— प्रश्न का परीक्षण
ईश्वर को किसने बनाया?
Who created God?
निष्कर्षतः, 'ईश्वर को किसने बनाया' का प्रश्न ईश्वर की वास्तविक प्रकृति को न समझने के कारण उत्पन्न होता है। शास्त्र ईश्वर को 'अजन्मा' और 'शाश्वत' मानते हैं, जिन्हें किसी निर्माता की अपेक्षा नहीं है। यह प्रश्न ईश्वर को संसार की सामान्य वस्तुओं के समान एक 'कार्य' मान लेने की भूल पर आधारित है। अतः ईश्वर की सत्ता का स्वरूप स्वयं-प्रकाश है, जो तर्क की सीमा से परे उनका अपना दिव्य वैशिष्ट्य है।
7 प्रमाण-स्थल · 3 कथन · 6 तर्क / आपत्तियाँ

मूल पाठ · संदर्भ · परीक्षण
— संक्षिप्त उत्तर
30-सेकंड उत्तर
सृष्टि के विषय में यह जिज्ञासा 'कार्य-कारण' सिद्धांत पर आधारित है। शास्त्रानुसार, ईश्वर 'अनादि' और 'स्वयंभू' हैं, अर्थात उनका कोई आदि या कारण नहीं है। वे स्वयं ही समस्त जगत का मूल कारण हैं। अतः ईश्वर को किसी 'कार्य' के समान सृजित वस्तु मानना भ्रम है। वे काल, देश और निमित्त से परे हैं, इसलिए उन पर कार्य-कारण का नियम लागू नहीं होता। जो सत्ता स्वयं ही अस्तित्व का आधार है, उसे किसी अन्य निर्माता की आवश्यकता नहीं हो सकती।
— प्रमाण-सीढ़ी
शास्त्र क्रम से क्या कहते हैं
श्रुति · वेद एवं उपनिषद्
प्रमाण-स्थल: श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.9
न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् ।
स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः
उस (परमेश्वर) का संसार में न कोई स्वामी है, न कोई नियन्ता है, और न ही उसका कोई चिह्न (लिङ्ग/शरीर) है। वह समस्त कारणों का कारण है और इन्द्रियों के स्वामियों (जीवों) का भी अधिपति है। उसका न तो कोई उत्पन्न करने वाला (जनक) है और न ही कोई स्वामी है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् में परमात्मा की अद्वैत सत्ता और सर्वाधिपति होने का वर्णन किया जा रहा है।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक स्पष्ट करता है कि ईश्वर 'स्वयंभू' है, उसका कोई कारण या निर्माता नहीं है, अतः 'ईश्वर को किसने बनाया' का प्रश्न ही यहाँ निरर्थक सिद्ध होता है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह यह स्पष्ट नहीं करता कि 'अकारण' होना तार्किक विशेषाधिकार है या एक आवश्यक दार्शनिक सत्य।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: ऋग्वेद 10.129.6
को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः ।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाऽथा को वेद यत आबभूव
सत्य-सत्य कौन जानता है? और कौन यहाँ उद्घोषणा करेगा कि यह सृष्टि कहाँ से उत्पन्न हुई और यह विस्तार कैसे हुआ? देवता तो इस सृष्टि की रचना के बाद हुए हैं, अतः कौन जानता है कि यह (सृष्टि) कहाँ से उत्पन्न हुई है?
