स्मृति · इतिहास · रामायण

युद्धकाण्ड

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सर्ग

128 सर्ग — पढ़ें और सुनें

सर्ग 1

श्रीराम द्वारा हनुमान् जी की प्रशंसा और आलिंगन

सर्ग 2

सुग्रीव द्वारा श्रीराम को ढाढ़स और उत्साह

सर्ग 3

हनुमान द्वारा लंका की सुरक्षा का वर्णन

सर्ग 4

वानर सेना का दक्षिण दिशा की ओर महाप्रयाण

सर्ग 5

समुद्र तट पर श्रीराम का विरह-विलाप

सर्ग 6

रावण द्वारा मंत्रियों की सभा बुलाना

सर्ग 7

रावण द्वारा मंत्रियों से मंत्रणा

सर्ग 8

राक्षस वीरों का दर्प और प्रतिज्ञा

सर्ग 9

विभीषण का धर्मोपदेश और अमंगलकारी संकेतों की चेतावनी

सर्ग 10

रावण द्वारा महती सभा का आयोजन

सर्ग 11

रावण का भव्य राजसभा का आयोजन

सर्ग 12

रावण की सभा और कुम्भकर्ण का उद्बोधन

सर्ग 13

रावण द्वारा अपने शाप का रहस्योद्घाटन

सर्ग 14

विभीषण द्वारा धर्मसम्मत परामर्श

सर्ग 15

इन्द्रजीत का अहंकार और विभीषण की चेतावनी

सर्ग 16

विभीषण का लंका त्याग

सर्ग 17

विभीषण का शरणागति निवेदन और सुग्रीव का संदेह

सर्ग 18

श्रीराम का अभयदान और शरणागत-वत्सलता

सर्ग 19

विभीषण का शरणागति और राज्याभिषेक

सर्ग 20

शुक का आगमन और सुग्रीव का उत्तर

सर्ग 21

समुद्र पर श्रीराम का क्रोध

सर्ग 22

समुद्र सेतु का निर्माण

सर्ग 23

विजय के शुभ शकुन

सर्ग 24

दक्षिण तट पर आगमन और लंका का दर्शन

सर्ग 25

शुक और सारण पर श्रीराम की कृपा

सर्ग 26

शरण द्वारा वानर सेनापतियों का परिचय

सर्ग 27

शुक द्वारा अन्य प्रमुख वानर वीरों का परिचय

सर्ग 28

सारण द्वारा वानर सेनापतियों का परिचय

सर्ग 29

प्रासाद के शिखर से वानर सेना का अवलोकन

सर्ग 30

शार्दूल द्वारा रावण को वानर सेनापतियों का परिचय

सर्ग 31

रावण का मायावी षड्यंत्र और असत्य कथन

सर्ग 32

मायावी शीश देखकर सीता का विलाप

सर्ग 33

सरमा द्वारा सीता को सांत्वना और माया का उद्घाटन

सर्ग 34

सरमा द्वारा रावण की सभा का वृत्तांत बताना

सर्ग 35

माल्यवान द्वारा रावण को सन्धि का परामर्श

सर्ग 36

रावण द्वारा माल्यवान के परामर्श की उपेक्षा और लंका की रक्षा व्यवस्था

सर्ग 37

श्रीराम द्वारा वानर सेना की व्यूह-रचना और सुवेल पर्वत पर आरोहण

सर्ग 38

सुवेल पर्वत के शिखर से लंका का अवलोकन

सर्ग 39

सुवेल पर्वत से लंका का दर्शन

सर्ग 40

सुग्रीव और रावण का मल्लयुद्ध

सर्ग 41

वानर सेना की मोर्चेबंदी और अंगद की दूत रूप में रवानगी

सर्ग 42

वानर सेना द्वारा लंका की घेराबंदी

सर्ग 43

वानरों और राक्षसों के बीच द्वंद्व युद्ध

