— प्रश्न का परीक्षण
उपनिषदों में सृष्टि
Creation in the Upanishads
उपनिषदों में सृष्टि का निरूपण एक भौतिक यात्रा के स्थान पर आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया है। जहाँ उपनिषद सृष्टि के मूल कारण और अधिष्ठान का अन्वेषण करते हैं, वहीं उनकी दृष्टि पूर्णतः ब्रह्म-केन्द्रित है। यह सृष्टि-विमर्श चेतना के विस्तार और परमात्मा के निर्गुण एवं सगुण स्वरूपों को समझने का दिव्य मार्ग है। यह आध्यात्मिक मानचित्र जगत और आत्मा के एकात्म को रेखांकित करता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सृष्टि को समझने का अर्थ ब्रह्म को जानना ही है। उपनिषदों का यह ज्ञान चिरंतन है, जो मानव को बाह्य जगत से हटाकर उसके अंतस्थ परम सत्य तक पहुँचाता है।
5 प्रमाण-स्थल · 3 कथन · 6 तर्क / आपत्तियाँ

मूल पाठ · संदर्भ · परीक्षण
— संक्षिप्त उत्तर
30-सेकंड उत्तर
उपनिषदों में सृष्टि का निरूपण एक गहन दार्शनिक तत्त्व-मीमांसा है। यहाँ सृष्टि परमात्मा से ब्रह्मांड के सहज प्रकटीकरण के रूप में वर्णित है, जहाँ समस्त चर-अचर उसी ब्रह्म का विस्तार हैं। उपनिषदों का मुख्य प्रतिपाद्य भौतिक रचना के ब्यौरे से अधिक अस्तित्व के मूल स्रोत और चेतना की सर्वव्यापकता को उद्घाटित करना है। यहाँ सृष्टि का अर्थ केवल पदार्थ की उत्पत्ति नहीं, अपितु उस परम सत्य का बोध है, जिससे जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय होती है। यह विमर्श 'द्रष्टा' और 'दृश्य' के अद्वैत संबंध को स्थापित करता है, जिसका लक्ष्य जिज्ञासु को स्वयं के अस्तित्व के मूल तत्त्व और ब्रह्म-साक्षात्कार की ओर प्रेरित करना है।
— प्रमाण-सीढ़ी
शास्त्र क्रम से क्या कहते हैं
श्रुति · वेद एवं उपनिषद्
प्रमाण-स्थल: मुण्डकोपनिषद् 2.1.1
तदेतत् सत्यं
यथा सुदीप्तात् पावकाद्विस्फुलिङ्गाः
सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः
प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति
यह सत्य है: जैसे सुदीप्त अग्नि से हजारों स्फुलिंग (चिनगारियाँ) अपने समान रूप वाले उत्पन्न होते हैं, वैसे ही हे सौम्य! उस अक्षर (ब्रह्म) से विविध प्रकार के भाव (पदार्थ) उत्पन्न होते हैं और उसी में पुनः विलीन हो जाते हैं।
यह मुण्डकोपनिषद् में सृष्टि की उत्पत्ति और लय के साम्य को दर्शाने के लिए एक प्रसिद्ध रूपक है।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक स्पष्ट रूप से सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन करता है, जिसमें ब्रह्म को सर्व-सृष्टि का कारण और आश्रय बताया गया है।
इससे सिद्ध नहीं होता: इससे भौतिक सृष्टि के वैज्ञानिक चरणों का कोई सांख्यिकीय विवरण नहीं मिलता।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: ऋग्वेद 10.129.6
को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः ।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाऽथा को वेद यत आबभूव
कौन वास्तव में जानता है? कौन यहाँ उद्घोषित कर सकता है कि यह सृष्टि कहाँ से उत्पन्न हुई है? देवता तो इस (सृष्टि) के प्रकटीकरण के बाद हुए हैं, तो फिर कौन जान सकता है कि यह कहाँ से बनी?
यह ऋग्वेद के प्रसिद्ध 'नासदीय सूक्त' का अंश है, जो सृष्टि-रचना के प्रति संशय और विस्मय व्यक्त करता है।
इससे सिद्ध होता है: यह 'नासदीय सूक्त' का मंत्र सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्य पर दार्शनिक संशय और अनभिज्ञता को प्रकट करता है, जो सृष्टि-मीमांसा के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है।
इससे सिद्ध नहीं होता: यह कोई निश्चित भौतिक ब्रह्मांड-विज्ञान प्रस्तुत नहीं करता।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: मुण्डकोपनिषद् 1.1.7
यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च
यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति ।
यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि
तथाऽक्षरात् संभवतीह विश्वम्
जैसे मकड़ी जाले को उत्पन्न करती है और (पुनः) उसे ग्रहण (खींच) लेती है, जैसे पृथ्वी पर औषधियाँ उगती हैं, जैसे जीवित पुरुष से केश और लोम उत्पन्न होते हैं, वैसे ही इस जगत में अक्षर (ब्रह्म) से विश्व का उदय होता है।
मुण्डकोपनिषद् में सृष्टि की उत्पत्ति की प्रक्रिया को समझाने के लिए मकड़ी का दृष्टान्त (रूपक) दिया गया है।
इससे सिद्ध होता है: पाठ में 'यथोर्णनाभिः' आदि दृष्टांतों (रूपकों) का स्पष्ट उल्लेख है। यह सिद्ध करता है कि उपनिषद् सृष्टि प्रक्रिया को समझाने के लिए लौकिक उदाहरणों (रूपकों) का प्रयोग करते हैं, न कि वैज्ञानिक भौतिक विवरण देते हैं।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: केनोपनिषद् 1.3
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः ।
न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्
वहाँ (ब्रह्म के स्वरूप तक) न आँख पहुँचती है, न वाणी, न मन। हम नहीं जानते और न ही यह समझते हैं कि उस (परम सत्य) का उपदेश कैसे दिया जाए।
केनोपनिषद् में ब्रह्म की स्वरूप-अनिर्वचनीयता का वर्णन है।
इससे सिद्ध होता है: यह स्थल सिद्ध करता है कि परमतत्त्व (ब्रह्म) इंद्रियों, वाणी और मन की पहुँच से परे है। उसकी प्रकृति ऐसी है कि उसे लौकिक ज्ञान के माध्यम से न तो पूरी तरह जाना जा सकता है और न ही उसका पूर्ण उपदेश दिया जा सकता है।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
प्रमाण-स्थल: मुण्डकोपनिषद् 1.1.9
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तापः ।
तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायाते
जो सर्वज्ञ है, सर्ववित् है, जिसका तप ज्ञानमय है, उसी (परमात्मा) से यह ब्रह्म (हिरण्यगर्भ), नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते हैं।
मुण्डकोपनिषद् में अक्षर ब्रह्म से सृष्टि की उत्पत्ति का प्रसंग।
इससे सिद्ध होता है: यह श्लोक सृष्टि की उत्पत्ति के मूल में 'ज्ञानमय तप' को स्थापित करता है। चूँकि ब्रह्म का तप ज्ञानस्वरूप है और उसी ज्ञान से सृष्टि का विस्तार (नाम-रूपात्मक) होता है, अतः सृष्टि का मूल 'ज्ञान' या 'चेतना' ही है, जड़ पदार्थ नहीं।
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
— कथन और आधार
क्या समर्थित है, कहाँ मतभेद हैं
सृष्टि चेतना का ही एक विस्तार है।
उपनिषदों के कई अंशों में ब्रह्मांड को परमात्मा का ही एक अंग माना गया है। यह तर्क चेतना को ही मूल आधार मानता है, जो दार्शनिक रूप से एक सुसंगत ढांचा प्रदान करता है।
सृष्टि के सिद्धांत रूपक की श्रेणी में आते हैं।
चूँकि उपनिषदों में सृष्टि की कई परस्पर विरोधी कथाएं मिलती हैं, यह स्पष्ट है कि वे भौतिक सत्य न होकर आध्यात्मिक संकेत हैं। यह व्याख्या उनके विरोधाभासी वर्णनों को संतुलित करती है।
उपनिषदों का सृष्टि वर्णन वैज्ञानिक ब्रह्मांड विज्ञान के समानांतर नहीं है।
उपनिषदों का सृष्टि-वर्णन आत्म-साक्षात्कार और परब्रह्म के स्वरूप को उद्घाटित करता है, जिसका ध्येय जगत की उत्पत्ति के आध्यात्मिक रहस्य को समझना है। यह ज्ञान भौतिक अन्वेषण से पृथक, शुद्ध चैतन्य और तत्वमीमांसा पर आधारित है, जिसे केवल ऋषियों की अनुभूतियों और शास्त्र-वचनों के प्रकाश में ही समझा जा सकता है।
— आमने-सामने
आपत्तियाँ और उनका उत्तर
प्रश्न
क्या उपनिषद सृष्टि को एक भौतिक निर्माण प्रक्रिया के रूप में देखते हैं?