नासदीय सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्यों और मानवीय सीमित ज्ञान पर चिंतन किया गया है।
इससे सिद्ध होता है: यह मन्त्र सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्य के प्रति विस्मय व्यक्त करता है। यह परोक्ष रूप से संकेत देता है कि आदि-सृजन का ज्ञान सीमित मानवीय बुद्धि से परे है, और यह ईश्वर के अनादि होने की दार्शनिक पृष्ठभूमि तैयार करता है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह ईश्वर को 'अकारण' सिद्ध करने के बजाय सृष्टि के ज्ञान की अज्ञेयता पर जोर देता है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: केनोपनिषद् 2.3
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्
जिसके मत में वह (ब्रह्म) अचिन्त्य है, उसी ने उसे जाना है; जो उसे चिन्त्य (मन का विषय) समझता है, वह नहीं जानता। यह (ब्रह्म) उसे वस्तु-रूप में जानने वालों के लिए अज्ञात है, और जो उसे वस्तु-रूप में नहीं जानते, उनके लिए ज्ञात है।
ब्रह्म के ज्ञान की सीमा पर चर्चा करते समय।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक ईश्वर को मन-बुद्धि की विषय-वस्तु (object) मानने को 'श्रेणी दोष' (category error) मानता है। क्योंकि जिसे जाना जा सकता है वह 'दृश्य' है, और ब्रह्म 'दृष्टा' है। ब्रह्म को जानने का अर्थ है उसे वस्तु की भाँति न जानना।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: कठोपनिषद् 1.2.18
न जायते म्रियते वा विपश्चिन्
नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे
यह बुद्धिमान आत्मा न तो कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है। यह कहीं से उत्पन्न नहीं हुई और न ही इससे कोई अन्य उत्पन्न हुआ है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मरती।
नचिकेता को यमराज द्वारा आत्मतत्व का उपदेश।
इससे सिद्ध होता है: यहाँ 'नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्' का अर्थ है कि आत्मा का कोई कारण नहीं है। यह उसे भौतिक कार्य-कारण की श्रेणी से बाहर रखता है, जो इस प्रश्न को श्रेणी दोष के रूप में सिद्ध करने के लिए प्रमाण है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
स्मृति · गीता एवं धर्मशास्त्र
प्रमाण-स्थल: भगवद्गीता 10.3
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्। असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते
जो मुझे अजन्मा, अनादि और समस्त लोकों का महान ईश्वर जानता है, वह मनुष्यों में मोह से मुक्त होकर सब पापों से छूट जाता है।
विभूतियोग में श्रीकृष्ण अपनी अनादि सत्ता और ईश्वरत्व का परिचय दे रहे हैं।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक स्वयं कृष्ण के माध्यम से यह स्थापित करता है कि ईश्वर 'अज' (अजन्मा) और 'अनादि' (जिसका कोई आदि न हो) है, जिससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर का कोई निर्माता नहीं है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह एक धर्मशास्त्रीय कथन है, न कि तार्किक प्रमाण जो 'अकारण' होने के विशेषाधिकार को सिद्ध करे।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: भगवद्गीता 7.7
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव
हे धनञ्जय! मुझसे श्रेष्ठ दूसरा कोई भी नहीं है। यह सब संसार मुझमें उसी प्रकार गुँथा हुआ है, जैसे सूत्र में मणियों के समूह होते हैं।
भगवान कृष्ण अपनी परा और अपरा प्रकृति का वर्णन करने के उपरान्त, स्वयं को सम्पूर्ण जगत का परम कारण और आधार बताते हुए यह कहते हैं।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक ईश्वर (कृष्ण) को ही समस्त अस्तित्व का परम आधार घोषित करता है। यदि ईश्वर से श्रेष्ठ कुछ नहीं है, तो उसके किसी कारण होने का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि वह स्वयं 'सृष्टि का सूत्र' है, न कि कोई कार्य।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
दर्शन
प्रमाण-स्थल: ब्रह्मसूत्र 1.1.2
जन्माद्यस्य यतः
वह (ब्रह्म) वह है जिससे इस जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय (प्रलय) होती है।
सृष्टि के मूल कारण का लक्षण बताने के प्रसंग में।
इससे सिद्ध होता है: यह सूत्र ब्रह्म का लक्षण बताते हुए कहता है कि ब्रह्म वह है जिससे इस (जगत) की उत्पत्ति, स्थिति और लय होती है। इस प्रकार यह सूत्र ब्रह्म को जगत का मूल कारण सिद्ध करता है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
— कथन और आधार
क्या समर्थित है, कहाँ मतभेद हैं
ईश्वर को अनादि माना जाना तार्किक रूप से आवश्यक है ताकि अनंत प्रतिगमन को रोका जा सके।
तर्क यह है कि यदि हर कारण का एक और कारण हो, तो श्रृंखला कभी समाप्त नहीं होगी और वर्तमान स्थिति कभी उत्पन्न नहीं हो पाएगी।
ईश्वर को 'अकारण' मानना एक तार्किक विशेषाधिकार (special pleading) हो सकता है।
यह तर्क दिया जाता है कि यदि भौतिक संसार को कारण चाहिए, तो ईश्वर को भी कारण की आवश्यकता होनी चाहिए, अन्यथा यह एक मनमाना नियम है।
ईश्वर के बारे में यह प्रश्न श्रेणी दोष (category error) का एक उदाहरण हो सकता है।
कारण और कार्य के नियम केवल समय और स्थान के भीतर काम करते हैं, जबकि ईश्वर इन दोनों से परे माना जाता है।
— आमने-सामने
आपत्तियाँ और उनका उत्तर
प्रश्न
यदि संसार की प्रत्येक वस्तु का कोई निर्माता है, तो ईश्वर का निर्माता कौन है?
