धार्मिक और उपासना-परम्पराएँ · पश्चिम एशिया में आरम्भ; आज विश्वव्यापी

मसीही परम्पराएँ

ईसा मसीह की शिक्षाओं से प्रेरित विश्वास, प्रेम, क्षमा और सेवा की विश्वव्यापी धार्मिक परम्परा।

0 ग्रंथ3 प्रमुख शाखाएँ
उद्भव
पहली शताब्दी ईस्वी में रोमन शासनाधीन यहूदिया और गलील के यहूदी धार्मिक परिवेश में।
संस्थापक/स्रोत
ईसा मसीह का जीवन और शिक्षाएँ; उनके आरम्भिक शिष्यों तथा प्रेरितों ने ईसाई समुदायों का विस्तार किया।
मुख्य ग्रंथ
बाइबिल, जिसके दो मुख्य भाग पुराना नियम और नया नियम हैं; कुछ पुस्तकों की मान्यता विभिन्न परम्पराओं में अलग है।
अनुयायी
लगभग 230 करोड़, वर्ष 2020 के वैश्विक जनसांख्यिकीय अनुमानों के अनुसार; स्रोत और गणना-पद्धति से आँकड़े बदल सकते हैं।
पवित्र स्थल
यरूशलेम, बेथलेहम और नासरत विशेष महत्त्व रखते हैं; विभिन्न ईसाई परम्पराओं के अन्य तीर्थस्थल भी हैं।

उद्भव और इतिहास

यह परम्परा कैसे बनी

ईसाई धर्म का उद्भव पहली शताब्दी ईस्वी में पश्चिम एशिया के यहूदी समाज में हुआ। ईसा मसीह ने गलील और यहूदिया में ईश्वर के राज्य, पश्चात्ताप, प्रेम और करुणा का संदेश दिया। रोमन राज्यपाल पोंतियुस पीलातुस के शासनकाल में उन्हें क्रूस पर मृत्यु दी गई। उनके अनुयायियों का विश्वास था कि वे मृतकों में से जी उठे। यही पुनरुत्थान-विश्वास आरम्भिक ईसाई समुदाय की पहचान और प्रचार का केंद्रीय आधार बना।

आरम्भिक शिष्यों और संत पौलुस जैसे प्रचारकों के माध्यम से ईसाई विश्वास रोमन साम्राज्य के अनेक नगरों तक पहुँचा। समुदाय प्रार्थना, साझा भोजन, शिक्षण और जरूरतमंदों की सहायता के लिए एकत्र होते थे। अलग-अलग समय और क्षेत्रों में उन्हें उत्पीड़न भी सहना पड़ा। चौथी शताब्दी में सम्राट कॉन्स्टैन्टिन के समय ईसाइयों को कानूनी सहिष्णुता मिली। इसी शताब्दी की धार्मिक परिषदों ने विश्वास की प्रमुख व्याख्याओं को व्यवस्थित रूप दिया।

समय के साथ ईसाई धर्म अनेक भाषाओं और संस्कृतियों में विकसित हुआ। पूर्वी और पश्चिमी चर्चों के बीच बढ़ते मतभेदों में 1054 का विभाजन एक प्रमुख पड़ाव माना जाता है। सोलहवीं शताब्दी के धर्मसुधार से विभिन्न प्रोटेस्टेंट परम्पराएँ उभरीं। आज कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स और प्रोटेस्टेंट इसकी प्रमुख धाराएँ हैं। अफ्रीका, एशिया और अमेरिका में भी विविध ईसाई समुदाय हैं, जिनकी उपासना, संगठन और कुछ धार्मिक व्याख्याओं में अंतर दिखाई देता है।

मूल सिद्धान्त

मुख्य मान्यताएँ

01

एक ईश्वर और त्रित्व

ईसाई धर्म एकेश्वरवादी है। अधिकांश प्रमुख ईसाई परम्पराएँ एक ईश्वर को पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के रूप में स्वीकार करती हैं; इसे त्रित्व कहा जाता है। इसका अर्थ तीन अलग-अलग ईश्वर नहीं है। कुछ ईसाई समूह इस सिद्धान्त को अलग ढंग से समझते या स्वीकार नहीं करते हैं।

