ताओवाद, जिसे दाओवाद भी कहा जाता है, प्राचीन चीन की विचार और साधना परम्पराओं से विकसित हुआ। इसके आरम्भिक ग्रंथ उस समय सामने आए जब अनेक चीनी विचारक अच्छे जीवन, शासन और मनुष्य के प्रकृति से सम्बन्ध पर विचार कर रहे थे। आदरणीय लाओज़ी से सम्बद्ध ताओ ते चिंग और आदरणीय झुआंगज़ी से जुड़ी रचनाओं ने सहजता, सीमित इच्छाओं और कठोर धारणाओं से मुक्ति को महत्त्व दिया।
ताओवाद का इतिहास केवल दर्शन का इतिहास नहीं है। दूसरी शताब्दी ईस्वी में आदरणीय झांग दाओलिंग से जुड़ी स्वर्गीय आचार्यों की परम्परा एक संगठित धार्मिक समुदाय के रूप में उभरी। इसमें नैतिक अनुशासन, सामुदायिक व्यवस्था और धार्मिक अनुष्ठान महत्त्वपूर्ण थे। बाद की सदियों में शांगछिंग और लिंगबाओ जैसी धाराएँ विकसित हुईं। उनके ग्रंथों और साधनाओं ने ध्यान, देवताओं, पवित्र लोकों और सामूहिक कल्याण को अलग-अलग ढंग से समझाया।
समय के साथ ताओवाद ने बौद्ध धर्म, कन्फ्यूशी परम्परा और चीनी लोकधर्म के साथ संवाद करते हुए विविध रूप अपनाए। बारहवीं शताब्दी में विकसित छ्वानझेन परम्परा ने मठवासी अनुशासन और आन्तरिक साधना पर बल दिया। झेंगयी परम्परा में पुरोहितों और सामुदायिक अनुष्ठानों की प्रमुख भूमिका बनी रही। आज मंदिरों, पर्वों, ध्यान और सांस्कृतिक परम्पराओं में ताओवाद जीवित है, हालांकि उसका व्यवहार स्थान और समुदाय के अनुसार बदलता है।