सिख धर्म का उद्भव लगभग पंद्रहवीं शताब्दी के अंत में पंजाब में हुआ। इसके संस्थापक श्री गुरु नानक देव जी का जन्म 1469 में तलवंडी में हुआ था, जो आज पाकिस्तान में श्री ननकाना साहिब कहलाता है। उस समय पंजाब अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं का संगम था। गुरु जी ने एक ईश्वर, मानव समानता, ईमानदार श्रम और दूसरों के साथ बाँटकर जीने पर बल दिया।
श्री गुरु नानक देव जी के बाद नौ मानव गुरुओं ने सिख समुदाय को धार्मिक और सामाजिक रूप से विकसित किया। गुरमुखी लिपि के प्रसार, संगत, लंगर और नगरों की स्थापना ने समुदाय को मजबूत बनाया। श्री गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन कराया। श्री गुरु अर्जन देव जी और श्री गुरु तेग बहादुर जी की शहादतें सिख इतिहास में आस्था और अन्याय के प्रतिरोध की महत्वपूर्ण स्मृतियाँ हैं।
1699 में श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा की स्थापना की, जिसने अनुशासन, समानता और साहस को विशिष्ट सामुदायिक रूप दिया। 1708 में मानव गुरुओं की परम्परा समाप्त हुई और श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को शाश्वत गुरु का स्थान मिला। बाद की सदियों में सिख समुदाय पंजाब से विश्व के अनेक देशों तक पहुँचा। आज गुरुद्वारे उपासना के साथ सेवा, शिक्षा और सामुदायिक सहयोग के केंद्र भी हैं।