02

ईसा मसीह का केंद्रीय स्थान

ईसाई विश्वास में ईसा मसीह केवल शिक्षक नहीं, बल्कि उद्धारकर्ता हैं। मुख्यधारा की परम्पराएँ उन्हें ईश्वर का पुत्र तथा पूर्णतः दिव्य और पूर्णतः मानवीय मानती हैं। उनके जीवन, क्रूस पर मृत्यु और पुनरुत्थान को ईश्वर के प्रेम तथा मानवता के उद्धार से जोड़ा जाता है।

03

अनुग्रह, विश्वास और उद्धार

ईसाई शिक्षाओं में मनुष्य को पाप से मुक्ति और ईश्वर के साथ संबंध की पुनर्स्थापना की आवश्यकता होती है। उद्धार को ईश्वर के अनुग्रह का उपहार माना जाता है। विश्वास, पश्चात्ताप, अच्छे कर्म और संस्कारों के परस्पर संबंध की व्याख्या कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स और प्रोटेस्टेंट परम्पराओं में अलग-अलग है।

04

प्रेम, क्षमा और मानवीय गरिमा

ईश्वर से प्रेम और अपने पड़ोसी से प्रेम ईसाई नैतिकता के केंद्रीय विषय हैं। पड़ोसी के प्रति जिम्मेदारी में गरीबों, बीमारों, अजनबियों और हाशिए पर रहने वाले लोगों की देखभाल शामिल है। क्षमा, मेल-मिलाप और दया को महत्त्व मिलता है। मनुष्य की गरिमा को ईश्वर से उसके संबंध के आधार पर समझा जाता है।

05

पुनरुत्थान और भविष्य की आशा

ईसाई विश्वास मृत्यु को अंतिम वास्तविकता नहीं मानता। मृतकों के पुनरुत्थान, ईश्वर के न्याय और अनन्त जीवन की आशा प्रमुख शिक्षाएँ हैं। मुख्यधारा की परम्पराएँ ईसा मसीह के पुनः आगमन में विश्वास रखती हैं। इन विषयों के विवरण और प्रतीकों की व्याख्या अलग-अलग समुदायों में भिन्न हो सकती है।

पवित्र ग्रंथ

धार्मिक ग्रंथ — सार में

1उत्पत्ति की पुस्तकבְּרֵאשִׁית / Bereshit · लंबे संकलन और संपादन की प्रक्रिया; अंतिम रूप प्रायः लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से जोड़ा जाता है, पर विद्वानों में मतभेद हैं।▾

उत्पत्ति बाइबिल के पुराने नियम की पहली पुस्तक और यहूदी तोराह का भी हिस्सा है। इसमें सृष्टि, मानव जीवन की शुरुआत, नैतिक विफलता, जलप्रलय तथा कुलपुरुषों और उनके परिवारों की कथाएँ आती हैं। ईसाई पाठ में यह ईश्वर, संसार और मनुष्य के संबंध को समझने की आधारभूमि बनती है। इसके प्रमुख विषय सृष्टि की अच्छाई, मानवीय जिम्मेदारी, पाप के परिणाम, ईश्वर की प्रतिज्ञा और वाचा हैं। पारिवारिक संघर्ष, प्रवास और मेल-मिलाप भी महत्त्वपूर्ण हैं। विभिन्न ईसाई परम्पराएँ इन कथाओं को ऐतिहासिक, साहित्यिक और धर्मवैचारिक दृष्टियों से पढ़ती हैं; सभी एक जैसी शाब्दिक व्याख्या नहीं अपनातीं।

2भजन संहिताתְּהִלִּים / Tehillim · विभिन्न रचनाएँ लगभग पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व की; संकलन और अंतिम संपादन कई चरणों में हुआ।▾

भजन संहिता पुराने नियम में प्रार्थनाओं, स्तुतियों और धार्मिक कविताओं का संग्रह है। यह यहूदी और ईसाई, दोनों परम्पराओं में महत्त्वपूर्ण है। इसमें आनंद और कृतज्ञता के साथ दुःख, भय, अपराधबोध, अन्याय और आशा की अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं। अनेक भजन परम्परा से राजा दाऊद से जुड़े हैं, लेकिन संग्रह कई रचनाकारों और कालों से संबंधित है। ईसाई उपासना में इनका पाठ, गायन और निजी मनन किया जाता है। इसके मुख्य विषय ईश्वर की करुणा, न्याय, सृष्टि की प्रशंसा और संकट में भरोसा हैं। यह विश्वासपूर्ण जीवन में कठिन प्रश्नों और भावनात्मक ईमानदारी के लिए भी स्थान बनाती है।

3लूका के अनुसार सुसमाचारΚατὰ Λουκᾶν / Gospel According to Luke · लगभग 80–90 ईस्वी; सटीक रचना-काल निश्चित नहीं है।▾

यह नए नियम के चार सुसमाचारों में से एक है और ईसा मसीह के जन्म, सेवाकार्य, शिक्षाओं, मृत्यु तथा पुनरुत्थान का वर्णन करता है। परम्परा इसे संत लूका से जोड़ती है, हालांकि लेखक की पहचान ऐतिहासिक रूप से निश्चित नहीं है। इसमें गरीबों, स्त्रियों, बीमारों और समाज से उपेक्षित लोगों के प्रति करुणा पर विशेष ध्यान मिलता है। प्रार्थना, पवित्र आत्मा, पश्चात्ताप और क्षमा इसके प्रमुख विषय हैं। इसकी दृष्टान्त-कथाएँ दया और पड़ोसी के प्रति जिम्मेदारी को समझाती हैं। पुस्तक ईसाई संदेश को केवल एक समुदाय तक सीमित न रखकर व्यापक मानवता से संबंधित रूप में प्रस्तुत करती है।

4प्रेरितों के कामΠράξεις Ἀποστόλων / Acts of the Apostles · अक्सर लगभग 80–90 ईस्वी माना जाता है; विद्वानों के प्रस्तावित काल में अंतर है।▾

प्रेरितों के काम नए नियम की पुस्तक है, जो लूका के सुसमाचार की कथा को आगे बढ़ाती है। इसमें यरूशलेम के आरम्भिक ईसाई समुदाय, पवित्र आत्मा के आगमन के उत्सव, प्रचार यात्राओं और गैर-यहूदी लोगों के बीच विश्वास के प्रसार का वर्णन है। संत पतरस और संत पौलुस इसके प्रमुख पात्र हैं। साझा जीवन, जरूरतमंदों की सहायता, प्रार्थना, साहस और समुदाय के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया इसके मुख्य विषय हैं। यह नए समुदायों में उठे धार्मिक और सांस्कृतिक प्रश्नों को भी दिखाती है। आरम्भिक ईसाई इतिहास के अध्ययन में इसे अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के साथ पढ़ा जाता है।

5रोमियों के नाम पत्रΠρὸς Ῥωμαίους / Epistle to the Romans · लगभग 56–58 ईस्वी।▾

यह नए नियम में संत पौलुस का रोम के ईसाई समुदाय को लिखा पत्र है। इसमें पाप, विश्वास, ईश्वर के अनुग्रह और धार्मिक जीवन के संबंध पर विस्तृत विचार मिलता है। पत्र यहूदी और गैर-यहूदी विश्वासियों की स्थिति, ईश्वर की प्रतिज्ञाओं और समुदाय की एकता पर चर्चा करता है। इसके बाद दैनिक आचरण, विनम्रता, सेवा, परस्पर सम्मान और मतभेदों के बीच साथ रहने की शिक्षा आती है। ईसाई धर्मविचार के इतिहास में इसका गहरा प्रभाव रहा है, विशेषकर उद्धार और विश्वास की व्याख्याओं पर। अलग-अलग ईसाई परम्पराएँ इसके तर्कों के कुछ पहलुओं को भिन्न महत्त्व देती हैं।

आचार

उपासना और साधना

प्रार्थना और सामूहिक उपासना

ईसाई व्यक्तिगत और सामूहिक प्रार्थना करते हैं। चर्च की सभाओं में बाइबिल-पाठ, उपदेश, भजन और प्रार्थनाएँ सामान्य हैं। अधिकांश समुदाय रविवार को मुख्य उपासना करते हैं, जबकि कुछ शनिवार को महत्त्व देते हैं। भाषा, संगीत और उपासना-पद्धति परम्परा के अनुसार बदलती है।

बपतिस्मा

बपतिस्मा जल से जुड़ा प्रमुख ईसाई धार्मिक अनुष्ठान है, जिसे ईसाई जीवन और समुदाय में प्रवेश से जोड़ा जाता है। कुछ चर्च शिशुओं को बपतिस्मा देते हैं, जबकि अन्य व्यक्तिगत विश्वास व्यक्त करने वालों को। जल छिड़कने, उँडेलने या उसमें डुबकी देने की विधियाँ प्रचलित हैं।