सर्ग 44

घोर रात्रि-युद्ध और अंगद का पराक्रम

सर्ग 45

इंद्रजीत का अदृश्य होकर बाण-वर्षा करना

सर्ग 46

इन्द्रजित् का लंका लौटना और वानरों का शोक

सर्ग 47

सीता द्वारा रणभूमि में राम और लक्ष्मण का दर्शन

सर्ग 48

सीता का विलाप

सर्ग 49

श्रीराम का विलाप और वानरों की व्याकुलता

सर्ग 50

गरुड़ का आगमन और नागपाश से मुक्ति

सर्ग 51

वानरों का सिंहनाद और रावण की चिंता

सर्ग 52

धूम्राक्ष का युद्ध के लिए प्रस्थान

सर्ग 53

वज्रदंष्ट्र का युद्ध के लिए प्रस्थान

सर्ग 54

राक्षस वज्रदंष्ट्र का युद्ध के लिए प्रस्थान

सर्ग 55

अकम्पन का रणभूमि में प्रवेश

सर्ग 56

हनुमान जी द्वारा अकम्पन का वध

सर्ग 57

प्रहस्त का युद्ध के लिए प्रस्थान

सर्ग 58

प्रहस्त का युद्धभूमि में प्रयाण

सर्ग 59

रावण का प्रथम युद्ध और पराजय

सर्ग 60

कुम्भकर्ण को जगाने का रावण का आदेश

सर्ग 61

विभीषण द्वारा कुम्भकर्ण का परिचय

सर्ग 62

कुम्भकर्ण का रावण के राजभवन में गमन

सर्ग 63

कुम्भकर्ण का रावण को सांत्वना और युद्ध का संकल्प

सर्ग 64

महोदर का रावण को कूटनीति का परामर्श

सर्ग 65

कुम्भकर्ण द्वारा महोदर की भर्त्सना और रावण को आश्वासन

सर्ग 66

अंगद का वानर सेना को उद्बोधन

सर्ग 67

कुम्भकर्ण वध

सर्ग 68

सुग्रीव का पराक्रम और कुम्भकर्ण की विरूपता

सर्ग 69

रावण के पुत्रों और वीरों का युद्ध के लिए प्रस्थान

सर्ग 70

कुम्भकर्ण का पराक्रम और वानर वीरों से युद्ध

सर्ग 71

अंगद द्वारा नरांतक का वध

सर्ग 72

रावण का शोक और लंका की सुरक्षा की आज्ञा

सर्ग 73

हनुमान जी द्वारा निकुम्भ का वध

सर्ग 74

हनुमान जी द्वारा औषध पर्वत लाना और सेना का पुनर्जीवन

सर्ग 75

वानरों द्वारा लंका-दहन

सर्ग 76

कम्पन, प्रजङ्घ और अन्य राक्षसों का संहार

सर्ग 77

शोणिताक्ष और यूपाक्ष का वध

सर्ग 78

अंगद द्वारा महापार्श्व का वध

सर्ग 79

सुग्रीव द्वारा कुम्भ का वध

सर्ग 80

इन्द्रजीत का यज्ञ और रणभूमि में प्रवेश

सर्ग 81

इन्द्रजीत द्वारा माया-सीता का वध

सर्ग 82

हनुमान जी का लौटना और निकुम्भिला में इन्द्रजीत का यज्ञ

सर्ग 83

माया सीता के वध पर श्री राम का विलाप और लक्ष्मण का सांत्वना देना

सर्ग 84

विभीषण द्वारा माया-सीता के वध का रहस्योद्घाटन

सर्ग 85

विभीषण द्वारा माया का उद्घाटन और निकुम्भिला यज्ञ का रहस्य

सर्ग 86

विभीषण द्वारा माया का उद्घाटन

सर्ग 87

निकुम्भिला में लक्ष्मण का आगमन

सर्ग 88

लक्ष्मण और इन्द्रजीत का भयंकर द्वन्द्व युद्ध