पक्ष
हाँ, कई उपनिषदों में सृष्टि को तत्व-दर-तत्व बनने की प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया गया है, जो किसी कारीगर या निर्माता के विचार को इंगित करती है।
आपत्ति
यदि इसे भौतिक निर्माण माना जाए, तो यह उपनिषदों के उस मूलभूत सिद्धांत के विरुद्ध है जो कहता है कि 'ब्रह्म' अपरिवर्तनीय और अजन्मा है।
उत्तर
इसीलिए इसे 'विवर्त' (आभासी परिवर्तन) कहा गया है, जहाँ वास्तविकता बदलती नहीं है, केवल प्रतीत होती है।
प्रतिप्रश्न
लेकिन 'आभास' का तर्क भी एक दार्शनिक बचाव ही है, जो मूल भौतिक प्रश्नों को अनसुलझा छोड़ देता है।
निष्कर्ष
सृष्टि का वर्णन भौतिक प्रक्रिया और दार्शनिक रूपक के बीच का एक संतुलन है, जिसे न तो पूरी तरह भौतिक माना जा सकता है और न ही पूरी तरह मिथ्या।
यह प्रमाण क्या सिद्ध नहीं करता
यह अध्याय यह सिद्ध नहीं करता कि उपनिषद किसी विशिष्ट वैज्ञानिक ब्रह्मांड विज्ञान (cosmology) का समर्थन करते हैं। यह यह भी नहीं दिखाता कि इन ग्रंथों की सृष्टि-कथाओं को एक ऐतिहासिक या तथ्यात्मक विवरण के रूप में लिया जाना चाहिए। इसके अलावा, उपनिषद किसी एक सर्वसम्मत सृष्टि सिद्धांत को प्रस्तुत नहीं करते; अतः, इनके आधार पर किसी भौतिक उत्पत्ति सिद्धांत की पुष्टि करना तार्किक रूप से कठिन है। ये ग्रंथ किसी भी भौतिक प्रयोगशाला के परिणामों के समानांतर नहीं हैं और न ही वे आधुनिक खगोल भौतिकी के प्रमाण के रूप में कार्य करते हैं।
शास्त्र से क्या सिद्ध होता है
उपनिषदों के ऋषियों ने सृष्टि के वर्णन में भौतिक क्रियाओं के स्थान पर 'कारण' और 'कार्य' के तात्विक संबंध को प्रधानता दी है। समस्त उपनिषद इस सत्य को पुष्ट करते हैं कि यह ब्रह्मांड ब्रह्म का ही विवर्त या विस्तार है, जो उसी चेतना से अनुप्राणित है। सृष्टि-विमर्श का एकमात्र उद्देश्य पाठक को द्वैत की भ्रांति से हटाकर अद्वैत ज्ञान की ओर ले जाना है। अतः यह स्पष्ट है कि सृष्टि का वर्णन यहाँ एक आध्यात्मिक साधन है, जिसका प्रयोजन यह बोध कराना है कि आत्मा ही समस्त विश्व का अधिष्ठान है और जगत उसी की शक्ति का नित्य प्रकटीकरण है।
— ग्रंथ-सूची
स्रोत और संस्करण
Mundaka Upanishad · मुण्डकोपनिषद् 2.1.1
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Rigveda (Shakala Samhita) · ऋग्वेद 10.129.6
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Mundaka Upanishad · मुण्डकोपनिषद् 1.1.7
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Kena Upanishad · केनोपनिषद् 1.3
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष
Mundaka Upanishad · मुण्डकोपनिषद् 1.1.9
पूर्ण संस्करण-जाँच शेष