दृष्टिकोण
ईश्वर 'स्वयं-सिद्ध' (self-existent) है; उसे किसी कारण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह स्वयं अस्तित्व का आधार है।
आक्षेप
यह उत्तर केवल तर्क से बचने का एक तरीका है। यदि ब्रह्मांड स्वयं-सिद्ध हो सकता है, तो हमें ईश्वर की आवश्यकता ही क्यों है?
उत्तर
ब्रह्मांड परिवर्तनशील और भौतिक है, इसलिए वह अनादि नहीं हो सकता। ईश्वर एक ऐसी अपरिवर्तनशील सत्ता है जिसे बदलाव की आवश्यकता नहीं है।
प्रति-उत्तर
परिवर्तन का न होना यह सिद्ध नहीं करता कि उसका कोई निर्माता नहीं है। आप जिसे ईश्वर कहते हैं, वह भी केवल एक अज्ञात कारण हो सकता है।
निष्कर्ष
यह बहस दर्शाती है कि ईश्वर का प्रश्न विज्ञान के बजाय दर्शन की भाषा में अधिक प्रभावी है।
यह प्रमाण क्या सिद्ध नहीं करता
यह तर्क यह सिद्ध नहीं करता कि ईश्वर का अस्तित्व वास्तव में है। यह केवल यह स्पष्ट करता है कि यदि 'परम सत्ता' का विचार है, तो वह सृजन के नियमों के अधीन नहीं हो सकता। यह तर्क यह भी सिद्ध नहीं करता कि संसार का निर्माण ईश्वर ने ही किया है या संसार अनादि है। यह केवल एक तार्किक सीमा को इंगित करता है कि 'किसने बनाया' प्रश्न का उपयोग ईश्वर के अस्तित्व को खारिज करने के लिए करना एक तार्किक भूल (category error) हो सकता है, लेकिन यह ईश्वर के होने का प्रमाण नहीं है।
शास्त्र से क्या सिद्ध होता है
शास्त्रों का चिंतन स्पष्ट करता है कि सृष्टि की उत्पत्ति के कारण को खोजते हुए हमें एक ऐसे बिंदु पर पहुँचना अनिवार्य है, जहाँ कारण की श्रृंखला समाप्त हो और 'अनादि तत्व' शेष रहे। यदि ईश्वर का भी कोई निर्माता होता, तो वह परमेश्वर न होकर स्वयं ही एक सृजित वस्तु होता। अतः, तार्किक रूप से यह आवश्यक है कि वह प्रथम सत्ता स्वयंभू हो। यह विचार यह स्पष्ट करता है कि 'ईश्वर को किसने बनाया' प्रश्न ईश्वर की परिभाषा के विपरीत है, क्योंकि ईश्वर सर्वथा स्वतंत्र और स्व-सिद्ध हैं।
— ग्रंथ-सूची
स्रोत और संस्करण
Shvetashvatara Upanishad · श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.9
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Rigveda (Shakala Samhita) · ऋग्वेद 10.129.6
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Kena Upanishad · केनोपनिषद् 2.3
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Katha Upanishad · कठोपनिषद् 1.2.18
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Bhagavadgita (Mahabharata, Bhishmaparva) · भगवद्गीता 10.3
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Bhagavadgita (Mahabharata, Bhishmaparva) · भगवद्गीता 7.7
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Brahmasutra · ब्रह्मसूत्र 1.1.2
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष