में रखता है, जो 'समय कहाँ से आया' विषय के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह एक दार्शनिक प्रश्न है, भौतिक साक्ष्य या गणना प्रदान नहीं करता।
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स्मृति · गीता एवं धर्मशास्त्र
प्रमाण-स्थल: मनुस्मृति 1.5
आसीदिदं तमोभूतं अप्रज्ञातं अलक्षणम् । अप्रतर्क्यं अविज्ञेयं प्रसुप्तं इव सर्वतः
यह (संसार) अंधकार से ढका हुआ, अप्रकट, अलक्षण (लक्षणहीन), तर्क से परे और अज्ञेय था; मानो सब ओर से गहरी निद्रा में लीन हो।
मनुस्मृति का प्रथम अध्याय सृष्टि की उत्पत्ति और काल गणना (युग-व्यवस्था) से आरम्भ होता है।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक सृष्टि के 'अव्याकृत' (unmanifest) अवस्था का वर्णन करता है, जो 'समय और स्थान' के प्रकटीकरण से पूर्व की स्थिति को दर्शाता है, अतः विषय के अनुकूल है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह आधुनिक वैज्ञानिक बिग बैंग सिद्धांत के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाता, यह पौराणिक काल-गणना की बात करता है।
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प्रमाण-स्थल: मनुस्मृति 1.80
मन्वन्तराण्यसंख्यानि सर्गः संहार एव च । क्रीडन्निवैतत्कुरुते परमेष्ठी पुनः पुनः
असंख्य मन्वन्तर, सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय, परमेश्वर (ब्रह्मा) मानो क्रीड़ा करते हुए बार-बार करते रहते हैं।
सृष्टि के काल-विभाजन और युग चक्र के वर्णन में।
इससे सिद्ध होता है: यहाँ 'पुनः पुनः' (बार-बार) शब्द और 'मन्वन्तरों' का उल्लेख स्पष्ट रूप से काल के चक्रीय स्वरूप और इसके अंतहीन प्रवाह का समर्थन करता है।
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दर्शन
प्रमाण-स्थल: योगसूत्र 4.15
वस्तुसाम्ये चित्तभेदात् तयोर् विभक्तः पन्थाः
वस्तु के एक समान होने पर भी, चित्तों के भिन्न होने के कारण, (वस्तु और उसकी प्रतीति का) मार्ग भिन्न होता है।
वस्तुओं के ज्ञान और चित्त की स्थिति पर विवेचन।
इससे सिद्ध होता है: यह सूत्र स्पष्ट करता है कि एक ही वस्तु को भिन्न-भिन्न चित्त (मन) अलग-अलग रूप में ग्रहण करते हैं। इसलिए वस्तु का स्वरूप ज्ञाता की चेतना-सापेक्ष होता है, निरपेक्ष नहीं।
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— कथन और आधार
क्या समर्थित है, कहाँ मतभेद हैं
आधुनिक भौतिकी के अनुसार, ब्रह्मांड एक प्रारंभिक बिंदु से विस्तारित हुआ है जिसे समय और स्थान का उद्गम माना जाता है।
भौतिक साक्ष्य समय की परिमितता का संकेत देते हैं। शास्त्र सृष्टि को 'सृजन और प्रलय' का चक्र मानते हैं, जिसमें काल अनादि माना गया है। भौतिकी का अवलोकन केवल इस कल्प के भौतिक विस्तार तक सीमित है। कोई विशिष्ट शास्त्रीय प्रमाण संलग्न नहीं है।
कई भारतीय दार्शनिक परंपराओं का मानना है कि समय चक्रीय है और इसका कोई आदि या अंत नहीं है।
यह विचार तर्क पर आधारित है कि यदि कारण-कार्य श्रृंखला शाश्वत है, तो समय का कोई पूर्ण प्रारंभ बिंदु नहीं हो सकता।
समय और स्थान को केवल चेतना का एक प्रक्षेपण माना जा सकता है।
सनातन शास्त्रों के अनुसार, काल और दिक् (समय और स्थान) को ब्रह्म की माया अथवा चैतन्य सत्ता का ही विस्तार माना गया है। चेतना ही परम सत्य है और जगत का संपूर्ण प्रपंच उसी के भीतर एक आभास मात्र है, जो पूर्णतः शास्त्र-सम्मत दृष्टिकोण है।
— आमने-सामने
आपत्तियाँ और उनका उत्तर
प्रश्न
क्या समय और स्थान ब्रह्मांड की भौतिक संरचना का हिस्सा हैं, या वे केवल हमारे अनुभव करने का तरीका हैं?
स्थिति
समय और स्थान को ब्रह्मांडीय विकास की वस्तुनिष्ठ वास्तविकता के रूप में देखना अधिक तर्कसंगत है, क्योंकि इनके बिना भौतिक घटनाओं की माप संभव नहीं है।
आपत्ति
यदि समय वस्तुनिष्ठ है, तो यह अलग-अलग पर्यवेक्षकों के लिए अलग-अलग गति से क्यों चलता है? यह संकेत देता है कि समय एक अनुभवजन्य निर्माण है।
उत्तर
पर्यवेक्षकों के लिए समय में भिन्नता स्वयं समय के एक लचीले भौतिक गुण को दर्शाती है, न कि उसे पूरी तरह से काल्पनिक बनाती है।
प्रतिवाद
लचीलापन स्वयं इस बात का प्रमाण है कि समय का कोई स्थिर आधार नहीं है; वह केवल संदर्भ के आधार पर बदलता रहता है।
निष्कर्ष
समय और स्थान एक ऐसी जटिल वास्तविकता हैं जो वस्तुनिष्ठ भौतिकी और व्यक्तिपरक बोध दोनों को समाहित करते हैं।
यह प्रमाण क्या सिद्ध नहीं करता
यह अध्याय यह सिद्ध नहीं करता कि समय का कोई पूर्ण प्रारंभ बिंदु था या समय स्वयं ही अनंत है। इसके अतिरिक्त, यह इस बात का कोई निर्णायक प्रमाण नहीं देता कि समय और स्थान केवल भौतिक यथार्थ हैं या चेतना की एक मानसिक संरचना। विज्ञान अभी तक यह नहीं बता पाया है कि 'शून्य' या 'पूर्व-ब्रह्मांडीय' अवस्था क्या थी, और दार्शनिक तर्क किसी एक सिद्धांत को वस्तुनिष्ठ रूप से अंतिम घोषित नहीं कर पाते। इन रहस्यों का समाधान अभी भी तर्क की पहुँच से बाहर है।
शास्त्र से क्या सिद्ध होता है
शास्त्रों के अनुसार, समय और स्थान का हमारा बोध हमारे अंतःकरण की वृत्तियों पर आधारित है। सृष्टि के विस्तार को 'माया' का प्रसार माना गया है, जो काल और दिक के ढाँचे में बंधा प्रतीत होता है। न्याय और वैशेषिक दर्शन काल को एक स्वतंत्र द्रव्य मानते हैं, जो समस्त क्रियाओं का आधार है, जबकि वेदान्त इसे चेतना के भीतर प्रतिभासित एक उपाधि मानता है। यह तर्कसंगत है कि सृजन की प्रक्रिया में काल ही वह प्रथम सूत्र है जिससे कार्य-कारण का संबंध स्थापित होता है। अतः, काल और स्थान को स्वतंत्र सत्ता न मानकर, उन्हें ईश्वर की संकल्प-शक्ति का एक उपकरण स्वीकार करना ही शास्त्रानुकूल दृष्टि है।
— ग्रंथ-सूची
स्रोत और संस्करण
Rigveda (Shakala Samhita) · ऋग्वेद 10.129.6
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Shvetashvatara Upanishad · श्वेताश्वतर उपनिषद् 1.2
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Manusmriti · मनुस्मृति 1.5
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Manusmriti · मनुस्मृति 1.80
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Yogasutra · योगसूत्र 4.15
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष