— प्रश्न का परीक्षण
ईश्वर ने सृष्टि क्यों बनाई?
Why create the universe?
निष्कर्षतः, सृष्टि का निर्माण ईश्वर की लीला का ही एक स्वरूप है जिसे शास्त्रों के माध्यम से समझा जा सकता है। यह सृष्टि उनके अस्तित्व का साक्षात प्रमाण है और उनकी अनंत महिमा का प्रतिध्वनित रूप है। यह प्रश्न कि ईश्वर ने सृष्टि क्यों बनाई, हमें अपनी बुद्धि को सीमित न रखकर उस परम तत्व की दिव्यता को अनुभव करने की प्रेरणा देता है। वास्तव में, यह जिज्ञासा हमें ईश्वर की लीला को समझने और अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य, मोक्ष को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर करती है।
3 प्रमाण-स्थल · 3 कथन · 6 तर्क / आपत्तियाँ

मूल पाठ · संदर्भ · परीक्षण
— संक्षिप्त उत्तर
30-सेकंड उत्तर
सृष्टि की उत्पत्ति के पीछे ईश्वर की मंशा को सनातन शास्त्रों में 'लीला' के रूप में वर्णित किया गया है। जिस प्रकार एक नर्तक या बालक बिना किसी बाहरी उद्देश्य के सहज भाव से क्रीड़ा करता है, उसी प्रकार सृष्टि की रचना ईश्वर के स्वभाव की सहज अभिव्यक्ति है। ईश्वर पूर्ण हैं, अतः सृजन उनकी पूर्णता का ही विस्तार है, जिसमें वे स्वयं अपनी रचना में रमण करते हैं। यह सृष्टि उनके अनंत ऐश्वर्य का प्रकाश मात्र है, जो उनकी अहेतुकी कृपा और इच्छाशक्ति का परिणाम है।
— प्रमाण-सीढ़ी
शास्त्र क्रम से क्या कहते हैं
श्रुति · वेद एवं उपनिषद्
प्रमाण-स्थल: ऋग्वेद 10.129.6
को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः ।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाऽथा को वेद यत आबभूव
कौन वास्तव में जानता है, कौन यहाँ उद्घोष करेगा कि यह सृष्टि कहाँ से उत्पन्न हुई? देवता भी तो बाद के हैं (सृष्टि के बाद पैदा हुए), तो फिर कौन जानता है कि यह (सृष्टि) कहाँ से आई?
यह 'नासदीय सूक्त' का अंश है, जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसके कर्ता के विषय में दार्शनिक जिज्ञासा और संशय प्रकट करता है।
इससे सिद्ध होता है: यह मन्त्र सृष्टि के उत्पत्ति-रहस्य के प्रति जिज्ञासा और विस्मय व्यक्त करता है। यह स्पष्ट करता है कि सृष्टि का कारण मानव बुद्धि या यहाँ तक कि देवताओं की पहुँच से भी परे है, जो ईश्वर के 'उद्देश्य' को जानने की मानवीय सीमा को इंगित करता है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह सृष्टि के उद्देश्य के बारे में कोई सकारात्मक या ईश्वरवादी उत्तर प्रदान नहीं करता, केवल संशय का निरूपण करता है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
स्मृति · गीता एवं धर्मशास्त्र
प्रमाण-स्थल: भगवद्गीता 9.8
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्
अपनी प्रकृति को वश में करके, मैं इस सम्पूर्ण भूत-समुदाय को प्रकृति के वश में होने के कारण बार-बार (प्रलय के बाद) पुनः रचता हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय में कृष्ण सृष्टि, स्थिति और प्रलय के चक्र में अपनी भूमिका और प्रकृति के स्वभाव का वर्णन कर रहे हैं।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक सिद्ध करता है कि सृष्टि का चक्र ईश्वर की प्रकृति का सहज कार्य है। ईश्वर स्वयं को कर्ता मानते हुए भी अपनी प्रकृति के माध्यम से इस रचना को निरंतर संचालित करते हैं।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह श्लोक सृष्टि के भौतिक विज्ञान (Big Bang आदि) पर मौन है और केवल दार्शनिक कारण पर केंद्रित है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
दर्शन
प्रमाण-स्थल: ब्रह्मसूत्र 2.1.33
लोकवत् तु लीलाकैवल्यम्
किन्तु (ब्रह्म की सृष्टि रचना) लोक (संसार) में दृष्ट उदाहरणों के समान केवल लीला (स्वभावजन्य खेल) मात्र है।
बादरायण रचित ब्रह्मसूत्र के इस अधिकरण में सृष्टि के प्रयोजन पर चर्चा की गई है, जहाँ यह सिद्ध किया गया है कि ईश्वर को कुछ पाने की आवश्यकता नहीं है।
इससे सिद्ध होता है: यह सूत्र स्पष्ट करता है कि ईश्वर द्वारा सृष्टि का निर्माण किसी स्वार्थ या बाहरी आवश्यकता के लिए नहीं है, अपितु यह उनका सहज स्वभाव (लीला) है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह केवल तार्किक आधार पर ईश्वर की निष्काम सृजन-प्रवृत्ति की व्याख्या करता है, यह सृष्टि के भौतिक वैज्ञानिक स्वरूप की पुष्टि नहीं करता।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
— कथन और आधार
क्या समर्थित है, कहाँ मतभेद हैं
सृष्टि ईश्वर की सहज अभिव्यक्ति है जिसमें किसी बाहरी उद्देश्य का अभाव है।
यह दावा तार्किक रूप से सुसंगत है क्योंकि यह ईश्वर की पूर्णता में कोई कमी नहीं छोड़ता। यदि ईश्वर को किसी उद्देश्य की आवश्यकता है, तो वह पूर्ण नहीं रह जाता।
अनेक परंपराएं सृष्टि को ईश्वर की 'लीला' (खेल) के रूप में देखती हैं।
सृष्टि को ईश्वर की 'लीला' के रूप में देखना भारतीय दर्शन की एक प्रतिष्ठित परंपरा है, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर का सृजन-कार्य किसी बाहरी आवश्यकता के लिए नहीं, अपितु उनके स्वभावजन्य आनंद और स्वेच्छा से होता है। जैसे बालक स्वभाववश क्रीड़ा करता है, उसी प्रकार परमात्मा की यह अभिव्यक्ति उनकी पूर्णता और अहेतुकी कृपा का ही विस्तार है।
ब्रह्मांड की उत्पत्ति के लिए किसी चैतन्य कर्ता की आवश्यकता वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है।
सनातन शास्त्र जगत की उत्पत्ति के निमित्त कारण के रूप में परमेश्वर को ही एकमात्र कर्ता स्वीकार करते हैं। वेदों और उपनिषदों में स्पष्ट कहा गया है कि यह चराचर विश्व उस परब्रह्म के संकल्प और सामर्थ्य से ही उत्पन्न, स्थित और लीन होता है। अतः जगत का संचालन किसी चैतन्य ईश्वर की इच्छाशक्ति पर ही आधारित है।
— आमने-सामने
आपत्तियाँ और उनका उत्तर
प्रश्न
यदि ईश्वर पूर्ण है, तो उसे सृष्टि बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या कोई पूर्ण सत्ता अधूरापन महसूस कर सकती है?
पक्ष
ईश्वर को आवश्यकता नहीं है; सृष्टि उसका स्वभाव है। जैसे सूर्य का प्रकाश फैलना उसका स्वभाव है, वैसे ही सृजन ईश्वर की सहज अभिव्यक्ति है।
आक्षेप
यदि सृजन स्वभाव है, तो क्या ईश्वर स्वतंत्र नहीं है? यदि वह विवश है कि उसे सृष्टि करनी ही पड़ती है, तो वह 'सर्वशक्तिमान' कैसे रहा?
उत्तर
सृजन को विवशता नहीं, बल्कि ईश्वर की अनंत क्षमता का विस्तार माना जाना चाहिए। कर्ता अपनी इच्छा से अपनी शक्ति का विस्तार करता है।
प्रति-उत्तर
इच्छा का अर्थ है किसी लक्ष्य की प्राप्ति। यदि लक्ष्य प्राप्ति के लिए सृजन हो रहा है, तो फिर से वही प्रश्न उठता है कि वह लक्ष्य क्या था और क्यों?
निष्कर्ष
मानवीय भाषा और तर्क सीमित हैं। ईश्वर का सृजन किसी 'क्यों' (कारण) पर आधारित नहीं, बल्कि स्वयं में ही एक स्वतंत्र सत्य हो सकता है।
यह प्रमाण क्या सिद्ध नहीं करता
तर्क यह सिद्ध नहीं कर पाता कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं, और न ही यह निश्चित रूप से बता पाता है कि सृष्टि का कोई उद्देश्य वास्तव में है भी या नहीं। यह स्पष्ट नहीं है कि क्या हम मानवीय 'कारण-प्रभाव' के सिद्धांतों को ब्रह्मांडीय उत्पत्ति पर लागू कर सकते हैं। अतः, यह विषय वैज्ञानिक या साक्ष्य-आधारित सत्य के दायरे से बाहर है और पूरी तरह से दार्शनिक अटकलों पर निर्भर है।
शास्त्र से क्या सिद्ध होता है
शास्त्रों का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर का सृजन कर्म किसी सांसारिक आवश्यकता या अभाव की पूर्ति हेतु नहीं है। वे स्वयं में परिपूर्ण हैं, अतः सृष्टि का निर्माण उनकी स्वाभाविक शक्ति और संकल्प का परिणाम है। ब्रह्मसूत्र में भी सृजन को ईश्वर की 'लीला' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि यह कार्य किसी फल की आकांक्षा से प्रेरित नहीं, बल्कि ईश्वर के स्वरूप से स्वतः प्रवाहित होने वाली एक क्रिया है, जैसे सूर्य से प्रकाश का निकलना सहज है।
— ग्रंथ-सूची
स्रोत और संस्करण
Rigveda (Shakala Samhita) · ऋग्वेद 10.129.6
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Bhagavadgita (Mahabharata, Bhishmaparva) · भगवद्गीता 9.8
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Brahmasutra · ब्रह्मसूत्र 2.1.33
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष