हिन्दू धर्म का उद्भव भारतीय उपमहाद्वीप में हुआ, लेकिन इसे किसी एक व्यक्ति, घटना या निश्चित वर्ष से नहीं जोड़ा जा सकता। वैदिक परम्परा इसकी प्रमुख ऐतिहासिक जड़ों में है। ऋग्वेद के प्राचीन अंशों की रचना सामान्यतः लगभग दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में मानी जाती है। स्थानीय देव-परम्पराओं, घरेलू अनुष्ठानों और प्रकृति से जुड़े धार्मिक जीवन ने भी इसके व्यापक स्वरूप को आकार दिया। आरम्भिक विकास के अनेक विवरण अभी शोध के विषय हैं।
समय के साथ वैदिक अनुष्ठानों के साथ आत्मा, जगत और परम सत्य पर गहन विचार विकसित हुए। उपनिषदों ने इन प्रश्नों को विशेष स्थान दिया। बाद की सदियों में रामायण, महाभारत, पुराण और विभिन्न दार्शनिक दर्शनों ने धार्मिक जीवन को नई अभिव्यक्तियाँ दीं। बौद्ध और जैन परम्पराओं सहित अन्य विचारधाराओं से संवाद और मतभेद भी हुए। इस इतिहास में निरन्तरता के साथ परिवर्तन दिखाई देता है; सभी समुदायों का विकास एक जैसा नहीं रहा।
मन्दिरों, तीर्थों, सम्प्रदायों और क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य ने हिन्दू धर्म का सामाजिक विस्तार किया। भक्ति परम्पराओं ने व्यक्तिगत श्रद्धा और स्थानीय भाषाओं में धार्मिक अभिव्यक्ति को व्यापक बनाया। आधुनिक समय में सुधार आन्दोलनों, प्रवास और वैश्विक सम्पर्क ने नए रूप जोड़े। ‘सनातन धर्म’ का आशय शाश्वत धर्म से है और अनेक हिन्दू अपनी परम्परा के लिए यह नाम अपनाते हैं। फिर भी हिन्दू धर्म के भीतर मान्यताओं और व्यवहारों की पर्याप्त विविधता बनी हुई है।