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सम्पादकीय कथा-रूपान्तरण — मूल शास्त्र-पाठ नहीं

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  1. ॐचेतना का स्रोतउपनिषद् 1
  2. ॐपरिभाषाओं से परेउपनिषद् 2
  3. ॐदेवताओं का अहंकारउपनिषद् 3
  4. ॐअग्नि और वायु का दंभउपनिषद् 4
  5. ॐइंद्र का मान-भंगउपनिषद् 5
  6. ॐविस्मय: ज्ञान का प्रारंभिक द्वारउपनिषद् 6
  7. ॐअनुशासन: जिज्ञासा की आधारशिलाउपनिषद् 7
  8. ॐउमा का दिव्य प्राकट्यउपनिषद् 8
  9. ॐअहंकारी मन का सुधारउपनिषद् 9
  10. ॐएक अंतिम चिंतनउपनिषद् 10
  11. ॐबिजली की कौंध जैसा साक्षात्कारउपनिषद् 11
  12. ॐपरम सत्ता की आधारशिलाउपनिषद् 12
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सम्पादकीय सिद्धान्त

मूल स्रोत, अनुवाद, सरल व्याख्या और परम्परागत टीका सदा अलग-अलग अंकित रहते हैं। कुछ भी गढ़ा नहीं जाता; अनुपलब्ध सामग्री को अनुपलब्ध अंकित किया जाता है।

सम्पादकीय कथाएँ इसी रूप में अंकित हैं और शास्त्र नहीं हैं। किसी परम्परा को दूसरी से ऊँचा नहीं बताया जाता।

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