ईसाई धर्म का उद्भव पहली शताब्दी ईस्वी में पश्चिम एशिया के यहूदी समाज में हुआ। ईसा मसीह ने गलील और यहूदिया में ईश्वर के राज्य, पश्चात्ताप, प्रेम और करुणा का संदेश दिया। रोमन राज्यपाल पोंतियुस पीलातुस के शासनकाल में उन्हें क्रूस पर मृत्यु दी गई। उनके अनुयायियों का विश्वास था कि वे मृतकों में से जी उठे। यही पुनरुत्थान-विश्वास आरम्भिक ईसाई समुदाय की पहचान और प्रचार का केंद्रीय आधार बना।
आरम्भिक शिष्यों और संत पौलुस जैसे प्रचारकों के माध्यम से ईसाई विश्वास रोमन साम्राज्य के अनेक नगरों तक पहुँचा। समुदाय प्रार्थना, साझा भोजन, शिक्षण और जरूरतमंदों की सहायता के लिए एकत्र होते थे। अलग-अलग समय और क्षेत्रों में उन्हें उत्पीड़न भी सहना पड़ा। चौथी शताब्दी में सम्राट कॉन्स्टैन्टिन के समय ईसाइयों को कानूनी सहिष्णुता मिली। इसी शताब्दी की धार्मिक परिषदों ने विश्वास की प्रमुख व्याख्याओं को व्यवस्थित रूप दिया।
समय के साथ ईसाई धर्म अनेक भाषाओं और संस्कृतियों में विकसित हुआ। पूर्वी और पश्चिमी चर्चों के बीच बढ़ते मतभेदों में 1054 का विभाजन एक प्रमुख पड़ाव माना जाता है। सोलहवीं शताब्दी के धर्मसुधार से विभिन्न प्रोटेस्टेंट परम्पराएँ उभरीं। आज कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स और प्रोटेस्टेंट इसकी प्रमुख धाराएँ हैं। अफ्रीका, एशिया और अमेरिका में भी विविध ईसाई समुदाय हैं, जिनकी उपासना, संगठन और कुछ धार्मिक व्याख्याओं में अंतर दिखाई देता है।