सर्ग 89

इंद्रजीत-वध के उपरांत श्रीराम का हर्ष

सर्ग 90

लक्ष्मण और इन्द्रजित का भीषण द्वन्द्वयुद्ध

सर्ग 91

इंद्रजीत का वध

सर्ग 92

रावण का क्रोध और सुपार्श्व का उद्बोधन

सर्ग 93

रावण का पुनः रणभूमि में प्रवेश और वानर सेना का संहार

सर्ग 94

रावण का सेना सहित युद्धभूमि की ओर प्रस्थान

सर्ग 95

रावण का महाप्रयाण और सेना का आह्वान

सर्ग 96

रावण का रणभूमि की ओर प्रस्थान

सर्ग 97

रावण का रणभूमि में प्रवेश और श्रीराम का संकल्प

सर्ग 98

अशुभ संकेतों के बीच रावण का रणभूमि में प्रवेश

सर्ग 99

रावण का रणभूमि में प्रचण्ड प्रवेश

सर्ग 100

लक्ष्मण पर रावण की अमोघ शक्ति का प्रहार

सर्ग 101

लक्ष्मण का स्वस्थ होना और श्रीराम को युद्ध की प्रेरणा

सर्ग 102

लक्ष्मण का पुनर्जीवन और दिव्य औषधियों का प्रभाव

सर्ग 103

इंद्र द्वारा श्री राम के लिए दिव्य रथ भेजना

सर्ग 104

रावण और उसके सारथि का संवाद

सर्ग 105

अगस्त्य मुनि द्वारा आदित्य हृदय का उपदेश

सर्ग 106

शुभ और अशुभ शकुनों के बीच महायुद्ध की तैयारी

सर्ग 107

इंद्र द्वारा श्रीराम के लिए दिव्य रथ का प्रेषण

सर्ग 108

ब्रह्मास्त्र द्वारा रावण-वध

सर्ग 109

विभीषण का विलाप और श्रीराम का सांत्वना-वचन

सर्ग 110

राक्षस-रानियों का विलाप

सर्ग 111

मन्दोदरी का विलाप

सर्ग 112

विभीषण का राज्याभिषेक और सीताजी के लिए संदेश

सर्ग 113

हनुमान जी द्वारा सीता जी को शुभ समाचार

सर्ग 114

रावण का अन्त्येष्टि संस्कार

सर्ग 115

श्रीराम के कठोर वचन

सर्ग 116

सीताजी का अग्नि-प्रवेश

सर्ग 117

देवताओं द्वारा श्रीराम के दिव्य स्वरूप का स्मरण

सर्ग 118

अग्निदेव द्वारा सीता की शुद्धि की घोषणा और श्रीराम द्वारा उनका स्वीकार

सर्ग 119

देवताओं का आगमन और ब्रह्मा जी द्वारा श्री राम के दिव्य स्वरूप का प्रकटीकरण

सर्ग 120

देवताओं द्वारा श्रीराम के स्वरूप का स्मरण

सर्ग 121

श्रीराम और महाराज दशरथ का मिलन

सर्ग 122

श्रीराम द्वारा सीता को युद्धभूमि व सेतु का दर्शन

सर्ग 123

पुष्पक विमान से श्रीराम द्वारा सीता को तीर्थों और स्मृतियों का दर्शन

सर्ग 124

महर्षि भरद्वाज के आश्रम में श्री राम का आगमन और वरदान

सर्ग 125

श्रीराम द्वारा हनुमान जी को भरत के पास भेजना

सर्ग 126

हनुमान जी द्वारा भरत को श्रीराम के आगमन का शुभ समाचार देना

सर्ग 127

हनुमान जी द्वारा भरत को सम्पूर्ण कथा सुनाना

सर्ग 128

श्रीराम का राज्याभिषेक और रामराज्य की महिमा

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