प्रभुभोज या यूखरिस्त

इस अनुष्ठान में रोटी और दाखरस का उपयोग ईसा मसीह के अंतिम भोज, मृत्यु और पुनरुत्थान से जोड़कर किया जाता है। कुछ समुदाय दाखरस की जगह अंगूर का रस लेते हैं। इसमें मसीह की उपस्थिति का अर्थ और इसे मनाने की आवृत्ति विभिन्न परम्पराओं में अलग है।

सेवा, दान और आत्मसंयम

जरूरतमंदों की सहायता, बीमारों की देखभाल और दान ईसाई जीवन के महत्त्वपूर्ण अभ्यास हैं। अनेक समुदाय उपवास, आत्मपरीक्षण और पश्चात्ताप भी अपनाते हैं। इनका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत अनुशासन नहीं, बल्कि दूसरों की पीड़ा के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदार जीवन को बढ़ाना भी है।

पर्व और प्रतीक

त्योहार, प्रतीक और मूल सीख

क्रिसमस

ईसा मसीह के जन्म का उत्सव। अनेक चर्च इसे 25 दिसंबर को मनाते हैं; कैलेंडर और परम्परा के कारण कुछ की तिथि अलग होती है। वास्तविक जन्मतिथि ज्ञात नहीं है।

गुड फ्राइडे

ईसा मसीह के क्रूस पर दुःख और मृत्यु का गंभीर स्मरण-दिवस। अनेक समुदाय विशेष प्रार्थना, उपवास और मनन करते हैं। यह ईस्टर से पहले के शुक्रवार को आता है।

ईस्टर

ईसा मसीह के पुनरुत्थान में विश्वास का प्रमुख उत्सव। इसकी तिथि हर वर्ष बदलती है और पूर्वी तथा पश्चिमी चर्चों की गणना के कारण अलग हो सकती है।

पेंटेकोस्ट

ईस्टर के पचासवें दिन मनाया जाने वाला पर्व। यह आरम्भिक शिष्यों पर पवित्र आत्मा के आगमन की स्मृति और चर्च के प्रचार-कार्य से जुड़ा है।

  • ◆ क्रूस — ईसा मसीह की मृत्यु, आत्मत्याग और ईसाई उद्धार-विश्वास का प्रमुख प्रतीक।
  • ◆ मछली या इख्थुस — आरम्भिक ईसाई पहचान का चिह्न; इसका यूनानी नाम ईसा मसीह के बारे में एक विश्वास-सूत्र के शुरुआती अक्षरों से जुड़ता है।
  • ◆ कबूतर — ईसाई कला में पवित्र आत्मा का प्रचलित प्रतीक।
  • ◆ अल्फा और ओमेगा — यूनानी वर्णमाला के पहले और अंतिम अक्षर; ईश्वर तथा मसीह के आदि और अंत होने का संकेत।
  • ◆ जल — बपतिस्मा में शुद्धि, नए जीवन और ईसाई समुदाय में प्रवेश से जुड़ा प्रतीक।
ईसाई परम्परा की केंद्रीय सीख ईश्वर और पड़ोसी से प्रेम करना है। यह प्रेम करुणा, क्षमा, सेवा, ईमानदारी और कमजोर लोगों की देखभाल में प्रकट होना चाहिए। ईसा मसीह के जीवन से प्रेरणा लेकर विश्वासी अनुग्रह पर भरोसा, अपनी गलतियों का स्वीकार और दूसरों के साथ मेल-मिलाप का प्रयास करते हैं।

परम्परा की विविधता

प्रमुख शाखाएँ और सम्प्रदाय

हर शाखा के अपने ग्रंथ, शब्दावली, आचार्य और साधना-पद्धति हो सकती है।

कैथोलिक

रोम के बिशप अर्थात् पोप के साथ पूर्ण सहभागिता रखने वाली विश्वव्यापी ईसाई कलीसिया, जिसकी संस्कार और शिक्षण-अधिकार की विशिष्ट परम्परा है।

पूर्वी ऑर्थोडॉक्स

स्वशासी कलीसियाओं का ईसाई समुदाय, जो प्राचीन धर्मसभाओं, धर्मविधि और पूर्वी कलीसियाई परम्परा को केंद्रीय मानता है।

प्रोटेस्टेंट परम्पराएँ

सोलहवीं शताब्दी के सुधार आंदोलनों से संबंधित और बाद में विकसित अनेक ईसाई समुदाय; इनके शासन, संस्कार और धर्मशास्त्र में व्यापक विविधता है।

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