स्मृति · इतिहास · रामायण

किष्किन्धाकाण्ड

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सर्ग

67 सर्ग — पढ़ें और सुनें

सर्ग 1

पम्पा सरोवर पर श्री राम का विलाप

सर्ग 2

सुग्रीव का भय और हनुमान का परामर्श

सर्ग 3

हनुमान जी और श्रीराम का प्रथम मिलन

सर्ग 4

लक्ष्मण का परिचय और हनुमान का आश्वासन

सर्ग 5

राम और सुग्रीव की पवित्र मित्रता

सर्ग 6

सुग्रीव द्वारा सीता की सुधि और आभूषणों को लाना

सर्ग 7

सुग्रीव द्वारा श्री राम को सांत्वना और मैत्री का सुदृढ़ीकरण

सर्ग 8

परस्पर सहायता का पावन संकल्प

सर्ग 9

शत्रुता का आरम्भ और मायावी का पीछा

सर्ग 10

वाली का क्रोध और सुग्रीव का निष्कासन

सर्ग 11

सुग्रीव द्वारा वालि के पराक्रम और दुन्दुभि-वध का वर्णन

सर्ग 12

श्रीराम का पराक्रम-प्रदर्शन और किष्किन्धा की ओर प्रस्थान

सर्ग 13

किष्किन्धा की ओर प्रस्थान

सर्ग 14

सुग्रीव द्वारा बालि को पुनः ललकार

सर्ग 15

तारा द्वारा बालि को हितकारी परामर्श

सर्ग 16

वाली का पतन

सर्ग 17

धराशायी वाली का श्रीराम पर आक्षेप

सर्ग 18

श्रीराम द्वारा धर्म की स्थापना और बालि का समाधान

सर्ग 19

तारा का विलाप और रणभूमि की ओर प्रस्थान

सर्ग 20

धराशायी वाली पर तारा का हृदयविदारक विलाप

सर्ग 21

हनुमान जी द्वारा तारा को सांत्वना

सर्ग 22

वाली का अंतिम उपदेश और देहत्याग

सर्ग 23

तारा का दारुण विलाप

सर्ग 24

सुग्रीव और तारा का विलाप तथा श्रीराम का सान्त्वना

सर्ग 25

वालि का अन्तिम संस्कार

सर्ग 26

सुग्रीव और अंगद का राज्याभिषेक

सर्ग 27

प्रस्रवण पर्वत पर वर्षा ऋतु और श्रीराम का विरह

सर्ग 28

श्रीराम द्वारा वर्षा ऋतु का वर्णन

सर्ग 29

हनुमान द्वारा सुग्रीव को कर्तव्य का स्मरण

सर्ग 30

शरद ऋतु का आगमन और श्रीराम का विरह-शोक

सर्ग 31

लक्ष्मण का किष्किन्धा में प्रवेश और क्रोध

सर्ग 32

हनुमान जी द्वारा सुग्रीव को हितकारी परामर्श

सर्ग 33

लक्ष्मण का किष्किन्धा में प्रवेश और तारा द्वारा उनका क्रोध-शमन

सर्ग 34

लक्ष्मण का तारा से संवाद और सुग्रीव को चेतावनी

सर्ग 35

तारा द्वारा लक्ष्मण के क्रोध का शमन

सर्ग 36

सुग्रीव का लक्ष्मण के प्रति कृतज्ञता और विनय प्रकट करना

सर्ग 37

सुग्रीव द्वारा वानर सेना का आह्वान

सर्ग 38

सुग्रीव का श्रीराम के पास प्रस्थान और मिलन

सर्ग 39

वानर सेनाओं का आगमन

सर्ग 40

सुग्रीव द्वारा पूर्व दिशा में विनीत को भेजना

सर्ग 41

दक्षिण दिशा में वानरों का प्रेषण

सर्ग 42

सुग्रीव द्वारा सुषेण को पश्चिम दिशा में भेजना

सर्ग 43

उत्तर दिशा में शतबली का प्रस्थान

सर्ग 44

श्रीराम द्वारा हनुमान जी को मुद्रिका प्रदान करना

सर्ग 45

वानर सेनाओं का प्रस्थान और श्रीराम का विस्मय

सर्ग 46

सुग्रीव द्वारा पृथ्वी के भूगोल के ज्ञान का रहस्य बताना

सर्ग 47

वानर सेनाओं का चारों दिशाओं में प्रस्थान

सर्ग 48

विन्ध्य पर्वत में सीता की खोज

सर्ग 49

दक्षिण दिशा में वानरों का सघन अन्वेषण

सर्ग 50

ऋक्ष बिल में प्रवेश और दिव्य धाम का दर्शन

सर्ग 51

ऋक्ष-बिल का दिव्य वैभव और तपस्विनी के दर्शन

सर्ग 52

ऋक्षबिल से निष्क्रमण और स्वयं प्रभा का अनुग्रह

सर्ग 53

अंगद का विषाद और प्रायोपवेशन का निर्णय

सर्ग 54

हनुमान जी द्वारा अंगद को प्रबोधन

सर्ग 55

अंगद और वानरों का प्रायोपवेशन

सर्ग 56

सम्पाती द्वारा जटायु का नाम श्रवण

सर्ग 57

अंगद द्वारा सम्पाती को जटायु का वृत्तांत सुनाना

सर्ग 58

सम्पाती द्वारा सीता के स्थान का उद्घाटन

सर्ग 59

सम्पाती द्वारा सुपार्श्व के वृत्तान्त का वर्णन

सर्ग 60

सम्पाती द्वारा महर्षि निशाकर से भेंट का स्मरण

सर्ग 61

सम्पाती द्वारा सूर्य की ओर उड़ान और पंख जलने की कथा

सर्ग 62

महर्षि निशाकर की भविष्यवाणी और सांत्वना

सर्ग 63

सम्पाती के पंखों का पुनः उगना और वानरों का प्रस्थान

सर्ग 64

वानरों का महासागर के तट पर पहुँचना

सर्ग 65

वानर वीरों द्वारा अपनी छलांग की शक्ति का वर्णन

सर्ग 66

जाम्बवान द्वारा हनुमान जी को उनके असीम बल का स्मरण

सर्ग 67

हनुमान जी का विराट रूप और समुद्र-लंघन का संकल्प

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