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12 पाठ · पढ़ें और सुनें

सम्पादकीय कथा-रूपान्तरण — मूल शास्त्र-पाठ नहीं

व्यवहार नीति

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  1. ॐपरिवार: नीति का प्रथम क्षेत्रपाठ 1
  2. ॐवाणी का विवेक: घर और कार्यक्षेत्रपाठ 2
  3. ॐधन और धर्म: ईमानदारी का उपार्जनपाठ 3
  4. ॐवचन की गरिमा और सत्यनिष्ठापाठ 4
  5. ॐमित्रता का विवेक और चयनपाठ 5
  6. ॐअपमान का प्रत्युत्तर और सहनशीलतापाठ 6
  7. ॐकर्म: कर्तव्य या दिखावापाठ 7
  8. ॐनेतृत्व का धर्मपाठ 8
  9. ॐछोटी बातों में ईमानदारीपाठ 9
  10. ॐअभिभावक और संतान का दायित्वपाठ 10
  11. ॐमन का अनुशासित होनापाठ 11
  12. ॐबिना ग्लानि का जीवनपाठ 12
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सम्पादकीय सिद्धान्त

मूल स्रोत, अनुवाद, सरल व्याख्या और परम्परागत टीका सदा अलग-अलग अंकित रहते हैं। कुछ भी गढ़ा नहीं जाता; अनुपलब्ध सामग्री को अनुपलब्ध अंकित किया जाता है।

सम्पादकीय कथाएँ इसी रूप में अंकित हैं और शास्त्र नहीं हैं। किसी परम्परा को दूसरी से ऊँचा नहीं बताया जाता।

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